किस ओर जा रहे हैं हम

11 जुलाई 2019   |  जयति जैन - नूतन -   (2720 बार पढ़ा जा चुका है)

किस ओर जा रहे हैं हम


सैफीना के बच्चे को जब मीडिया ने खाने-पीने से लेकर, उठने बैठने तक की बे-बुनियादी खबरों में बार-बार दिखाया तो ना जाने क्यों मुझे मरते बच्चों का चेहरा बार-बार याद आया। हां बच्चे ही तो थे, अपने थोड़ी थे, ना उस दोगली मीडिया के थे। ये बच्चे तो वह थे जो सरकार और उसकी दी सुविधाओं का लाभ भी नहीं ले सकते। मीडिया का दोगलापन यही साबित हो जाता है, जब बच्चों की मौत को लेकर उनका कड़ा विरोध सामने नहीं आता है और यह बच्चे जो कल का सुनहरा भविष्य हो सकते थे। यह बच्चे जो देश की अर्थव्यवस्था का हिस्सा हो सकते थे, आज नहीं है। क्यों? यह सवाल सरकार से पहले खुद से पूछना चाहिए।

कभी सोचा क्या यदि शोक मनाने बैठे तो किस किसका शोक मनाएं, टिवंकल का? लीची खाने वाले बच्चों का? दिमागी बुखार में मरे बच्चों का? या आग में झुलसे हुए बच्चों का? एक हो तो शोक मनाएं। कब तक यह रुकेगा, कोई रास्ता सुझाएँ। एक ही रास्ता मुझे दिखा, वह है सरकार के कड़े फैसले का, वह भी अब तक नहीं लिया गया।

आखिर क्यों? जानें इतनी सस्ती हुई कि आये दिन एक नई खबर बस अखबार की हेडलाइन बन जाती है। फर्क नहीं पड़ता अब कोई जिये या मरे। आखिर क्यों ऐसा हुआ कि हम इतने संवेदनहीन हो गए कि पड़ौसी भी मुश्किल में हो तो उसकी मदद नहीं करना चाहते।

बच्चे तो बच्चे, आजकल उनकी जान बचाने वाले डॉक्टर भी अपनी जान की भीख मांगते दिख रहे हैं। पहले हम खुद बीमारियों को बढ़ावा देते हैं फिर मरीज के बच ना पाने का सारा दोष डॉक्टर के सिर पर फोड़ देते हैं। वह भी इंसान है, जो पूरी कोशिश करते हैं मरीज को बचाने के लिए लेकिन जब वह इसमें नाकाम होते हैं तो मरीज के परिवार जन उनका सिर फोड़ देते हैं।

एक समय था जब बलात्कार की एक छोटी सी खबर भी हमें अंदर तक झकझोर देती थी और आज आए दिन बलात्कार की एक खबर आती है, जो खबर ही बनकर रह जाती है और हमें जरा भी फर्क नहीं पड़ता। कितने मतलबी और संवेदनहीन होते जा रहे हैं हम कि परेशानी यदि खुद की हो तो फर्क पड़ता, अगर दूसरे की हो तो कोई मतलब नहीं।

किस ओर जा रहे हैं हम, कभी सोचा है। क्या करने की कोशिश में है, एक तो हम खुद ही अपने परिवार, अपने बच्चों को संभाल नहीं सकते और दोष दूसरों के सिर पर फोड़ देते हैं। अभी भी वक़्त है अगर संभल जाएं तो भविष्य में इन घटनाओं से बच सकते हैं। वरना घोर कलयुग बोलकर खुद को दिलासा देते रहोगे।


--

जयति जैन 'नूतन"' --

अगला लेख: हिमा दास भारत की शान



आपने वो लिखा है जो बड़े लोगों के बारे में हर दिन, हम सब रोज़ अखबार में पढ़ कर भूल जाते है. लेकिन समाज के माध्यम वर्ग में क्या चल रहा है और इसका क्या भविष्य है इसपर ध्यान जाता ही नहीं , जबकि रहते हम इसी समाज में हैं . आप लेख एक सवाल है हम सब के लिए .

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x