स्वयं की समीक्षा ;---- आचार्य अर्जुन तिवारी

23 जून 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (18 बार पढ़ा जा चुका है)

स्वयं की समीक्षा ;---- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)

*इस संसार में परमात्मा ने बड़ी विचित्र सृष्टि की है | देखने में तो सभी पक्षी एक प्रकार के ही दिखते हैं , सभी मनुष्यों की आकृति एक समान ही बनाई है परमात्मा ने परंतु विचित्रता यह है कि एक समान आकृति होते हुए भी प्रत्येक प्राणी के गुण एवं स्वभाव भिन्न - भिन्न ही हैं | अपने गुण , स्वभाव एवं कर्मों से ही यहाँ मनुष्य की निंदा - अपमान व सम्मान होता रहा है | प्रत्येक मनुष्य के विवेक के अनुसार एवं संस्कारों के अनुरूप ही उसके कर्म भी होते हैं | यहाँ कभी किसी से स्वयं की तुलना नहीं करनी चाहिए | कहने को तो गुलाब एवं कीचड़ में खिलने वाला कमल दोनों पुष्प ही हैं परंतु दोनों की तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि पुष्प होते हुए भी दोनों के गुणों एवं परिवेश में भिन्नता पाई जाती है | उसी प्रकार मनुष्यों के भी भिन्न - भिन्न परिवेश एवं स्थितियां होती हैं , इसीलिए कभी किसी से स्वयं की तुलना नहीं करनी चाहिए | इस संसार में एक से एक महान विद्वान हैं तो महामूर्ख भी हैं विचार कीजिए कि मूर्ख स्वयं की तुलना विद्वान से करें तो उसे ईर्ष्या होने लगती है और विद्वान यदि अपनी तुलना उस मूर्ख से तो स्थिति हास्यास्पद सी हो जाती है | इसीलिए मनुष्य को किसी से स्वयं की तुलना न करके स्वयं अपनी समीक्षा करनी चाहिए | किसी से स्वयं की तुलना एवं स्वयं की समीक्षा करने में भेद है | किसी से स्वयं की तुलना करने वाला जलन व ईर्ष्या में जलते हुए जीवन व्यतीत कर देता है जबकि समय समय पर स्वयं की समीक्षा करते हुए अपने दोषों को खत्म करने वाला नई ऊँचाईयों को प्राप्त होता रहता है | स्वयं की समीक्षा अर्थात आत्मावलोकन एक ऐसी विधा है जिसके माध्यम से मनुष्य चिंतन करके अपने द्वारा किये गये कृत्यों की तुलना दूसरों से करके उसमें दोष पाये जाने पर सुधार करने का प्रयास करता है और निकट भविष्य में अपने दोषों का समन करके सकारात्मकता से साथ समाज में आगे बढ़ते हुए स्थापित हो सकता है |* *आज के भौतिकवादी एवं एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में मनुष्य इस प्रकार व्यस्त है कि उसे स्वयं की समीक्षा करने का अवसर ही नहीं मिल रहा है या फिर यह भी कहा जा सकता है कि मनुष्य आज दूसरों की समीक्षा करने में ही अधिक व्यस्त है | आज प्राय: यह देखा जाता है कि मनुष्य जब किसी नये समाज में जाता है तो वहाँ सर्वप्रथम यही कार्य करना प्रारम्भ कर देता है , उस समाज में कौन ज्ञानी है और कौन अज्ञानी यही समीक्षा होने लगती है | दूसरों की समीक्षा करके उस पर टिप्पणियाँ करना मनुष्य का स्वभाव बन गया है | उन टिप्पणियों के माध्यम से वह अपना विद्वता सिद्ध करते हुए स्वयं में प्रसन्न होता रहता है | जबकि मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि मनुष्य को स्वयं की समीक्षा करनी चाहिए | किसी से स्वयं की तुलना कभी नहीं करनी चाहिए बल्कि स्वयं की समीक्षा करके अधिक से अधिक स्वयं को परिमार्जित करते हुए स्थापित होने का प्रयास करना चाहिए | परंतु यह देखने को बगुत कम ही मिलता है | आज मनुष्य का अहं उस पर प्रभावी हो रहा है , अपने इसी अहं में मनुष्य दूसरों से अपनी तुलना करके दूसरों की समीक्षा करने में व्यस्त हैं | वह स्वयं क्या कर रहा है इसकी समीक्षा वह कभी नरीं करना चाहता और उसका यही कृत्य उसको समाज में उच्चपद पर होते हुए हंसी का पात्र ही बनाता रहता है | अत: हमें दूसरों की अपेक्षा स्वयं की समीक्षा करते रहना चाहिए |* *मनुष्य को किसी से किसी की तुलना कभी नहीं करनी चाहिए क्योंकि परमात्मा की सृष्टि में एकरूपता होते हुए भी भिन्नता है | ऐसे में स्वयं की समीक्षा करते रहना चाहिए |*

स्वयं की समीक्षा ;---- आचार्य अर्जुन तिवारी  - शब्द (shabd.in)

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