दिव्य दृष्टि- एक रहस्य 7

30 जुलाई 2019   |  दिनेश कुमार दिवाकर   (411 बार पढ़ा जा चुका है)

इस कहानी के पिछले छः भाग प्रकाशित हो चुका है इस भाग को समझने के लिए पिछले छः भागो को पढ़ें।


अब तक.....


दृष्टि जैसिका को मारने की कोशिश करती हैं लेकिन प्रेम उसे रोकने के लिए आगे बढ़ा लेकिन दृष्टि उसे मार मार कर अधमरा कर देती है और दिव्या भी उसे रोक नहीं पाई और फिर दृष्टि छलांग लगाते हुए कमरे से बाहर निकल जाती है।


अब आगे.....


दृष्टि छलांग लगाते हुए कमरे से बाहर निकलती है तभी उसकी नज़र सामने से आ रहे सहस्त्रबाहु पर पड़ती है वह कुटिल मुस्कान से मुस्कुराते हुए अपना रूप बदल कर प्रेम बन जाती है।


फिर दौड़ते हुए सहस्त्रबाहु के पास ग‌ई और बोली- गुरुजी गुरुजी दृष्टि भाग ग‌ई हम उसे रोक नहीं पाए।


स.बाहु - ये क्या हो गया अनर्थ. अब तो जैसिका को बचाना और भी मुश्किल हो जाएगा।


रूको मैं अभी अपने छड़ी की मदद से देखता हूं कि वो दुष्ट आत्मा जैसिका को लेकर काहा गई है


सहस्र बाहु अपने छड़ी की मदद से ध्यान लगाते हैं फिर चौंक कर- अरे ये क्या दृष्टि तो यही आस पास है।


तभी कमरे से आवाज़ आई- सर वो मैं नहीं हूं


सहस्र बाहु- ये तो प्रेम की आवाज है वो अगर वहां है तो...


इससे पहले कि वो समझ पाते दृष्टि ने उनसे छड़ी छिनकर तोड़ दिया और कुटिल मुस्कान के साथ मुस्कुराते हुए गायब हो गई,


सहस्र बाहु- डैमेड वो हमें चमका दे ग‌ई ! मैं उसके पीछे जाता हूं तुम कमरे में देखो क्या हुआ है।


सहस्र बाहु दृष्टि के पीछे जाते हैं और उनके शिष्य कमरे में जाते हैं कमरे का तो पुरा नक्शा ही बदल गया था और प्रेम टूटे हुए टेबल के उपर गिरा कराह रहा था वो दोनों जल्दी से प्रेम को उठाकर बेड पर लिटाते है और उसकी मरहम-पट्टी करते हैं


थोड़ी देर में सहस्त्रबाहु निराश होकर आते हैं- उस दृष्टि ने हमे चकमा देकर मेरे छड़ी तोड़ दिया उसे पता था कि हम छड़ी के माध्यम से उसे ढूंढ लेंगे


प्रेम- तो अब क्या करें सर, क्या अब हमारे पास कोई रास्ता नहीं है जैसिका को बचाने का।


हैं एक रास्ता है- एक अदृश्य आवाज आई


प्रेम- कौन हो तुम


अच्छा जिससे रोज चैट किया करते थे उसे भुल गए अब हम इतने भी गैर नहीं थे।


फिर हवा में एक आकृति उभर कर आई वह दृष्टि थी।


सहस्र बाहु- क्या चाहती हो तुम ?


दृष्टि- चुप रह बुड्ढे मैं अपने प्रेम से बात कर रही हूं तू बिच में मत बोल वरना मैं तुम्हें भी कच्चा चबा जाऊंगी।


प्रेम- मुझे बताओ आखिर क्या चाहती हो तुम।


दृष्टि- हां मेरे प्रेम बताती हूं, फिर दृष्टि की आवाज भयानक हो जाती है- आज से तीन दिन बाद अमावस्या है उस दिन मैं तुम्हारे प्यार की बली दूंगी जिससे मेरी आत्मा को शान्ती मिलेगी और साथ ही साथ मेरी शक्तिया भी दोगुनी हो जाएगी।


तुमसे बिछड़े तीन साल हो गए इसलिए मैं तुम्हें तुम्हारे प्यार को बचाने के लिए भी तीन दिन देती हूं , बचा सकते हो तो बचा लो अपने प्यार को नहीं तो ... हां हां हां


सहस्र बाहु मौक़ा पाकर दृष्टि पर वार करते हैं लेकिन दृष्टि पहले से सतर्क थी इसलिए बच गई।


दृष्टि- ना ना बुड्ढे तेरी कोशिशें नाकाम है लेकिन तेरे पास भी तीन दिन का समय है तू भी अपने सर पर लगे पुरे गांव वालों की मौत का कलंक मिटा सकता है तो मिटा ले इसी लिए तो तू यहां आया था ना हां हां हां........... मैं जाती हूं लेकिन याद रखना तीन दिन


प्रेम- सर वो किस गांव की बात कर रही थी ?


सहस्र बाहु- मेरे गांव की जहां लोगों ने मुझे पर पुरे गांव पर के मौत का कलंक लगाया।


प्रेम- पर क्यो ?


सहस्र बाहु- ये मैं तुम्हें अगले भाग में बताउंगा दृव्य दृष्टि- एक रहस्य (कलंक) में लेकिन अभी हमें इस मुसीबत का सामना करना है उसने मुझे ललकारा है मैं उसे नहीं छोडूंगा


प्रेम- कोई उपाय


सहस्र बाहु फिर उदास हो जाते हैं उपाय, लगता है वो सही है हम उससे नहीं लड सकता, उसे हराना नामुमकिन है। मैं जाता हूं अपना ख्याल रखना और हो सके तो जैसिका को भुल जाओ ।


क्या दृष्टि को हराने का कोई उपाय नहीं ?

तो क्या प्रेम हार जाएगा सत्य और असत्य के जंग में?

या कोई नयी किरण बनकर उनके मदद के लिए आयेगा ?


🌻🌻🌻दोस्तो अब ये कहानी अंत की ओर बढ़ रहा है और साथ ही बढ़ रहा है पाठकों को सांसें की क्या होगा आगे।


अपने अमूल्य टिप्पणी जरूर दें इससे मुझे आगे लिखने की प्रेरणा देता है और कहानी अच्छी लगी हो तो रेटिंग कीजिए और अपने दोस्तों से शेयर भी कीजिए।


और अगले भाग को मिस नहीं करना चाहते हो तो मुझे फालो जरूर करें जिससे आपको ऐसे कहानियां रोज पढ़ने के लिए मिले।

दिनेश कुमार दिवाकर

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