दोस्ती

18 जुलाई 2019   |  विभा वत्सल   (72 बार पढ़ा जा चुका है)

दोस्ती

दिल्ली का टू बीएचके प्लैट। जहां तीन दोस्त रहते हैं। संजीव, राकेश और राजेश। कॉलेज में तीनों मिले और अब तक साथ हैं। तीनों ही बैचलर। करियर की जदोजहद, पैसे की तंगी और कुछ कर गुजरने की तमन्ना लिए। संजीव और राकेश प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं। राजेश पिछले एक साल से बेरोजगार है। मंदी में छंटनी का शिकार। नई नौकरी के लिए दौडधूप जारी है। फिलहाल पूरे घर की जिम्मेदारी राजेश के जिम्मे है। राजेश जब भी नौकरी की तलाश में घर से निकलता तो उसे तकिए के पास दो सौ रुपये रखे मिलते और एक नोट मिलता। जिसमें लिखा होता था, "चुपचाप रख ले। कोई सवाल नहीं। बाद में निपट लेंगे।" राजेश बगैर किसी से पूछताछ किए रुपए रखता और निकल पड़ता। राजेश आज बहुत खुश था। किचन में खाना बनाने में भिड़ा हुआ था। तभी दरवाज़े की घन्टी बजती है। "अरे संजीव, तुम इतना जल्दी ऑफिस से आ गए।" "हाँ यार, जल्दी फ्री हो गया। वो मेड को भी बात करने के लिए बुलाया है खाना कौन बना रहा है।" थके-हारे संजीव ने पूछा। "मैं ही बना रहा हूँ।


हम सबके लिए खुशखबरी है।" संजीव के गले लगकर राजेश खुशी से चिल्लाया...."फाइनली मुझे नौकरी मिल गई।" दोनों बहुत खुश होते हैं। तभी दफ्तर से राकेश भी आ जाता है। तीनों पार्टी करते हैं। एक साल के बाद तीनों को खुशी नसीब हुई थी। "यार, मुझे नहीं मालूम कि एक साल तक तुम दोनों में से किसने मेरे तकिए के पास पैसे रखे। तुम लोग नहीं होते तो मैं आज यहां नहीं होता। ये अहसान मैं ताउम्र नहीं चुका पाऊंगा।" ये कहते-कहते राजेश का गला भर आया। अब ज़्यादा इमोशनल मत कर, हम रो पड़ेंगे। हम तुझे टूटता, बिखरता नहीं देखना चाह रहे थे। तू चिंता मतकर सब हिसाब कर लेंगे।" संजीव ने कहा। "अच्छा ये तो बताओ, आज खाने में क्या स्पेशल है?" चहकते हुए राकेश ने पूछा। तभी दरवाज़े की घन्टी बजती है। सामने मेड खड़ी-खड़ी भुनभुना रही थी । "क्या हुआ तुम्हें, आते ही नखरे दिखाने लगी।" राकेश ने पूछा। "क्या साहब, एक टाइम तो खाना बनवाते थे उसमें भी कभी बुलाते हो, कभी छुट्टी कर देते हो। बताइए आज क्यों बुलाया है?" "छुट्टी???? हमने कब दी।" संजीव आश्चर्य से पूछता है। पुछिए राजेश भइया से, पिछले एक साल से खुद खाना बना रहे हैं। " राजेश....क्या दोस्त। तीनों की आंखें डबडबा गईं थीं।

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काश सबमे ऐसी ही दोस्ती होती।

दोस्ती ही तो एक ऐसा रिश्ता है जो भगवन नहीं हम स्वयं जोड़े है .... बहुत भावुक कहानी विभा जी

बहुत अच्छे

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