देश की जनता के रुपयों पर कब तक 'ऐश' होता रहेगा?

18 जुलाई 2019   |  डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय   (47 बार पढ़ा जा चुका है)

देश की जनता के रुपयों पर कब तक 'ऐश' होता रहेगा?

हमारे देश के प्रधानमन्त्री कहते हैं : मैं 'जनता का सेवक' हूँ; मैं आप सबका 'प्रधान चौकीदार' हूँ; परन्तु विडम्बना देखिए, उनका काम 'चौकीदारी' का और मीडिया की सुर्ख़ियों में बने रहते हैं। यदि वे सचमुच, जनसेवक हैं तो संवैधानिक रूप में 'प्रधानमन्त्री' के स्थान पर 'प्रधान जनसेवक' कहलाने के लिए क्यों नहीं प्रस्तुत होते हैं? देश के संविधान में 'प्रधान मन्त्री' को स्थान क्यों? इतना ही नहीं, इस 'जनसेवक' शब्द का प्रभाव देश की जनता व्यापक और विशद् रूप में देखना चाहती है। यह कैसी चौकीदारी कि आज देश का एक-एक व्यक्ति असुरक्षित जीवन जीने के लिए विवश और बाध्य है और प्रधान चौकीदार को 'देश के सबसे बड़े सुरक्षा-कवच' की सुविधा दी जा रही है। ऐसे में, देश की जनता उस चौकीदार से 'सुरक्षा' की आशा कैसे कर सकती है?

यह विषय बहुत गम्भीर है और देश की जनता समझने का प्रयास ही नहीं करती।

प्रधान जनसेवक और प्रधान चौकीदार के नाम पर देश की जनता के साथ क्रूर छल किया जा रहा है। यदि नहीं तो राष्ट्रपति को 'राष्ट्रजनसेवक', उपराष्ट्रपति को 'उपराष्ट्र जनसेवक', प्रधानमन्त्री को 'प्रधान जनसेवक', राज्यपाल को राज्य-जनसेवक', मुख्यमन्त्री को 'मुख्य जनसेवक', उपमुख्यमन्त्री को 'उपमुख्य जनसेवक', मन्त्री को 'जनसेवक', सांसद को 'प्रधान जनप्रतिनिधि' तथा विधायक को 'मुख्य जनप्रतिनिधि' का नाम क्यों नहीं दिया जाता?

इतना ही नहीं, उन सभी को दी जानेवाली सारी 'विशेष' और 'अतिरिक्त' सुविधाएँ उनसे ले ली जायें। वे ही सुविधाएँ-साधन उन्हें दिये जायें, जो उनके कर्त्तव्य-पालन के लिए अपरिहार्य हों। जिस प्रकार देश का मध्यम-वर्ग अपना जीवन जीता है, उसी प्रकार उनके भी जीवन-यापन करने की व्यवस्था की जाये।

देश में विधायकों, सांसदों को दी जानेवाली पेंशन समाप्त करने की आवश्यकता है; साथ ही उन्हें 'विशिष्ट' व्यक्ति के रूप में दी जानेवाली औचित्यरहित साधन-सुविधा उनसे वापस ली जाये।

और हाँ, देश में किसी भी निर्वाचन के लिए उम्मीदवार की न्यूनतम शैक्षिक योग्यता 'स्नातक' निर्धारित की जाये। उम्मीदवार 'स्वच्छ छवि' वाला रहे।

ये सब ढकोसला हैं। आज़ादी के बाद से जितने भी राजनीतिक दलों ने हम पर शासन किये हैं, सबने किसी-न-किसी रूप में ठगे हैं; देशवासियों को लूटे हैं, इसलिए अब यह अपरिहार्य हो गया है कि केन्द्र और राज्यों में जिस भी दल की सरकारें हैं, उनकी सत्ता को प्रत्येक पाँच वर्षों-बाद देश के मतदाता उखाड़ फेंकें। देश की जनता को 'पाँव से सिर तक' इतने तरह के 'करों' से लाद दिया जाता है कि देश की औसत जनता 'क़र्ज़ में जीते-जीते, उसी को चिता और कफ़न बनाकर 'क़र्ज़' में मर जाती है और देशवासियों के रुपयों को 'राजस्व' के नाम पर हमारे नेता अपनी तिज़ोरी भरते हैं। आख़िर देश की जनता कब आँखें खोलेंगी?

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १६ जुलाई, २०१९ ईसवी)


--- डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

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