आरक्षण एक अभिशाप

04 अगस्त 2019   |  pradeep   (3707 बार पढ़ा जा चुका है)

आरक्षण एक अभिशाप

आरक्षण एक अभिशाप है, जो प्रतिभावान की प्रतिभा को ग्रहण लगा देता है. मैं सच्चे दिल से इसका विरोध करता हूँ, पर ऐसे कितने लोग है जो सच्चे दिल से इसका विरोध करते है? यदि सभी आरक्षण विरोधियों ने सच्चे दिल से इसका विरोध किया होता तो कभी भी आरक्षण नहीं होता. हकीकत यह है कि आरक्षण के विरोध में बोलने वाले आरक्षण का विरोध नहीं कर रहे इसके विरोध में वो अपने आरक्षण की मांग रख रहे है. पहले दलितों के लिए आरक्षण था तो बहुत सारे लोग इसके विरोध में थे , उसके बाद एक और वर्ग पिछड़े वर्ग (ओ बी सी ) के लोगों को आरक्षण मिल गया तो उनका विरोध ख़त्म हो गया, और वो आरक्षण के समर्थक हो गए, अब ऊँचे लोगो को भी धीरे धीरे मिलने लगा तो उनके विरोध की आवाज़ भी धींमी होगई .


कौन चाहता है आरक्षण ?


आरक्षण चाहता कौन है, किसके दिमाग की उपज है ये आरक्षण, शायद गांधीजी की या कांग्रेसियों की जिन पर बाबा साहब आंबेडकर का दवाब रहा होगा? इसके लिए अगर दोषी किसी को ठहराया जा सकता है तो गांधीजी, कांग्रेस, और अम्बेडकर को? आरक्षण प्रकृति का विरोध है, क्या प्रकृति ने किसी के लिए आरक्षण की व्यवस्था की है? सूरज अपना प्रकाश और गर्मी देते वक्त नहीं देखता कि किसको दी जाए या किसको नहीं, बारिश बरसती है तो सबके घरों पर बरसती है, आग लगती है तो वो सबको भस्म कर देती है. आग किसी ने लगाईं हो पर उस आग की लपेट में एक ना एक दिन सबको आना पड़ता है. ये जो आरक्षण की आग लगी है इसमें अब जलना तो सबको पड़ेगा. इंसान और जानवर में फर्क होता है और यही कारण है कि जानवरों में आरक्षण नहीं है और इंसानों में है. प्रकृति के दो और नियम है जिसे डार्विन और दूसरे वैज्ञानिकों ने बताया वो है " अस्तित्व के लिए संघर्ष " और " योग्यतम की उत्तरजीविता " . प्रकृति में कमजोरों के लिए कोई प्रवधान नहीं है, परन्तु इंसान ने सभ्यता को जन्म दिया और वो प्रकृति से भी आगे बढ़ गया, इस प्रकृति के विरुद्ध अपने नियम बनाने लगा, जिसे मज़हब या धर्म का नाम दे दिया. लोगों ने प्रकृति के नियम तोड़ने शुरू कर दिए, और अपने नियमों को मज़बूत करने लगे. वही कही से ये आरक्षण के बीज फूटे और आज जब वो पौधा बन गए तब इसका विरोध शुरू हुआ. हमने आरक्षण के बीज बोये ही क्यों थे, जो आज उन पौधो को काटने की बात करनी पढ़ती है? बात यही ख़त्म नहीं होती इससे आगे जाती है, इंसान ने जानवरो को अपना गुलाम बना लिया और उनसे अपने काम कराने लगा, जानवर एक दूसरे को मार कर खाते तो ज़रूर है पर किसी दूसरे जानवर का शोषण नहीं करते, इंसान ने जानवरों का शोषण शुरू कर दिया.


आरक्षण

इससे काम नहीं चला तो ताकतवर इंसानों ने कमजोर इंसानों का भी शोषण शुरू कर दिया. यही कमज़ोर इंसान अब ताकतवर इंसानों की ज़रूरत बन गए तो उन्हें मारने की बजाए उन्हें गुलाम बना लिया गया, और उनसे अपनी सुविधाओं के लिए काम कराया जाने लगा. इन ताकतवर लोगों ने एक और विचारधारा पैदा की ताकि ये कमजोर लोग हमेशा कमजोर बने रहे , और उसे मनुवाद का नाम देदिया. अब कुछ लोग बैठ कर मौज उड़ाने लगे और कुछ लोग उनके लिए अपनी ताकत बढ़ाने लगे, कुछ खेतीबाड़ीऔर पशुपालन में लगा दिए और बाकी कमजोर लोगो को अपना सेवक या गुलाम बना दिया, और उस पर धर्म की मुहर लगा दी ताकि कोई इसका विरोध ना कर सके. यही से शुरुवात हुई आरक्षण की ,कामो का आरक्षण कर दिया गया, शिक्षा से लेकर हर चीज़ पर स्वर्णो यानी ताकतवर लोगो ने अपना अधिकार जमा लिया यानी आरक्षण कर लिया. अपने स्वार्थ के लिए भगवान् राम को भी नहीं छोड़ा, और अपने तर्क को सही बताने के लिए राम पर भी दोष लगा दिया कि उन्होंने भी एक शूद्र शम्बूक की हत्या की थी, क्योकि शम्बूक ने ज्ञान अर्जित कर लिया था और बाकी लोगो में भी ज्ञान बाट रहा था. इन्ही लोगो ने भगवान् हनुमान को राम का सेवक बना दिया जबकि स्वयं राम उन्हें अपना भाई मानते थे, " तुम मम प्रिय भरत सम भाई ", आज तो उन्हें दलित भी बता दिया गया है.

आरक्षण की यह प्रतिकिर्या हज़ारों सालो से चली आ रही है और आज भी हमारे समाज में है. शादी में अगर दलित घोड़े पर बैठ जाए तो उसे पीटा जाता है, किसी दलित को या उसके परिवार को सज़ा देनी हो तो उनकी औरतों को नगा कर घुमाया जाता है, ये बाते हज़ारो साल से आज तक चली आ रही है, इसका विरोध तो हम नहीं करते क्योकि ये जाति प्रथा तो भगवान् ने बनाई है? ये भगवान् सिर्फ स्वर्णो का ही भगवान् हो सकता है जिसे वे मनु कहते है और उस विचारधारा को मनुवाद. कर्ण को शिक्षा ना देना, और उसे शाप देना, एकलव्य की ऊँगली काट लेना ये सब क्या आरक्षण के प्रतीक नहीं थे? हज़ारों साल के अत्याचार के बाद अगर उनको आरक्षण मिला तो प्रतिभा , और प्रतिभा के साथ भेदभाव दिखने लगा. इसलिए लेख के शुरू में ही कहा गया है कि क्या हम सच्चे दिल से आरक्षण का विरोध करते है? क्या हम इन जात पात के बंधनों को तोड़ने के लिए तैयार है, क्या कोई स्वर्ण जाति का अपनी बेटी का हाथ दलित को देने को तैयार है? कितने सवाल आज भी बाकी है, कितनी असमानता आज भी है, फिर भी हम आरक्षण का विरोध कर रहे है? ज़रूर विरोध कीजिये पर हर तरह के आरक्षण का, मंदिरों के दरवाज़े खोल दो सबके लिए, देदो पूजा पाठ कराने का अधिकार दलितों को भी, करो ब्याह शादियां दलितों के साथ , बनाओ पारिवारिक सम्बन्ध उनके साथ , जिस दिन ये सब हो जाएगा आरक्षण अपने आप ख़त्म हो जाएगा. (आलिम)

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बहुत अच्छा

इसे ही कहते सच्चा लेखन जो सत्य बोलता है।

pradeep
04 अगस्त 2019

धन्यवाद त्रिशला जी, आगे भी अपने विचारों से अवगत कराते रहियेगा .

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