गजल

18 जून 2019   |  अलोक सिन्हा   (47 बार पढ़ा जा चुका है)

जिन्दगी जब किसी मुश्किल में डगमगाती है ,

कहीं कमी हैं हममें अहसास ये कराती है |

ख्वाब भले टूटे , पर आदर्श न छोड़ो अपने, ,

आत्मा हटी तो देह धूल कण कहलाती है |

खुद पर भरोसा हो तो चाहे जो काम करो

डोरी सहारे की तो अक्सर टूट जाती है |

मुश्किलें बढ़ी तो मौसम को सब ने दोष दिया ,

जिम्मेदारी तो इन्तजामों पर भी आती है |

झूठी तारीफ से बहकना तो मंजूर हमें ,

मार्ग - दर्शन की पर आलोचना न भाती है |

`झूठ` जब बोले सदा फूल से झरते मुख से ,

सच को `जबान `क्यों ये हुनर नहीं सिखाती है |



वाह वाह अलोक जी , बहुत खूब , प्रेरणात्मक लिखा है आपने

बहुत बहुत धन्यवाद - प्रियंका जी |

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