एक अभिव्यक्ति

18 जुलाई 2019   |  डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय   (10 बार पढ़ा जा चुका है)

एक अभिव्यक्ति

जुल्म करके भी तुम मुकर जाते हो,

ऐसी फ़ित्रत कहाँ से तुम लाते हो?

दर्द का एहसास अब भी होता मुझे,

जब मुश्किलात में ख़ुद को पाते हो।

मेरा रहगुज़र अब कहीं दिखता नहीं,

बूढ़े ज़ख़्म को अब क्यों दिखाते हो?

उसकी कैफ़ीयत अब सवाल करती,

उस शख़्स को भला क्यों सताते हो?

कुछ लोग रस्सी को साँप बनाते यों ही,

अपनी बातों में भला क्यों भरमाते हो?


--- डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १६ जुलाई, २०१९ ईसवी)

अगला लेख: देश की जनता के रुपयों पर कब तक 'ऐश' होता रहेगा?



बहुत सुन्दर रचना

शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
04 जुलाई 2019
जा
वो जादू है मुहब्बत में जवां जो मन को करता है ना जाने फिर भी क्यों इंसान प्रीति धन को करता है बोल वो प्यार के तेरे समां जाते हैं नस नस में लहू सा बन के फिर ये प्रेम शीतल तन को करता है मुहब्बत की आस पाले नाचते मोर को देखो मोरनी से मिलन को प्यार वो इस घन को करता है मुहब्बत के वार से ही उसने दुनिया हरा
04 जुलाई 2019
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x