शंभाजी महाराज (Shambhaji Maharaj) ने इस तरह दी थी अपने प्राणों की आहूति

10 जुलाई 2019   |  सौरभ श्रीवास्तव   (86 बार पढ़ा जा चुका है)

शंभाजी महाराज (Shambhaji Maharaj) ने इस तरह दी थी अपने प्राणों की आहूति

Shambhaji Maharaj का जन्म 14 मई 1657 में पुरंदर के किले पर हुआ था। संभाजी महाराज शिवाजी के बेटे के रूप में जाने जाते हैं। संभाजी ने अपने बचपन से ही अपने राज्य की सभी समस्याओं सुलझाने का तरीका सीख लिया था और इन्हीं सब संघर्ष के साथ शिक्षा प्राप्त करने के कारण ही वे वीर संभाजी महाराज कहलाए। छवा (मराठी में मतलब, शेर का बच्चा) और शंभू जी राजे के नाम से भी जाने जाते थे। उनकी माता जी का नाम सई बाई तथा पिता 'Kshatrapati Shivaji' थे। संभाजी महाराज के दादा जी का नाम शाहजी भोंसले और दादी जीजा बाई थीं और उनकी पत्नी येसूबाई थीं। संभाजी महाराज संस्कृत भाषा के बहुत बड़े ज्ञाता माने जाते थे और कलाओं के प्रेमी व कुशल वीर योद्धा के नाम से प्रख्यात थे।

संभाजी के जन्म के 2 साल बाद ही इनके माता जी की मृत्यु हो गई और उनका पालन-पोषण उनके दादी जी के हाथों हुआ। संभाजी को 8 से ज्यादा भाषाओं का ज्ञान था। माता जी की मृत्यु के बाद उनकी सौतेली मां सोयराबाई अपने सगे पुत्र राजाराम को राज्य का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थीं। सौतेली मां के कारण ही पिता से संभाजी का संबंध खराब होने लगा और इसी वजह से संभाजी घर छोड़ मुगलों से जा मिले। पिता शिवाजी को इस बात का बहुत दुख हुआ और जब संभाजी ने मुगलों का गलत व्यवहार देखा तो मुगलों का साथ खुद छोड़ दिया। घर वापस आकर पिता से माफी मांगी और इसके बाद संभाजी की मुलाकात कलश नाम के एक कवि से हुई। कवि के संपर्क में आने के बाद संभाजी की रूचि साहित्य में लग गयी। संभाजी ने अपने पिता की तरह बुधा चरित्र अथवा श्रृंगारिका का वर्णन किया। संभाजी महाराज ने हिंदू समाज की सभ्यता को बनाए रखने के लिए काफी योगदान किया।


आपको बता दें कि संभाजी ने औरंगजेब के 8 लाख सैनिकों का सामना किया और उन्हें पराजित भी किया। संभाजी ने महाराष्ट्र में मुगलों कई सालों तक उलझा कर रखा क्योकि पश्चिमी घाट के तट पर ना मराठी और ना ही मुगल सैनिक पीछे हटने को तैयार थे। सन् 1680 में शिवाजी महाराज के देहांत के बाद मराठों को बहुत सारी परेशानी झेलनी पड़ी। औरंगजेब के पास 50 लाख सैनिकों की सेना थी इसलिए उसे ऐसा लगता था क्षत्रपति शिवाजी की मृत्यु के बाद संभाजी ज्यादा समय तक युद्ध के मैदान में टिक नहीं पाएगा।

औरंगजेब ने पहले तो बीजापुर और गोलकुंडा में जीत हासिल कक ली लेकिन इसके बाद ही औरंगजेब की नजर मराठा राज्य पर पड़ी और वहां उसने संभाजी को युद्ध की चुनौती दी और सन् 1682 में मराठा राज्य को जितने की कोशिश की जो कि नाकाम हो गयी।

सन् 1687 में जब मराठा सैनिक कमजोर दिखाई दिए तब फिर से सन् 1689 में ऐसा हुआ कि संभाजी मुगलों के हाथ आ गये और कवि कलश को भी बंदी बनाया इसके बाद दोनों को कारागार में बंद कर दिया और बाद में उन्हें तहखाने में भी डालने का आदेश दे दिया। आपको बता दें कि हार मानने पर संभाजी और कलश दोनों लोगों को को कैद से निकालकर घंटी वाली टोपी पहनाई इसके बाद बहुत अपमानित किया।


औरंगजेब ने दोनों लोगों से कहा कि अगर संभाजी धर्म परिवर्तन करेंगे तो संभाजी और कवि कलश को माफ कर दिया जायेगा। संभाजी ने इसे इंकार किया और फिर अपने ईश्वर को याद किया और कहने लगे कि धर्म की सुरक्षा के लिए वह अपना जीवन हर बार राष्ट्र को समर्पित करने के लिए तैयार हैं। इन सब के बावजूद संभाजी महाराज, औरंगजेब और मुगलों से कभी भी हार नहीं माने।

11 मार्च, सन् 1689 को भीमा और इंद्रायणी नदी के संगम तट पर तुलजीपुर में संभाजी राजे की साजिश से हत्या कर दी गई। औरंगजेब और उसकी सेना जो कार्य 8 वर्षों में नहीं कर पायी वो कार्य संभाजी ने कर दिखाया। औरंगजेब ने धोखे से संभाजी महाराज की हत्या तो करवा दी लेकिन चाहकर भी उन्हें हरा नहीं पाया। संभाजी महाराज ने अपने प्राणों की आहूति हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए दे दी।


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