खुद को पाया आज

12 जुलाई 2019   |  bhavna Thaker   (19 बार पढ़ा जा चुका है)

खुद को पाया आज

मोह के धागे की गांठ खोल दी है मैंने जो सालों से बँधी थी तुमसे,
सालों से तुमने चुने इस पेड़ो की शाखाओं से फल, फूल मैं अनमनी सी देती रही घाव झेलते, बिखरे पत्तों सी की
अब मुमकिन नहीं कुछ तुम्हें दे सकूँ संभलना जो सीख लिया है..!

मत खिंचो अपनी ओर
बहती रही उस दिशा में नाव सी खिंचा तुमने जिस तरफ़ अब साहिल खुद बन चुकी हूँ..!

सराबोर महकती रही तुम्हारे आँगन मुरझाने तक, न पायी कभी तुम्हारे अहसास की नमी अब उस चमन में खिलना ही छोड़ दिया है..!

धुआँधार बदली सी बरसती रही तुम्हारी प्यास बुझाने खाली उर की गगरी होने तक,
वो आसमान ही धवल कर लिया हमने छांट कर मेघ सभर बादल..!

एक जिह्वा में जीती रही कुछ न पाया कभी तुम्हारे अहसास का कुआँ गूरूर से इतना लबालब भरा था,
तुमने देना सीखा ही नहीं..!

मेरे स्पंदनों की कोपलों को भी खाद पानी चाहिए होगा प्रतिसाद का तुमने कभी सोचा भी नहीं..!

मेरे रंग, रुप, खुशबू, स्पर्श, मेरी दुनिया केे मालिक तुम, पर तुम्हारे दायरे में मेरा पैर तक नहीं..!
जिस्म से परे अंतर्मन की खिड़की से झाँकते कभी तो मेरे सिसकते अरमानों की चीता के अंगारों को मिल जाता शीत आबशार का कतरा..!

अब तक निभा लिया दायित्व अपना,
अब खुद के अस्तित्व का आसमान रचने चली हूँ,
छांट लिए है बंदिशो से कुछ अनमोल मोती अपने हिस्से के..!
अब तुम आज़ाद हो मैं आबाद हूँ खुद को जो पाया है आज अपने हिस्से का आसमान ढूँढने चली हूँ।।
भावु।।

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प्रिया पटेल
15 जुलाई 2019

अच्छे कर्म करो खुद में भगवन दिखेगा

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