कुसंगति का प्रभाव :-- आचार्य श्री अर्जुन तिवारी जी

06 जुलाई 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (15 बार पढ़ा जा चुका है)

कुसंगति का प्रभाव :-- आचार्य  श्री अर्जुन तिवारी जी  - शब्द (shabd.in)

*मनुष्य अपने जीवनकाल में सदैव उन्नति ही करना चाहता है परंतु सभी इसमें सफल नहीं हो पाते हैं | मनुष्य के किसी भी क्षेत्र में सफल या असफल होने में उसकी संगति महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है | इस संसार में भिन्न - भिन्न प्रकार के लोग रहते हैं इसमें से कुछ सद्प्रवृत्ति के होते हैं तो कुछ दुष्प्रवृत्ति के | जहाँ सद्प्रवृत्ति सदैव लोककल्याणक होती है वहीं दुष्प्रवृत्ति सदैव समाज के विपरीत विध्वंसक कार्यों में रत रहती है | मनुष्य की सफलता या असफलता में इन प्रवृत्तियों को नकारा नहीं जा सकता है | मनुष्य का जब दुर्भाग्य उदय होता है तो वह दुष्टों की संगति में आ जाता है | यद्यपि वह प्रारम्भ में तो ऐसे लोगों की संगति नहीं करना चाहता परंतु संगति का प्रभाव हो जाने पर वह इनका साथ भी नहीं छोड़ पाता जिसके फलस्वरूप उसके सारे सपने ध्वस्त हो जाते हैं और वह स्वयं तो दुखी रहता ही है साथ में दुष्टों की संगति के प्रभाव से अपने नवीन क्रियाकलापों से परिवार एवं समाज को भी दुखी बनाये रखता है | कुसंगति का प्रभाव यह होता है कि समाज उसे स्थान - स्थान पर असम्मानित करने लगता है | चाहे जितना कुलीन हो , धनाढ्य हो परंतु यदि दुष्प्रवृत्ति उसका स्वभाव बन जाती है तो वह सम्मान कभी नहीं प्राप्त कर सकता | संगति के प्रभाव को कदापि नकारा नहीं जा सकता है | दुष्टों की संगति तभी होती है जब मनुष्य किसी लोभ के वशीभूत होकर अपना कार्य सम्पादित कराने हेतु दुष्टों के पास जाता है |

यह संगति का ही प्रभाव होता है कि अपना कार्य सम्पन्न हो जाने के बाद भी दुष्टों की संगति नहीं छूटती और व्यक्ति का जीवन नारकीय बन जाता है | इसीलिए प्रत्येक मनुष्य को किसी की भी संगति करने के पहले उसके गुण - दोषों का आंकलन अवश्य कर लेना चाहिए |* *आज भौतिकता की अंधी दौड़ में जिस प्रकार मनुष्य अपने संस्कारों से दूर होता चला जा रहा है उसका परिणाम सबके सामने है | आज के परिवेश में जिस प्रकार नित्य अमानवीय कृत्यों के समाचार देखने एवं सुनने को मिल रहे हैं उसका कारण सिर्फ आज के युवाओं की संगति एवं संस्कारों का पतन ही मुख्य है | आज मनुष्य पतित होता जा रहा है | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि मनुष्य के पतन के मुख्यत: दो कारण होते हैं प्रथम तो यह कि मनुष्य स्वयं को नहीं समझ पाता और अपने आचरण से गिर जाता है ! और दूसरा दुष्टों की संगति | मनुष्य को सदैव कुसंगति से बचते रहने का प्रयास करते रहना चाहिए | जिस प्रकार मनुष्य एकाकीपन में गलत विचारों में खो जाता है और उसकी मानसिकता वैसी ही बन जाती है उसी प्रकार कुसंगति सदैव गलत कार्यों की ओर प्रेरित करती रहती है |

किसी ने बहुत सुंदर लाईन लिखी है :-- "आगि जरौं जल बूड़ि मरौ गिरि जाइ गिरौं कछु भय मत आनौ ! सुंदर और भले सब ही पर दुर्जन संग भलो जनि जानौ !!" अर्थात :- जल में डूबकर मरना , आग में जलना , पर्वतों से गिर जाने आदि में भी उतनी बानि नहीं है जितनी हानि दुष्टों की संगति से हो सकती है | कुसंग का क्या प्रभाव होता है इसका ज्वलंत उदाहरण है अयोध्या , जहाँ मन्थरा की कुसंगति के प्रभाव में आकर कैकेयी अपने प्राणप्रिय श्रीराम के लिए चौदह वर्षों का वनवास मांग लेती है | कुसंगति से बचने के लिए सद्गुरु एवं सजिजनों की संगति ही ब्रह्मास्त्र है | सज्जनों की संगति मनुष्य को कुसंग से बचाकर सद्मार्ग के अनन्त आकाश में भेज देती है |* *मनुष्य को सदैव सद्गुणी की संगति करनी चाहिए क्योंकि जिसके पास जो होगा वहीं आपको मिलेगा |*

अगला लेख: चातुर्मास्य :--- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
12 जुलाई 2019
*सनातन धर्म में समय-समय पर विभिन्न व्रत उपवास एवं त्योहारों का पर्व मनाने की परंपरा रही है | प्रत्येक व्रत / पर्व के पीछे एक वैज्ञानिक मान्यता सनातन धर्म में देखने को मिलती है | आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी जिसे पद्मा एकादशी के नाम से जाना जाता है | इसका बहुत ही
12 जुलाई 2019
28 जून 2019
संसार में कर्म ही प्रधान कर्मानुसार ही मनुष्य को सुख - दुख , मृत्यु - मोक्ष आदि प्राप्त होते हैं | कर्म की प्रधानता यहाँ तक है कि जीव को अगला जन्म किस योनि में लेना है यह भी उसके कर्म ही निर्धारित करते हैं | यद्यपि सभी जीवों को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है परंतु इन सबसे ऊपर एक परमसत्ता है द
28 जून 2019
28 जून 2019
संसार में कर्म ही प्रधान कर्मानुसार ही मनुष्य को सुख - दुख , मृत्यु - मोक्ष आदि प्राप्त होते हैं | कर्म की प्रधानता यहाँ तक है कि जीव को अगला जन्म किस योनि में लेना है यह भी उसके कर्म ही निर्धारित करते हैं | यद्यपि सभी जीवों को अपने कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है परंतु इन सबसे ऊपर एक परमसत्ता है द
28 जून 2019
17 जुलाई 2019
*सनातन धर्म दिव्य एवं स्वयं में वैज्ञानिकता को आत्मसात किये हुए है | सनातन के प्रत्येक व्रत - त्यौहार स्वयं में विशिष्ट हैं | इसी कड़ी में सावन महीने का विशेष महत्व है | सनातन धर्म में वर्ष भर व्रत आते रहते हैं और लोग इनका पालन भी करते हैं , परंतु जिस प्रकार सभी संक्रांतियों में मकर संक्रान्ति , सभी
17 जुलाई 2019
12 जुलाई 2019
दृढ़ संकल्प इस धरा धाम पर मानवयोनि में जन्म लेने के बाद मनुष्य जीवन में अनेकों कार्य संपन्न करना चाहता , इसके लिए मनुष्य कार्य को प्रारंभ भी करता है परंतु अपने लक्ष्य तक कुछ ही लोग पहुंच पाते हैं | इसका कारण मनुष्य में अदम्य उत्साह एवं अपने कार्य के प्रति निरंतरता तथा सतत प्रयास का अभाव होना ही कहा
12 जुलाई 2019
24 जून 2019
*सनातन धर्म बहुत ही वृहद होते हुए असंख्य मान्यताओं को स्वयं को समेटे हुए है | सनातन धर्म में समय - समय पर अनेक देवी - देवताओं के साथ ग्रामदेवता , स्थानदेवता , ईष्टदेवता एवं कुलदेवता की पूजा आदिकाल से की जाती रही है | प्रत्येक कुल के एक विशेष आराध्य होते हैं जिन्हें कुलदेवी या कुलदेवता के नाम से जाना
24 जून 2019
06 जुलाई 2019
*सनातन धर्म में चौरासी लाख योनियों का वर्णन मिलता है | देव , दानव , मानव , प्रेत , पितर , गन्धर्व , यक्ष , किन्नर , नाग आदि के अतिरिक्त भी जलचर , थलचर , नभचर आदि का वर्णन मिलता है | हमारे इतिहास - पुराणों में स्थान - स्थान पर इनका विस्तृत वर्णन भी है | आदिकाल से ही सनातन के अनुयायिओं के साथ ही सनातन
06 जुलाई 2019
24 जून 2019
*सनातन धर्म बहुत ही वृहद होते हुए असंख्य मान्यताओं को स्वयं को समेटे हुए है | सनातन धर्म में समय - समय पर अनेक देवी - देवताओं के साथ ग्रामदेवता , स्थानदेवता , ईष्टदेवता एवं कुलदेवता की पूजा आदिकाल से की जाती रही है | प्रत्येक कुल के एक विशेष आराध्य होते हैं जिन्हें कुलदेवी या कुलदेवता के नाम से जाना
24 जून 2019
04 जुलाई 2019
नश्वर और अनश्वर *सृष्टि के आदिकाल से लेकर आज तक अनेकानेक जीव इस पृथ्वी पर अपने कर्मानुसार आये विकास किये और एक निश्चित अवधि के बाद इस धराधाम से चले भी गये | श्री राम , श्रीकृष्ण , हों या बुद्ध एवं महावीर जैसे महापुरुष इस विकास एवं विनाश (मृत्यु) से कोई भी नहीं बच पाया है | इसका मूल कारण यह है कि
04 जुलाई 2019
24 जून 2019
*इस धराधाम पर परमात्मा ने चौरासी लाख योनियों की रचना की , इनमें सर्वश्रेष्ठ मनुष्य हुआ | मनुष्य सर्वश्रेष्ठ यदि हुआ है तो उसका कारण उसकी बुद्धि , विवेक एवं ज्ञान ही कहा जा सकता है | अपने ज्ञान के बल पर मनुष्य आदिकाल से ही संपूर्ण धरा धाम पर शासन करता चला रहा है | संसार में मनुष्य को बलवान बनाने के
24 जून 2019
25 जून 2019
*सृष्टि के प्रारम्भ में जब ईश्वर ने सृष्टि की रचना प्रारम्भ की तो अनेकों औषधियों , वनस्पतियों के साथ अनेकानेक जीव सृजित किये इन्हीं जीवों में मनुष्य भी था | देवता की कृपा से मनुष्य धरती पर आया | आदिकाल से ही देवता और मनुष्य का अटूट सम्बन्ध रहा है | पहले देवता ने मनुष्य की रचना की बाद में मनुष्य ने द
25 जून 2019
06 जुलाई 2019
*सनातन धर्म में चौरासी लाख योनियों का वर्णन मिलता है | देव , दानव , मानव , प्रेत , पितर , गन्धर्व , यक्ष , किन्नर , नाग आदि के अतिरिक्त भी जलचर , थलचर , नभचर आदि का वर्णन मिलता है | हमारे इतिहास - पुराणों में स्थान - स्थान पर इनका विस्तृत वर्णन भी है | आदिकाल से ही सनातन के अनुयायिओं के साथ ही सनातन
06 जुलाई 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
अंग्रेजी  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x