महाभारत युद्ध और जीत किसकी ?(भाग 1)

03 अगस्त 2019   |  pradeep   (440 बार पढ़ा जा चुका है)

महाभारत एक युद्ध का नाम है , इसको महाभारत ही क्यों कहा जाता है, महायुद्ध क्यों नहीं कहा जाता. महा का मतलब या तो महान होता है या फिर सबसे बड़ा, तो इस महाभारत का मतलब हुआ महान भारत या बड़ा भारत? महान भारत और युद्ध, कुछ समझ से बाहर की बात नहीं है? जी बिल्कुल ये ज्यादातर लोगो के समझ से बाहर की ही चीज़ है. भारत यहाँ कोई देश नहीं है, क्योकि उस वक्त देश की परिभाषा दूसरी थी, छोटे छोटे राजा थे और हर राजा का अपना देश था उसका अपना नाम था. आज जिस भारत की हम बात करते है उस ज़माने में ऐसा भारत नहीं था बल्कि आज़ादी से पहले तक एक भारत देश नहीं था, अलग अलग राजा थे अलग अलग राष्ट्र थे, आज भी सौराष्ट्र है , महाराष्ट्र है, क्या वो अपने आप में राष्ट्र है? वो आज सिर्फ नाममात्र के राष्ट्र है लेकिन एक वक्त में वो भी राष्ट्र थे. हिन्दुस्तान का नाम भारत कब से प्रचलन में आया? खैर यह की भारत वर्ष कब बना या भारत शब्द कब से प्रचलन में आया यह एक अलग विषय है. हम जिस विषय पर बात कर रहे है वो ये कि उस युद्ध को महाभारत क्यों कहा गया और इस युद्ध में जीत किसकी हुई. स्वम्भाविक है कि जीत पांडवो की हुई , यह हर कोई मानता है. पर क्या यह सत्य है? महाभारत युद्ध को यहाँ हम महाभारत नहीं कहेंगे क्योकि यह व्याख्या ही गलत है , हम इसे महायुद्ध ही कहेंगे. महायुद्ध की नीव तो स्वयं महाराजा भारत ने ही रखी थी. कुछ लोग शायद इस बात से सहमत नहीं होंगे, क्योकि उनके मुताबिक़ महाराजा भरत ने लोकतंत्र की नींव डाली थी? लोकतंत्र यूरोप की और खासतौर से फ़्रांस की विचारधारा है जो हमारे देश में या हिंदू धर्म ( ज्यादातर लोग अपने को हिन्दू मानते या कहते है जबकि यह शब्द भी अपने आप में गलत है, इस शब्द की उत्त्पत्ति संस्कृत से नहीं हुई, यह एक विदेशी शब्द है ,यह भी एक अलग विषय है जिस पर किसी दूसरे लेख में चर्चा करेंगे. ) में नहीं थी, यह विचारधारा भारत में बाहर से यानी यूरोप से ही आई है जिसकी पैरवी गांधीजी ने या ये कहे कि कांग्रेस ने की थी, इसके विपरीत कट्टरवादी हिन्दू इसके खिलाफ थे, वो प्रजातंत्र नहीं राजतंत्र और मनुवाद में विश्वास रखते थे. इसलिए महाराजा भरत ने लोकतंत्र की नींव नहीं डाली बल्कि राजा को अधिकार दे दिया कि वो अपनी मर्जी से किसी को भी राजा या अपना उत्तरधिकारी चुन सकता है, यहाँ जनता का चुनने का कोई सवाल ही नहीं था. यहाँ तक कि महाराजा भरत की माँ, पत्नी, पुत्र और यहाँ तक कि मंत्री भी इस के खिलाफ थे , क्या सब के विरोध के बाद भी महाराजा भरत को अधिकार था अपनी मर्जी से उत्तराधिकार चुनने का? भरत के उत्तराधिकार को जनता ने नहीं, मंत्री मंडल और परिवार के लोगों ने नहीं चुना था, सिर्फ और सिर्फ एक व्यक्ति ने अपने विवेक से चुना जहाँ किसी की कोई राय नहीं ली गई. आज भी कट्टरवादी लोग यही चाहते है कि प्रजातंत्र को खत्म कर दिया जाए और जो भी गद्दी पर विराजमान हो वही अपना उत्तराधिकारी चुनले, यहाँ जनता या किसी की भी राय की कोई ज़रूरत नहीं समझी जाती. इसलिए भरत के बाद मंत्रिमंडल सिर्फ नाममात्र का ही रह गया जिसका उदाहरण महात्मा विदुर है. महाराजा धृतराष्ट्र के दरबार में सिर्फ एक व्यक्ति की ही चलती थी, धृतराष्ट्र की जो पुत्रमोह से ग्रसित था. भरत से पहले शायद यह परम्परा रही होगी कि राजा का बड़ा बेटा ही उत्तराधिकारी होगा. यदि इसी परम्परा को चलाया जाता तो शायद यह युद्ध ना होता क्योकि तब राजा बनने का अधिकार धृतराष्ट्र का होता और ना ही वो पुत्रमोह से पीड़ित होता. भरत के बनाये नियम के कारण ही धृतराष्ट्र को लगा कि यह उसका अधिकार है कि वो राजा या उत्तराधिरि नियुक्त करे और अंत तक वो यही समझाता रहा कि यह राजा का अधिकार है कि वो किसको चुने, जिसको चुनौती सिर्फ महात्मा विदुर ही देते थे बाकी दरबार में ऐसा कोई नहीं था जो चुनौती दे सके. अगर धृतराष्ट्र राजा बना होता तो ना तो शकुनि अपनी बहन की शादी का विरोध करता और ना ही वो इस वंश को बर्बाद करने की शपथ लेता, दुर्योधन क्योकि धृतराष्ट्र का बड़ा पुत्र था इसलिए धृतराष्ट्र का उत्तराधिकारी होता और उसकी पांडवो से दुश्मनी भी ना होती. अगर ऐसा हुआ होता तो यह महायुद्ध भी ना होता. (महाभारत शब्द की बात और आगे कि युद्ध में जीत किसकी हुई के लिए इस लेख के भाग 2 की प्रतीक्षा कीजिये) (आलिम)

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