लो हो गयी भोर

07 अगस्त 2019   |  प्रमोद रंजन कुकरेती   (467 बार पढ़ा जा चुका है)

लो हो गयी भोर

सांझ ढलने को थी जब उसकी ऑख खुली थी । उसने अपनी नजर को कमरे के चारों ओर घुमाया, ये उसका कमरा नहीं था । सामने खिडकी खुली थी और सामने खूबसूरत पहाडियां नजर आ रही थी । आकाश में पंछियों के झॅुड अपने घरोंदो की ओर जा रहे थे । जिस बिस्‍तर पर वो लेटी थी वो शायद किसी अस्‍पताल का था । सामने लगे आयने में स्‍वाति ने अपने आप को देखा । सब कुछ अस्‍त व्‍यस्‍त और जिहवा में शराब का कसैला स्‍वाद अभी भी बाकी था । सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा था । शराब का नशा उतरने पर अक्‍सर उसके साथ ऐसा ही होता है । उसने सामने रखे जग से गिलास में भर कर पानी पिया । उसका गला सूख रहा था । वो यहॉ कैसे पहॅुची , ये सवाल उसे परेशान कर रहा था । उसे याद था तो बस इतना कि सुबह जब सूरज अपने काम पर निकल गया था तो उसने शराब की एक बोतल उसकी आलमारी से निकाल ली थी । दोनों बेटे स्‍कूल जा चुके थे और उनके आने में अभी काफी वक्‍त था । अक्‍सर वो ऐसा करती रहती है ,यही सोच कर की एक आध पैग ले लिया जाये और जब तक बच्‍चे स्‍कूल से वापस लौटेगे उसका नशा उतर जायेगा । वो अपनी समझ से यही सोचती रही कि उसके बच्‍चों को कुछ मालूम नहीं चलेगा पर उसकी अस्‍त व्‍यस्‍त हालत और मॅुह से आती दुर्गंध से बच्‍चे सब समझ जाते थे । बडा बेटा जो लगभग पन्‍द्रह साल का था समझदार था और उसे उसकी चिन्‍ता भी थी । पर छोटा वाल उसके इस रुप को देखकर अक्‍सर डर जाता था । डर के मारे उसने उसके पास आना तक छोड दिया था । उसके पति सूरज को बडी बडी पार्टियों में जाने का शौक था और वो आधुनिकता की दौड में दौडना चाहता था । आज सुबह जब उसने पीना शुरु किया तो पीती ही चली गयी और घर में क्‍या हुआ उसे याद ही नहीं था । अब वो अपने दिमाग पर जोर डालकर याद करने का प्रयास कर रही है कि आखिर वो इस जगह पर कैसे पहॅुची । ये कौन सी जगह है और उसे यहॉ कौन लाया है। अचानक दरवाजा खुलने की आवाज हुई । दो युवतियां साधारण वेशभूषा में उस कमरे में प्रवेश करती है। वो उनसे सवाल करती है,’ ये कौन सा अस्‍पताल है और मुझे कौन यहॉ लेकर आया है ? ‘ उनमें से एक युवति मुस्‍कराते हुये जबाब देती है ‘ मैडम , ये अस्‍पताल नहीं हैं । ये नशा मुक्ति केंन्‍द्र है , और हम विश्‍वास के साथ कहते हैं कि हम आपको इस लत से मुक्ति दिलवाकर आपका हॅसी खुशी का जीवन आपको लौटा देगें । हॉ, आपके पति श्री सूरज जी ही आज सांय को आपको यहॉ छोडकर गये है। शायद कुछ देर में वो यहॉ आने वाले ही होगें । ‘

वो बिफरी,’ नही, मुझे यहॉ नहीं रहना है । आप नहीं जानती शराब मेरे शरीर की जरुरत है । अगर मैं शराब नहीं पीयॅूगी तो मर जाउॅुगी । तुम सब मुझे मारना चाहते हो । कहॉ है सूरज, उसे भी यहॉ भर्ती करो । अरे उसने ही तो मुझे शराब पीना सिखाया था । उसे भी भर्ती करो अपने केन्‍द्र में । ‘

ऐसा बोलकर वो दरवाजे की ओर दौडने लगी । वो जोर जोर से चिल्‍ला रही थी । अपने हाथ पैरो को पटक रही थी । उसकी चिल्‍लाहटों से पूरे केन्द्र में हंगामा खडा हो गया था । केन्‍द्र के और भी तामीरदार वहॉ एकत्र हो गये थे । वो चिल्‍लाये जा रही थी और लगातार बाहर की ओर भागने का प्रयास कर रही थी । बडी मुश्किल से उन लोगों ने उसे काबू कर दुबारा उसे उसके विस्‍तर पर बैठा दिया था । वो हॉफ रही थी । बेबसी उसके चेहरे पर झलक रही थी । सभी उसे शांत भाव से देख रहे थे । किसी को उसके प्रति गुस्‍सा नहीं था हालांकि वो उनको लगातार भददी भददी गालियां बक रही थी । उसके प्रति एक दया का ही भाव था सबके मन में ।

ये उनके रोज का काम था । केन्‍द्र में नित्‍य ही नये रोगी लाये जाते है । मरीज को लाने वालों में ज्‍यादातर बेबस पत्नियां होती है जिनके पति की शराब की लत ने उनके परिवारों को बर्बाद कर दिया होता है या फिर कुछ माता पिता जो अपने जवान बेटे की इस लत से परेशान हो गये होते है । युवतियां और औरते भी आती है कभी कभी । समाज को शराब की इस लत ने कितना खोखला कर दिया है इस केन्‍द्र के लोग ही जानते हैं अच्‍छी तरह से । उन्‍हे ये भी अच्‍छी तरह पता है जब पहली पहली बार इस लत का शिकार व्‍यक्ति इस केन्‍द्र में आता है तो बहुत हंगामा करता है । ज्‍यादातर रोगी तो हिसंक भी हो जाते हैं ।

स्‍वाति का गला सूख रहा था । उसने अपने दोनों हाथ अपनी छाती पर रखे हुये थे । उसके माथे से पसीने की बॅूदें टपक रही थी । उसने इशारे से पानी मॉगा । नर्स ने अपने हाथों से उसे पानी पिलाया और बडे स्‍नेह से उसके माथे पर हाथ फेरा । वो जानती है कि ऐसी दशा में मरीज के भीतर ही भीतर बडी बैचेनी और घबराहट होती है । अचानक स्‍वाति फिर से बिफर गयी और जोर जोर से चिल्‍लाने लगी, ‘ अरे ज्‍यादा नाटक मत कर । मेरे पति को बुलवा मुझे अभी इसी वक्‍त वापस घर जाना है । ‘ ऐसा चिल्‍लाते हुये वो एक बार फिर से बिस्‍तर से उतर दरवाजे की ओर दौडने लगी । फिर से उसे काबू में कर लिया गया । इस हंगामे को सुनकर इस केन्‍द्र की प्रभारी माया भी वहॉ पहॅुच गयी । वो बिना वेतन के अपनी इच्‍छा से यहॉ काम करती है । वो भी भुक्‍त भोगी है इस नशे की लत की जब उसके पति की इस आदत ने उसकी जिन्‍दगी नरक बना दी थी । बस उसी दौरान उसे पता चला था कि इस केन्‍द्र में अधिकतर लोग या तो बिना वेतन के काम करते हैं या नाम मात्र के वेतन में अपनी सेवाये प्रदान करते है । केन्‍द्र में कुछ डाक्‍टरों का भी नियमित आना जाना है । सब स्‍वेच्‍छा से अपनी सेवायें देते है। समाज के प्रति अपनी जिम्‍मेदारी को समझते हैं । कुछ लोगों के सहयोग से दवा पानी की व्‍यवस्‍था हो जाती है और कुछ रकम मरीजो के घरवाले दे जाते है।

दरवाजे के खुलने की आवाज हुई । सूरज और उसके दोनों बेटे कमरे में आ गये । सूरज के हाथ में एक बहुत बडा टिफिन है । बडा बेटा इवान अपनी मॉ के पास आकर उससे लिपट गया पर छोटा शिवान दूर ही दरवाजे के समीप खडा रहा । उसकी ऑखो में डर था , अपनी मॉ को इस हालत में देखकर वो डर जाता है । उसे समझ नहीं आता कि उसकी मॉ को क्‍या हो गया है । वो अपने पापा का हाथ जोर से पकड लेता है । स्‍वाति इवान से गले लिपट कर जोर जोर से रोने लगती है , इवान की ऑखों में भी ऑसू आ जाते है । उसे इतनी समझ है कि उसकी मॉ को शराब की लत पड गयी है । छोटी सी उम्र में वो एक बडी जिम्‍मेदारी को समझने लगा है । पिछले साल तक तो सभी कुछ ठीक ठाक था पर ना जाने गत कुछ समय से ऐसा क्‍या हुआ कि उसकी मम्‍मी ने अपने ऐसे हालात कर लिये । सूरज स्‍वाति के नजदीक जा उसके सर पर अपने हाथ फेरता है । स्‍वाति डबडबायी ऑखों से उसकी ओर देखती है । उसकी हॅसती खेलती दुनिया उजड गयी है । कहीं अपने ही ख्‍यालों में गुम है वो । अतीत की ओर मुडना चाहती है । एक अतीत जो बहुत सुन्‍दर था , पर अचानक अवसाद के इस मोड पर स्थित वर्तमान कितना कष्‍टकारी हो गया है । अचानक उसकी निगाहें शिवान पर पडती हैं जो अपने पिता के पीछे छुपकर खडा टकटकी लगाये उसे ही देख रहा है । वो उसे इशारे से अपने पास बुलाती है । शिवान अपने पापा को कसकर पकड लेता है और स्‍वाति की निगाहों से बचने का प्रयास करता है । स्‍वाति उसे देखकर बार बार उसे अपने पास बुलाती है पर शिवान उसके पास आने को तैयार ही नहीं होता है । स्‍वाति जोर जोर से रोने लगी है , उसकी ममता उमड कर बिखर जाना चाहती है । ‘ शिवान ओ शिवान, तू मेरे पास आता क्‍यों नहीं है । ‘ उसे इस बात का बडा मलाल है उसका बेटा भी उसके पास आने को तैयार नहीं है । बस उसी समय उस केन्‍द्र की प्रभारी माया कमरे में प्रवेश करती है । उसके हाथ में इंजेक्‍शन की सीरींज है । वो अच्‍छी तरह जानती है कि इस प्रकार के रोगी को बहुत बैचेनी होती है और बिना शराब के इन्‍हें नींद भी नहीं आयेगी । वो स्‍वाति को इंजेक्‍शन लगाती है । कुछ ही देर में स्‍वाति की ऑखे भारी होने लगती है । सूरज शिवान को समझा कर स्‍वाति के समीप कर देता है । वो उसके सर पर हाथ रख देती है और बहुत देर तक हाथ फेरती रहती है । बस ऐसे ही हाथ फेरते फेरते स्‍वाति को नींद आ जाती है ।

माया सूरज से अपने कक्ष में आने को कहती है । वो स्‍वाति की ये दशा कैसे हुई इसपर पर विस्‍तार से चर्चा करती चाहती है । इस तरह के उपचार में रोगी से संबधित सभी जनों का सहयोग जरुरी होता है । दवाईयों के अतिरिक्‍त मरीज को मानसिक रुप से भी तैयार करना आवश्‍यक होता है । इस चर्चा के दौरान ही उसे पता चलता है कि जब स्‍वाति विवाह करके उस घर में आयी थी बडी शोख और चंचल थी और किसी भी तरह का व्‍यसन नहीं करती थी । सूरज एक संपन्‍न्‍ परिवार से संबधित था और उसका बडी बडी पार्टियों में आना जाना था । घर में सास ससुर हैं बहुत ही धार्मिक विचारों के । सूरज के साथ पार्टियों में जाना स्‍वाति को बिलकुल भी पसंद नहीं था । सूरज के सभी दोस्‍त संपन्‍न घरों से थे और बिलकुल आधुनिक विचारधाराओं के थे । जब सभी मिलते तो अपनी पत्नियों के संग मिलते और मौज मस्ति के लिये वर्तमान की आधुनिकता में डूब जाते । नाचना गाना नशा जो कुछ भी आधुनिकता कहा जाता है सब कुछ चलता । सूरज पर पिछडी सोच का होने का व्‍यंग करते । बस इसी कारण से सूरज भी स्‍वाति को पार्टियों में सम्मिलित होने के लिये दबाब बनाता । घर की जिंदगी भी उसे नीरस लगती । माता पिता का स्‍वास्‍थ भी ठीक नहीं चल रहा था और दोनों बच्‍चों के हो जाने के बाद स्‍वाति उसके प्रति और भी उदासीन हो गयी थी । दिन भर सास ससुर की सेवा करती और बच्‍चों के साथ ही अपना समय बिता लेती । बच्‍चे अब काभी बडे हो गये थे और घर में अकेले रहने लायक भी हो गये थे । अपने दादा दादी का भी ध्‍यान रखने लगे थे ।

एक दिन उसके मित्र की शादी की पच्‍चीसवीं वर्षगॉठ थी और मित्र ने बडे आग्रह से दोनों को आने का निमंत्रण दिया था । सूरज के अनुरोध पर स्‍वाति इस बार इस आयोजन में जाने को तैयार हो गयी थी । स्‍वाति बहुत दिनों बाद सजधज के तैयार हुई थी और बहुत ही सुन्‍दर दिखलाई पड रही थी । सूरज ने उसे देखा तो देखता ही रह गयी । बच्‍चों ने भी आयोजन में जाने की जिदद की तो सूरज ने दादा दादी के साथ रहने की बात कह कर ऊन्‍हें ना जाने के लिये मना लिया । दोनों बच्‍चें भी अपनी मम्‍मी को इस तरह सजीधजी देखकर बहुत खुश हो रहे थे । स्‍वाति भी अपने विचारों के अतीत में कहीं डूब गयी थी । कितना शौक था उसे अच्‍छी अच्‍छी ड्रैस पहनने का , नाचने का , गाने का । वो जब कभी किसी फ्‍कशन में जाती थी तो सब के आकर्षण का केंन्‍द्र बन जाती थी । शादी विवाह के महिला संगीत के कार्यक्रमों की वो जान होती थी । इन कार्यक्रमों में जब वो अपनी प्रस्‍तुति देती तो लोग बार बार उसे निमंत्रित करते थे । कितनी प्रसन्‍नता मिलती थी उसे । और इस प्रसन्‍नता से उसके चेहरे पर एक तेज उभर जाता था और मुसकराती खिलखिलाती स्‍वाति और भी सुन्‍दर दिखायी पडती थी । सूरज ने भी स्‍वाति को किसी महिला संगीत के कार्यक्रम में ही पहली बार देखा था और तभी उसने अपने घर में इस लडकी से अपनी बात चलाने की बात कही थी । दोनों ही परिवार प्रतिष्ठित थे और सब कुछ साम्‍य था तो बात बन गयी थी ।

स्‍वाति सूरज के साथ पार्टी मे जाने के लिेये निकल रही थी । अपने दोनो बेटो को उसने दिल भर के प्‍यार किया और सास ससुर के पास जाकर जाने की अनुमति मांगी और शीघ्र से शीघ्र वापस घर आने का आश्‍वासन भी दिया । कीचन में उन सब के लिये रात्रि का भोजन तैयार कर के रख दिया था और बडे बेटे को दादा दादी को कुछ समय बाद भोजन करवा देने का निर्दश भी दे दिये । बाय बाय करती स्‍वाति पोर्च में खडी कार में सूरज के बगल में जाकर बैठ गयी । सूरज एक बार से फिर उसे देखता का देखता ही रह गय । आज सूरज भी बहुत प्रसन्‍न था ना जाने कितने समय के बाद पत्नि सहित किसी आयोजन में सरीक होगा । कार घर के मेन गेट से बाहर निकल रही थी और दोनों बच्‍चें हाथ हिला हिला कर उन्‍हे विदा कर रहे थे । कालोनी की गलियों से निकलने के बाद स्‍ट्रीट लार्इटों की चमक धीमी पड गयी थी । सामने चौडी और लंबी सडक थी । ये सडक उसे कहॉ ले जा रही है इस बात का उसे अंदाजा बिलकुल भी नहीं था । उसे इस बात का अंदाजा ही नहीं था कि जीवन में टिमटिमाती रोशनियों के पार कोई ऐसा रास्‍ता भी होता हे जो कभी कभी घनघोर अंधेरे की तरफ चल देता है ।

किसी बडें होटल का कोई बहुत बडा हॉल था । रंग बिरंगी लाईटें और तेज संगीत का शोर था । पूरे हॉल में मंदिम सी रोशनी थी । कुछ लोग यहॉ वहॉ संगीत की धुन पर थिरक भी रहे थे । सिगरेट का धॅुआ भी उड रहा था और एक अजीब सी महक थी जो वातावरण को रहस्‍यमयी बना रही थी । एक बडी सी मेज के इर्द गिर्द पॉच सात परिवार इकटठे हो रखे थे । सभी से पहले से ही परिचित थी स्‍वाति । औपचारिक अभिवादन के बाद वो भी सूरज के साथ अपनी सीट पर बैठ गयी थी । बीच में एक बडा सा केक सजा था । दिवांश और दिप्‍ती यही नाम था जोडे का जिनकी आज शादी की पच्‍चीसवीं सालगिरह थी । अचानक स्‍टेज से ऐनाउन्‍समेंट हुआ जहॉ से दोनों को सिल्‍वर जुबली पर बधाई दी गयी । कुछ पल के लिये संगीत रोक दिया गया । दिवांश और दिप्‍ती ने मिलकर केक काटा । सभी लोग दोनों को बधाई दे रहे थे । दिवांश और दिप्‍ती सबके सामने ही आलिंगन में बंध गये थे और एक दूसरे को चूम रहे थे । स्‍वाति ये देखकर शर्मा रही थी । पर भीतर ही भीतर एक रोमांच सा भी हो रहा था । उसने सार्वजनिक रुप से इस तरह का प्रेम प्रदर्शन कभी नहीं देखा था , हॉ फिल्‍मों इस तरह की सीन उसने देखे थे । फिल्‍मों जब इस तरह के दृश्‍य वो देखती थी तो भी वो शर्मा जाती थी , यहॉ तो वास्‍तव में सब कुछ हो रहा था । उसने सूरज की तरफ आश्‍चर्य से देखा उसने इशारे ही इशारे ही में जता दिया कि इस वातावरण में ये सब कुछ सामान्‍य है । उसके बाद सभी के सामने ड्रिक्‍स सर्व की गयी । उसके सामने भी एक गिलास रखा था । उसने इशारे से वेटर को बुला कर जूस लाने को कहा । इस पर वहॉ उपस्थित सभी जोर जोर से हॅसने लगे । अरे भाभी जी आज चखकर देखो , जिन्‍दगी का लुत्‍फ आ जायेगा । उसने सख्‍ती से मना कर दिया । सूरज को शायद इस आधुनिक परिवेश में ये पिछडापन लगा उसने अजीब सा मॅुह बना लिया और धीरे से कहने लगा ,’ बस दो चार बॅूद डालकर पानी मिला लो । इनकी बात भी रह जायेगी और कुछ बिगडेगा भी नहीं । बहुत दिनों बाद सूरज के साथ निकली थी। उसका मूड खराब नही करना चाहती थी तो उसने दो चार बॅूदे अपने गिलास में डालकर पानी मिला लिया । सभी लोग चहक उठे और चियर्स चियर्स चिल्‍लाने लगे । मानों ना जाने कौन सी दुनिया जीत ली है उन्‍होने । बुरे काम करने वालों की मंडली में जब कोई शरीफ आदमी शामिल होता है तो वो अपने आप को सही समझने लगते है । स्‍वाति ने जैसे ही गिलास मॅुह से लगाया शराब की महक उसके नथूने पर पडी और कसैला स्रवाद उसकी जिहवा पर उतर आया । उसे उबकाई सी हुई । किसी तरह उसने आप को संभाल लिया । ना जाने कब किसी ने उसके गिलास में कुछ और शराब मिला दी । थोडी ही देर में उसकी ऑखे भारी होने लगी और जुबान लडखडाने लगी । उसे लगा कि वो अपने आप को भूलने लगी है । इधर तेज म्‍यूजिक की आवाज ने माहौल को और भी मादक बना दिया । सभी लोग डांस फ्‍लोर पर जाकर नाचने लगे । सभी बिलकुल आजाद थे , एकदम छुटटे । जिसकी इच्‍छा हो वो उसका हाथ पकड ले , बाहों में भर ले , चूम ले , कुछ भी कर ले जो जिसकी मर्जी हो । आदमी समाज से निकलकर, जानवरों के झुंड में जा जानवर सा नजर आता था । स्‍वाति अभी भी अपनी सीट पर सूरज के साथ बैठी थी । सूरज को बुरा लग रहा था , वो चाहता था कि वो दोनों भी कुछ देर के लिये जानवर बन जायें जैसे उसके और दोस्‍त लोग बने हुये थे । उसने स्‍वाति को कमर से पकडा और धीरे धीरे डांस फ्‍लोर की ओर ले चला । बस ना जाने क्‍या हुआ , अचानक स्‍वाति डांस फ्‍लोर पर थिरकने लगी । उसे नाचता देख सभी दंग रह गये । सूरज के चेहरे पर भी एक मुस्‍कान उभर आयी । सूरज और स्‍वाति बहुत देर तक डांस करते रहे , इसके बाद जब वो दोनों पसीने से तर बतर हो गये तो अपने स्‍थान पर आकर बैठ गये । उसके सभी मित्रगण और उनकी पत्नियां उनके समीप आ गये । सभी स्‍वाति के डांस की तारीफ कर रहे थे । इतनी सारी तारीफें सुनकर स्‍वाति को भी बहुत अच्‍छा लग रहा था । देर रात पाटीं समाप्‍त हो गयी । वो सूरज के साथ घर पहॅुच गयी थी । लडखडाते कदमों से जब घर पहॅुची तो सिवा इवान के सभी सो चुके थे । इवान आश्‍चर्य भी नजरों से अपनी मम्‍मी को देख रहा था । उसने ऐसी हालत में अपनी मम्‍मी को कभी नहीं देखा था । हॉ, अपने पापा को बेहद नशे की हालत में वो कई बार देख चुका था । सूरज ने उसे इशारे से अपने कमरे में चले जाने को कहा और वो चुपचाप अपने कमरे में चला गया । पूरी रात वो सो ना सका । उसे लगा कि कही कुछ बहुत गलत हो गया है । इधर सूरज और स्‍वाति अपने शयन कक्ष में थे । सूरज ने स्‍वाति को बिस्‍तर पर लेटाया और उसके अपने कपडे बदल कर कमरे की लाइटे् बंद कर दी । स्‍वाति सूरज से कसकर लिपट गयी थी । कोई डर था उसके भीतर वो संरक्षण चाहती थी । उसने अपने आप को सूरज को सौंप दिया था बडी उन्‍मुक्‍तता से । स्‍वाति में ऐसा खुलापन उसने अपने वैवाहिक जीवन में कभी नहीं देखा था । प्रेम के इस उन्‍माद में ना जाने कब सुबह हो गयी ।

सवेरे सवेरे जब स्‍वाति की नींद खुली तो उसने सबसे पहले अपनी अस्‍त व्‍यस्‍त हालत को ठीक किया । जग से निकालकर दो गिलास पानी पिया और डे्सिंग टेबल पर अपने आप को निहारा । सबसे पहले अपने दोनों बच्‍चों के कमरों में गयी । छोटा बेटा अभी भी सो रहा था और बडा जगा हुआ था । उसकी ऑखों से लग रहा था कि वो पूरी रात नही सोया है । उसने उसके समीप जाकर उसे अपने सीने से लगा लिया और पूछने लगी, ‘ कहो क्‍या बात है , रात को नींद नहीं आयी क्‍या ? ‘ उसने स्‍वाति को कुछ भी जबाब नहीं दिया सिर्फ उसकी ऑखे डबडबा गयी थी । बस उसके बाद उसकी दैनिक दिनचर्या सामान्‍य तरीके से आरम्‍भ हो गयी । सबके लिये नाश्‍ता तैयार किया, बच्‍चों के लिये स्‍कूल का टिफिन लगाया । और बच्‍चों को स्‍कूल के लिये छोडने के लिये हमेशा की तरह गेट तक भी गयी ।

बच्‍चे स्‍कूल जा चुके थे । कामवाली बाई भी घर का सारा काम निपटा के जा चुकी थी । सास ससुर को दिन का खाना खिलाकर अपने कमरे में पहॅुची । थोडी देर के लिये टी वी देखने लगी पर टी वी में उसका मन ही नहीं लगा । एक पुरापी मैगजीन पडी थी उसी के पन्‍ने पलटने लगी । कल रात की एक एक बात उसे याद आ रही थी । कहीं कुछ गलत हुआ है , नहीं नहीं कहीं कुछ गलत नहीं हुआ है । ये तो आजकल की सामान्‍य सी ही बात है । शायद कल रात उसने अपनी जिन्‍दगी जी थी , अपने आपको अपने भीतर से निकालकर बाहर फेंक दिया था उसने । कितना नाची थी । जो कुछ उसे अच्‍छा लगा था वो सब कुछ ही तो किया था उसने । और रात में सूरज का साथ कितना रोमांटिक था । सूरज तो हमेशा ऐसे ही प्‍यार की उम्‍मीद उससे लगाये रखता था लो कल उसकी भी साध पूरी कर दी थी उसने । पर , पर क्‍या सुबह सुबह इवान का मुरझाया हुआ चेहरा, उसकी डबडबायी भीगी ऑखे । चलो एक ही दिन की तो बात थी । आगे ऐसा कभी नहीं होने दॅूगी । और छोटे बेटे को तो कुछ भी पता नहीं है । सास ससुर को भी कुछ पता नहीं है । ये कैसा आनंद था जिसने उसके भीतर एक अपराध बोध भर दिया था । ऊसे अपने आप को नियंत्रित करना होगा । क्षण भर की खुशी के लिये जीवन भर का अपराधबोध , कितनी भारी कीमत है । बस इसी उधेड बुन में ना जाने समय कैसे गुजर गया । बच्‍चे स्‍कूल से वापस आ चुके हैं । अपनी अपनी ड्रेस बदलकर हमेंशा की तरह डाईनिंग टेबल पर बैठ गये हैं। उसने बडे प्रेम से दोनों को खाना खिलाया । खाना खाने के बाद दोनों हमेशा की तरह अपने बैड रुम में सोने के लिये चले गये । रोज की तरह चार बजे के करीब उसने उन्‍हे गाया । बडें बेटे को चाय के साथ बिस्‍कुट और छोटे को हारलिक्‍स मिला दूध चाहियें होता है । उसके बाद बडा अपनी टयूशन पर चला जाता है । शिवान को पढाने के लिये टीचर घर पर ही आती है । टयूशन के बाद इवान फुटबाल खेलने के लिये चला जाता है और छोटा आस पास के बच्‍चों के साथ खेलने लगता है । शाम का समय ही है जो वो अपने सास ससुर के साथ गुजारती है । उसकी सासु मॉ स्‍वभाव की बहुत अच्‍छी है । उसे कभी लगा ही नहीं की वो सुसराल में रहती है । बिलकुल अपनी बेटियों की तरह रखती है उसको । अचानक मॉ जी ने पूछ लिया, ‘ बेटी कल रात बहुत देर से घर आयी थी । सब कुछ ठीक ठाक तो है ना ।- दरअसल उन्‍हे सूरज की शराब पीने की लत के बारे में पता है और उन्‍हें डर था कि कहीं उसने ज्‍यादा पीकर कोई उत्‍पात तो नहीं कर दिया । पर स्‍वाति के बारे में तो वो ऐसा सोच ही नही सकती थी । ‘ जी मॉ जी, बस पार्टी में ही रात देर हो गयी थी । सब कुछ सामान्‍य ही था । ‘ ये सुनकर सासु जी को बहुत तसल्‍ली हुई थी। एक झूठ , कितना बडा झूठ था ये । उसकी जिन्‍दगी का सच करवट बदल चुका था । उसकी शांत जिनदगी में किसी ने कोई कंकड उछाल दिया था । बस उसे तसल्‍ली थी तो बस इतनी सी बात की कि मॉ जी को कुछ पता नहीं चला था ।

बच्‍चे रोज की तरह वापस आ गये थे और अपना अपना होम वर्क कर रहे थे । सास ससुर को भी उसने रात का भोजन करा दिया था । आज सूरज भी जल्‍दी आ गया था । बच्‍चों के लिये ढेरो चीजे लाया हुआ था । अपने पिता से बहुत उम्‍मीदें रखते हैं बच्‍चे । कुछ दिनों तक यों ही सामान्‍य सा चलता रहा । कभी कभी स्‍वाति अपने पार्टी में गये दिन को याद करती तो बहुत रोमांचित हो जाती । उसे लगा कि जिन्‍दगी में कभी कभी बदलाव भी जरुरी है । महीने दो महीनों में अगर ऐसा कुछ हो भी जाये तो इसमें हर्ज क्‍या है । एक दिन उसने अपनी डाइ्रनिंग टेबल पर एक निमंत्रण्‍ कार्ड देखा । सूरज के किसी दोस्‍त के यहॉ कोई पार्टी थी । सूरज ने उससे पार्टी में चलने का जिक्र तक नहीं किया था । पहले तो वो कितनी बार उसकी मिन्‍नतें करता था । सांय को जब सूरज उसके साथ अकेला था तो उसने पूछ ही लिया,’ सूरज ये कार्ड बहुत दिनों से पडा है किसका है । और फंकशन कब है। ?’ ‘ बस इसी इतवार को है , तुम चलोगी क्‍या ?’ ‘ सोच रही हॅू अगर तुम ले जाओगे तो चल लॅूगी । ‘ सूरज को बडा आश्‍चर्य हुआ था सुनकर । ‘ ठीक है सन्‍डे को सांय को तैयार रहना । ‘

रविवार की सांय वो सूरज के आने से पहले ही तैयार हो गयी थी । आज भी दोनों बच्‍चे साथ चलने की जिद कर रहे थे । बडा बेटा इवान अच्‍छी तरह समझता था कि उन दोनों का अपने मम्‍मी पापा के साथ जाना कितना जरुरी है । वो अच्‍छी तरह जानता था इस तरह की पार्टियों में जाने का मतलब । जब सूरज पहॅुचा तो स्‍वाति सजधज कर तैयार बैठी थी । आज उसने बिलकुल आधुनिक ड्रेस पहन रखी थी । जीन्‍स और टाप में स्‍वाति बिलकुल कम उम्र की युवति सी दिख रही थी । पर बच्‍चों को तैयार होते देख उसका मूड आफ हो गया । उसने बच्‍चों को समझाया कि सिर्फ पति पत्नि को बुलाया गया है इसलिये तुम कभी ओर चलना । समझदार बच्‍चे थे एक बार में ही समझ गये थे । क्‍यों कि शाम के समय ज्‍यादातर बच्‍चे अपने दादा दादी के साथ रहते थे तो उन्‍हे कुछ दिक्‍कत भी नहीं लग रही थी ।

आज की पार्टी की तो बात ही कुछ और थी । पहले से ज्‍यादा चकाचौंध थी । सूरज के दोस्‍त विनय का जन्‍म दिन था । विनय अविवाहित था । उसके जन्‍म दिन में शामिल होने के लिये उसकी कई महिला मित्र भी आ रखी थी और मित्रता के दायरे के सभी लोग सपत्नि सरीक हुये थे । विनय के साथ एक बहुत ही सुन्‍दर प्‍यारी सी नवयुवति खडी थी । उसने सूरज के कान में फुसफुसा के पूछा, ‘ कौन है ये युवति ?’ प्रत्‍युत्‍त्‍र में सूरज मुस्‍कराया,’ बस इसी से विवाह होने वाला है विनय का । ‘ स्‍वाति सोचले लगी , शादी से पहले इतनी रात अपने होने वाले पति के साथ । ऐसा भी होने लगा है उसके लिये इसे स्‍वीकार करना मुश्किल हो रहा था । पर पार्टी अपने रंग में आने लगी । इस बार भी उसके सामने गिलास रखा गया पर उसने इस बार पहले की तरह जूस का गिलास नहीं मंगवाया । उसको भी शराब परोसी गयी । और इस बार उसने बिना किसी हील हुज्‍ज्‍त के गिलास उठा लिया । सूरज आश्‍चर्य से उसकी ओर देख रहा था । आज सूरज की ऑखों में पहले जैसी चमक नहीं थी । जब तक स्‍वाति मना करती थी तब तक तो वो उसे शराब पीने की जिद करता था । आज ना जाने क्‍यों सूरज को ही स्‍वाति का इस तरह आसानी से शराब को स्‍वीकार करना बुरा लग रहा था । वो धीरे से फुसफुसाया ,’ अरे स्‍वाति ये तुम क्‍या कर रही हो ?’ स्‍वाति उसकी तरफ मुस्‍करा कर देख रही थी । उसने उसे कुछ जबाब ही नहीं दिया तो सूरज एक बार फिर से बोला,’ अरे , जल्‍दी घर जाना है , बच्‍चे भी तो हमारा इंतजार कर रहे हैं। ‘ स्‍वाति ने भी जबाब दिया ,’ प्‍लीज सूरज , आज मेरा मन कर रहा है । देखो पिछली बार पी थी तो रात को घर में कितना मजा आया था । तुम्‍हीं तो कह रहे थे ना । ‘ ‘ चलो एक काम करो , यहॉ बस ये ही एक पैग पी लो , घर पर बच्‍चे हमारा इंतजार कर रहे हैं । घर पर भी शराब रखी है । बच्‍चों को सुलाकर हम दोनों आराम से इनजाय करेगें । ‘ स्‍वाति ने इसके लिये हामी भर दी । स्‍वाति मन ही मन मुस्‍करा रही थी । हिन्‍दुस्‍तानी मर्द है ना बस जल्‍दी से पति बन जाता है । खुलापन उसे तभी तक पसंद है जब तक कि उसकी बीबी पर्दे के पिछे छुपी दिखाई दे । खुद ही पर्दा उठाने की कोशिश करेगा और खुद ही लबादे में ढक देगा। पार्टी में आये लोग डांस फ्‍लोर पर थिरक रहे थे अपनी मस्‍ती में । आज सूरज भी अपने नियंत्रण में था । आज ना तो वो स्‍वंय ही डांस फ्‍लोर पर गया और ना ही उसने स्‍वाति को डांस फ्‍लोर पर जाने की जिद की । उसके कुछ मित्रों ने जब ऐसा करने का प्रयास किया तो वो जल्‍दी घर पहॅुचने की बहानेबाजी करने लगा । आज स्‍वाति का बडा मन था फिर से डांस फ्‍लोर पर थिरकने का । पर क्‍या कर सकती थी । सूरज शीघ्र ही अपने दोस्‍तों से इजाजत लेकर वहॉ से निकल गया ।

समय से घर पहॅुच गये थे । स्‍वाति को हल्‍का हल्‍का सा नशा था पर इतना भी नहीं की किसी को पता चल सके कि उसने शराब पी है । घर पर पहॅुची तो बच्‍चे अपने दादा दादी जी के साथ रात का भोजन कर रहे थे । समय से अपने मम्‍मी पापा को आया देख वो बहुत खुश हो गये । हल्‍की फुल्‍की बात कर वो सबको गुड नाइट कह कर अपने कमरे में चली गयी ।

स्‍वाति कमरे दो कांच के गिलास ले आयी थी । थोडी सी नमकीन वगैरह पहले से कमरे में थे । सूरज ने अपनी आलमारी से शराब की बोतल निकाल ली थी । स्‍वाति की नजर जब उसकी आलमारी पर पडी तो वहॉ विदेशी शराब की ब्रांडेड बोतले नजर आयी । आज स्‍वाति ने पहले दिन से कुछ ज्‍यादा शराब पी थी । बहुत देर रात तक दोनों शराब पीते रहे । सूरज की रोमांटिक बातें उसे भीतर तक गुदगुदा रही थी । स्‍वाति मन ही मन प्रफुल्लित हो रही थी । आज तक वो कैसी जिन्‍दगी जीती आयी है । घर गृहस्‍थी के पचडों में । इतनी संपन्‍नता होते हुये भी जिन्‍दगी को आनंद से नही जिया तो क्‍या जिया, बस यही सोच सोच कर पछता रही थी । ना जाने उसे कब नींद आ गयी । सुबह जब उसकी नींद खुली तो उसने अपने तन को निहारा , कुछ भी नहीं था बदन पर । ऐसा तो वो कभी करती नहीं थी , सूरज की लाख जिद के बाद भी अपने बदन को ढक ही लेती थी । पर वो भीतर ही भीतर रोमांचित हो रही थी । जल्‍दी से कपडे पहन वो हमेशा की तरह कीचन मे चली गयी । दोनो बच्‍चे सामान्‍य रुप से जग गये थे और स्‍कूल के लिये तैयार हो रहे थे । आज कुछ भी किसी को पता नहीं चला था । सूरज के कमरे मे जब पहॅुची तो वो अपने सर पर हाथ रखे बैठा था । उसके सर में तेज दर्द था । स्‍वाति ने पूछा,’ सूरज क्‍या हो रहा है ?’ सूरज ने मुस्‍करा के जबाब दिया, ‘ यो ही थोडा सर दर्द है । रात ज्‍यादा हो गयी थी ना तो शायद हैंग ओवर हो गया है । “ स्‍वाति तुरंत कमरे की ड्रा टटोलनी लगी जहॉ सर दर्द की दवाई रखी थी । उसकी सास को अक्‍सर सर दर्द की शिकायत रहती है तो उसके पास सर दर्द की गोलियां रखी रहती है। सूरज ने स्‍वाति को दवा ना निकालने को कहा और बोला, ‘ अरे हैंग ओवर है , बस एक पैग बना लेता हॅू , थोडी ही देर में सर दर्द दूर हो जायेगा । ‘ स्‍वाति की समझ मे ये बात आ गयी थी कि अगर ज्‍यादा शराब पीने से सुबह सर में दर्द हो तो उसे हैंग ओवर हो जाना कहते हैं और उसका कारगार उपाय ये है कि थोडी सी और शराब पी ली जाये ।

बस पीने पिलाने का ये सिलसिला जा चला तो चलता ही चला गया । स्‍वाति अब सुबह सुबह भी हैंग ओवर के नाम पर शराब पीने लगी । सब कुछ बिगडने लगा । बच्‍चों के स्‍कूल जाने के समय नाश्‍ता तैयार नहीं होता । सास ससुर को समय पर खाना नही मिलता । और घर में सभी को स्‍वाति की इस बुरी आदत की खबर मिल चुकी थी । अब सूरज भी उसे अनदेखा करने लगा । वो देर रात को घर पहॅुचता ताकि उसे स्‍वाति के साथ शराब ना पीनी पडें पर घर पहॅुचने पर उसे पता चलता कि वो तो पहले से ही शराब पीकर टुन हो चुकी है । उसने घर में शराब रखना बंद कर दिया । एक दिन सूरज की आलमारी में जब स्‍वाति को शराब की बोतल नही मिली तो वो घर के कपडें पहने ही बाहर निकल गयी और बाजार से जा कर शराब की बोतल खरीद लायी । अब वो अक्‍सर दिन के समय घर से बाहर निकल जाती और किसी बार में जाकर बैठ जाती । सूरज को अपने किये पर बहुत पछतावा हो रहा था । एक दिन सूरज ने सवाति से कहा,’ देखो स्‍वाति मैने शराब पीना बिलकुल बंद कर दिया है और अब तुम भी इसे बंद कर लो । ‘ इस पर स्‍वाति जोर जोर से हॅसने लगी , बिलकल पागलों की तरह । स्‍वाति की इस हॅसी से सूरज डर गया था । कितनी सुशील और नेक थी स्‍वाति । सुबह सबसे पहले उठकर नहा धोकर तैयार हो जाती , सूरज को अर्ध्‍य देकर पूजा के कमरे में देर तक भगवान की पूजा करती । वो पूजा के कमरे में गॅूजती स्‍वाति की प्रभु आरती की मधुर आवाज और घंटियों और शंख की आवाज की ध्‍वनियां कहीं खो गयी थी । अपने सर पर दुप्‍टटा लपेटे जब चरणामृत लेकर उसके कमरे में आती थी तो कितनी सुन्‍दर दिखती थी । और अब अलसायी ऑखे और नशे में बडबडाती स्‍वाति कितना खौफ पैदा कर देती है । छोटा बेटा शिवान तो डर के मारे उसके पास ही नहीं आता है । उसके माता पिता भी चिंतित से रहते हैं और वो भली भांति जानते हैं कि स्‍वाति की इस हालात के लिेए उनका बेटा ही पूरी तरह से जिम्‍मेदार है । उसके ससुर जी को इस बात की बहुत चिन्‍ता थी इसलिये उन्‍होने अपने जानकारों से इस व्‍यसन को दूर करने के निदान पूछे थे । इसी सिलसिले मे उन्‍हे इस केन्‍द्र का पता चला था ।क्‍यो कि शारीरिक रुप से उनमे इतनी शक्ति नहीं थी तो उन्‍होने ही सूरज को इस केन्‍द्र पर ले जाने की सलाह दी थी । बस ये कहानी थी स्‍वाति की इस केन्‍द्र तक पहॅचने की ।

केन्‍द्र प्रभारी ने सूरज की पूरी बात ध्‍यान से सुनी थी । फिर बडे विश्‍वास के साथ वो बोली, ‘ समस्‍या ऐसी नहीं है कि जिसका निदान ना निकल सके । बस इस तरह की समस्‍या का हल निकालने में पूरे परिवार को साथ देना पडता है । सबसे पहले रोगी के अपराध बोध को समाप्‍त करना होगा । रोगी को लगना चाहिये कि सभी लोग आज भी उसे उतना ही सम्‍मान देते हैं जितना कि पहले दिया करते थे । दस पन्‍द्रह दिन लगेगें और ये बिलकुल ठीक हो जायेगी । पर अक्‍सर ये देखा गया है कि केन्‍द्र से घर जाने के बाद फिर से अधिकतर रोगी शराब पीना शुरु कर देते हैं । ये स्थिति बहुत की कष्‍टकारी हो जाती है। बस इसी का ध्‍यान देना होगा । हॉ, अपने छोटे बेटे को समझाओ की वो अपनी मॉ के करीब जाये इससे शायद उसका मनोबल बढ जायेगा ‘

स्‍वाति को केन्‍द्र में अकेला छोड दिया गया । उसकी देखभाल के लिये एक बीस बाईस वर्ष की युवति विनीता को लगाया गया । विनिता देखने में बहुत सुन्‍दर और बोलने मे बडी मधुर है । हमेशा हॅसती रहती है । घर मे आर्थिक तंगी है तो केन्‍द्र मे पार्ट टाइम जोब करती है । इसी साल उसने बी एस सी की परीक्षा पास की है और एम एस सी कर रही है । विनीता ने बडे जतन से स्‍वाति को तैयार किया और केन्‍द्र में पहने जाने वाले परिधान पहनाये । धीमे से स्‍वर में बोली, ‘ मैडम , तबियत कैसी है ?’ विनीता के मधुर स्‍वर को सुनकर स्‍वाति भी मुस्‍करा दी थी । वो बडे प्‍यार से उसके गालो पर हाथ फेरने लगी । मुस्‍कराते हुये ही उसने पूछा,’ मैं ठीक तो हो जाउॅुगी ना ? देखो सब मेरे बारे में ना जाने क्‍या क्‍या सोचते होगें । मेरा छोटा बेटा तो मझसे प्‍यार ही नहीं करता । तुम उसे समझाओगी ना कि मेरे पास आये । एक बार सिर्फ एक बार उसे बुलवा दो । मुझे उसे प्‍यार करने का बडा मन कर रहा है । ‘ विनीता ने अपनी चिरपरिचित मुस्‍कान के साथ ही जबाब दिया, ‘ मैडम ये आप से किसने कहा कि आपका छोटा बेटा आप से प्‍यार नहीं करता । पता है कल सांय जब वेा आपके कमरे से बाहर गया तो बाहर की खिडकी से ना जाने कितनी देर तक आप को देखता रहा । उसे आपके पति को जिद करक यहॉ से ले जाना पडा । ‘ बस इतना सुनते ही स्‍वाति जोर जोर से रोने लगी ।विनीता ने स्‍वाति के कंधे पर हाथ रख दिया । और उसे चुप कराने लगी । एक बार फिर से स्‍वाति का मॅुह धोया गया और वो स्‍वाति को लेकर बाहर केन्‍द्र के बगीचे में आ गयी । सामने ही छोटा और सुदर सा कमरा था जिसमे दरी बिछी थी । ये केन्‍द्र का ध्‍यान कक्ष था जिसमे दरी बिछी थी और कुछ लोग वहॉ ध्‍यान कर रहे थे । विनीता स्‍वाति को लेकर दरी में बैठ गयी और उसके कहे अनुसार करने का निवेदन करने लगी । आस पास और भी लोग बैठे थे । सामने अनुदेशक सबको निर्देश दे रहा था । स्‍वाति भी थोडी देर बाद उन सबका अनुसरण करने लगी । लगभग आधा घंटे तक योग ध्‍यान कराने के बाद स्‍वाति को अपने भीतर से कुछ उर्जा आती हुई महसूस हुयी । रोज की तरह आज उसे आलस्‍य भी नहीं आ रहा था और सर में भारी पन ही नहीं था । उसके बाद विनीता उसे केन्‍द्र के भोजन कक्ष में ले गयी जहॉ सभी के लिये नाश्‍ता तैयार था । विनीता स्‍वाति के लिये प्‍लेट में नाश्‍ता लगाकर ले आयी । स्‍वाति ने अपनी इच्छानुसार थोडा सा नाश्‍ता लिया । बहुत दिनों बाद उसकी भूख कुछ जगी थी वरना तो ना जाने कितने दिनो से उसने सिर्फ शराब ही तो पीयी थी । उसके बाद उसने विनीता से आग्रह किया कि केन्‍द्र के बगीचे में उसे कुछ देर के लिये अकेला छोड दे । विनीता ने मुस्‍कराते हुये उसके आग्रह को स्‍वीकार कर लिया था हालांकि मरीज को इस तरह अकेला छोडने में हमेशा ही जोखिम रहती है । शराब के व्‍यसनी व्‍यवहार में बहुत विनम्र हो जाते हैं और मौका मिलते ही क्‍या कर दें कह नहीं सकते । विनीता दूर किसी कक्ष से ही उस पर नजर रखने की मंशा से वहॉ से चली गयी । लाल रंग के गुलमोहर के फूलों से लदे पेड के नीचे की एक बेच पर स्‍वाति बैठ गयी थी । सामने क्‍यारियों में अलग अलग रंग के फूल खिले हुये थे । बेंच के सामने से सुदर पहाडियां नजर आ रही थी । आसमान में पंछियों के चहचहाने की आवाजें आ रही थी । कुल मिलाकर प्रकृति का सुन्‍दर दृश्‍य था । स्‍वाति अपने अतीत में कही खो गयी थी । उसके पापा जो उसे अपनी जान से भी ज्‍यादा प्‍यार करते हैं । बहुत दिनो से पापा से बात ही नहीं हुयी है उसकी । और मॉ कितना ध्‍यान रखती थी उसका । भाई भाभी , भतीजा , भतीजी , चचेरी बहने , मौसी, बुआ सभी याद आ रहे थे उसको । उन्‍हे अभी उसकी इस आदत के बारे में कुछ नहीं पता है , जब पता चलेगा तो कैसा लगेगा । इससे पहले कि उनहें पता चले वो अपनी इस आदत को छोड देगी । कई बार उसने शराब ना पीने की सोची और प्रयास भी किया पर ऐसा करते ही उसके शरीर में क्‍या हो जाता है । उसकी धडकन बढ जाती है और उसे लगने लगता है कि वो मरने वाली और इसी डर से वो शराब पिना जो शुरु करती है तो पीती ही जाती है । केन्‍द्र में आये उसे लगभग बीस घ्ंटे हो चुके हैं और उसने शराब की एक बॅूद भी नहीं चखी है । उसे हलकी हल्‍की घबराहट होना शुरु हो रही है और फिर से उसे लगने लगा है कि अगर उसे इस वक्‍त शराब ना मिली तो वो मर जायेगी । इतने विनीता उसे लेने के लिये आ गयी है । स्‍वाति के माथे पर पसीने की बॅूदे देखकर उसने पूछ ही लिया, ‘ क्‍या बात मैडम , तबियत तो ठीक है ना ? ‘ सुनते ही स्‍वाति विनीता से लिपट गयी और कहने लगी , ‘ मुझे बचा लो , मुझे मरना नहीं है । मैं जीना चाहती हॅू । अपने इवान के लिये , अपने शिवान के लिये । अरे अभी तो मैने शिवान को जी भर के प्‍यार ही नहीं किया है । ‘ विनीता ने बडी विनम्रता से कहा, ‘ चिन्‍ता ना करो मैडम, हम सब हैं ना यहॉ । आपको कुछ नहीं होने देगें । चलो कमरे में चलते हैं वहॉ मैं आपको दवाई दॅूगी जिससे आपकी बैचेनी खत्‍म हो जायेगी । और हॉ, आज सांय को आपका पूरा का पूरा परिवार आपसे मिलने आ रहा हे । बस आपको उन्‍हीं सब के सामने अपने आप को मजबूत दिखाना है।‘ कमरे में पहॅुच कर विनीता ने स्‍वाति को कुछ दवाईयां दी । विनीता ओर स्‍वाति देर तक बात करते रहे और बात करते करते ही स्‍वाति नींद के आगोश में चली गयी ।

सांय के चार बज चुके थे । दिन मे स्‍वाति ने कुछ भी नहीं खाया था । स्‍वाति उठकर अपने पलंग पर बैठ चुकी थी । विनीता जो उस वक्‍त उसके कमरे में मौजूद थी ने उसे पानी का गिलास भरकर दिया । और फिर बाथरुम तक उसे लेकर गयी । स्‍वाति ने अच्‍छी तरह से अपने हाथ मॅुह धोया । अपने कपडों को ठीक किया । अपने बालों को संवारा । विनीता ने पास के ड्रा से एक लाल रंग की गोल बिंदी निकाल कर स्‍वाति के माथे पर लगा दी । स्‍वाति ने अपने को दर्पण मे निहारा । अपने आप को बहुत देर तक निहारती रही स्‍वाति , शायद उस स्‍वाति को ढॅूढ रही थी जो पिछले कुछ समय से कहीं खो गयी थी । उसी पुरानी स्‍वाति की छवि उसे कहीं छुपी दिखलाई पडने लगी थी । विनीता ने स्‍वाति से कहा, ‘ मैडम अगर आप कहें तो आपके घर से आये कपडे आप को पहना दॅू।‘ इस पर स्‍वाति ने कहा , ‘ बस तुम कपडे निकाल कर दे दो , तैयार मैं स्‍वंय हो जाउॅगी । ‘ स्‍वाति ने बाथरुम में जाकर जी भर के नहाया और अपने आप ही तैयार हो गयी । आसमानी कुर्ता, सफेद सलवार और सर पर सफेद दुप्‍टटा । माथे पर बडी सी लाल बिंदिया और मांग में सुर्ख लाल सिन्‍दूर । वो बार बार अपने को दर्पण में निहार रही थी । विनीता भी उसे देख देख कर खुश हो रही थी । विनीता उसे लेकर बाहर लांन मे आ गयी थी । सांझ ढलने लगी थी , आकाश में लहलहराते पंक्षी अपने घरों को लौट रहे थे , सूरज अपनी लालिमा बिखेरता कर मिलने के वादे के साथ मुस्‍कतराता हुआ दौडा जा रहा था । बहुत दिनो बाद ढलती सॉझ को इतने जतन से देखा था स्‍वाति ने । कितना मनोरम था ये दृश्‍य । ऐसी ही एक सांय की स्‍मृति थी उसके अंतस्‍थल में जब वो सूरज के साथ हनीमून पर मालदीव गयी थी , ऐसी ही एक सुन्‍दर सर सॉझ को करीबी से उसने देखा था जब वो अपने बडे बेटे इवान का पहली बार मंदिर ले गयी ।

केन्‍द्र के चौकीदार ने मख्‍य गेट को खोला था । एक लंबी सी कार ने प्रवेश किया था । अरे , ये तो हमारी ही कार है । सूरज आया है । उसके चेहरे पर मस्‍कान तैर गयी थी । कार पोर्च में रुक गयी थी । इवान और शिवान दोनो ही दौडते हुये उसकी ओर लपक रहे थे । सूरज अपने मम्‍मी पापा के संग धीमे कदमो से उसकी ही ओर आ रहा था । उसके सास ससुर भी हॅसते हुये उसकी ओर आ रहे थे । कितने कमजोर हो गये हैं दोनों , मन ही मन में स्‍वाति सोचने लगी । उसे अपने सास ससुर दोनों के स्‍वास्‍थ की हमेशा ही चिन्‍ता रहती थी पर इस लत के कारण पिछले लंबे समय से वो इनकी ओर ध्‍यान ही नहीं दे पायी थी । स्‍वाति ने दोनों के पैर बडे आदर के साथ छुये और दोनों बेटों को अपने सीने से लगा लिया । सूरज ने भी बडे पयार से स्‍वाति के गालों को सहलाया । विनीता ने भी सभी को नमस्‍कार किया और पूछा, ‘ आप लोग यहीं लॉन में बैठना पसंद करोगे कि कानफ्रेन्‍स रुम मे । क्‍यों कि अंधेरा होने लगा था तो सबने कान्‍फ्रेन्‍स रुम में ही बैठना उचित समझा । आज सवाति बहुत सुन्‍दर दिख रही थी । उसकी सास लगातार उसकी तारीफ किये जा रही थी । स्‍वाति ने भी बहुत दिनों बाद अपने बच्‍चों के साथ लंबे समय तक बात की थी । लगभग दो घंटे के करीब वो बातचीत करते रहे । अचानक ना जाने क्‍या हुआ स्‍वाति को । उसके माथे पर पसीने की बॅूदें चमकने लगी । उसे घबराहट सी महसूस होने लगी । और वो फिर से जोर जोर से चिल्‍लाने लगी्,’ नहीं ,मुझे मरना नहीं हे । मै जीना चाहती हॅू । मुझे बचा लो ।‘ वो अपनी सास से लिपट गयी । सूरज दौडकर आफिस में गया और उसने स्‍वाति की दशा के बारे में माया मैडम को बताया । माया मैडम ने सूरज से कहा, ‘ घबराने की कोई बात नहीं है । देखो पिछले चौबीस घंटो से उसने शराब की एक बॅूद भी नहीं चखी है । अब ये लत अपना जोर मार रही है । बस हफ्‍ता भर गुजर जाये फिर सब कुछ सामान्‍य सा हो जायेगा । दरअसल इसी समय इस तरह के रोगी का पर्याप्‍त उपचार और सहारे की आवश्‍यकता होती है । हम अभी पहॅुचते हैं आप स्‍वाति को लेकर कमरे में आ जाओ । सूरज स्‍वाति को लेकर कमरे में पहॅुच गया । साथ में सभी लोग भी वहॉ आ गये । माया और विनीता दोनों कमरे में पहॅुच चुकी थी । उनके पास कुछ दवाईया थी । विनीता ने बडे ही प्‍यार से अपने हाथ से स्‍वाति के मुख मे दवा डाली और पानी पिलाया । दोनों बच्‍चे भी उसके पास आकर बैठ गये । सभी देर तक उसे समझाते रहे और ढाढस बंधाते रहे । कुछ ही देर में दवा ने अपना असर करना आरंभ कर दिया। अब स्‍वाति के माथे से निकलता पसीना सूख रहा था और उसकी घबराहट भी कम होने लगी थी । विनीता ने सबसे आग्रह किया कि अब इन्‍हे थोडी ही देर में नींद आ जायेगी इसलिये इन्‍हे हल्‍का फुल्‍का कुछ खिला देते है । सूरज कुछ फल लाया हुआ था बस एक प्‍लेट में वहीं काटकर अपने हाथों से स्‍वाति को खिलाने लगा । स्‍वाति ने कसकर उसे जकड लिया और ना थोडी ही देर में उसी नींद आ गयी । सूरज भी अपने माता पिता और बच्‍चों को लेकर घर चला गया ।

आज के्न्‍द्र में उसका तीसरा दिन था । बहुत देर तक बिस्‍तर पर जम्‍हाई लेती रही स्‍वाति । उसने खिडकी के पर्दे को हटाकर बाहर देखा । बाहर अपनी लालिमा के साथ सूर्य देवता विराजमान थे । उसने अपने दोनो हाथ जोडकर सूर्य को नमसकार किया । उसके पुराने संस्‍कार फिर से जागृत होने लगे थे । वो स्‍वंय ही बिस्‍तर से उठी और निवृत होने के लिये चली गयी । विनीता जब तक उसके कमरे में पहॅुचती वो नहा धो बिलकुल तैयार होकर कुर्सी पर बैठी टी वी देख रही थी । विनीता ने दोनों हाथ जोडकर मुस्‍कराते हुये अभिवादन किया । ना जाने स्‍वाति को क्‍या हुआ कि उसने उसके दोनों हाथ पकडकर अपने पास खींच लिया । उसके मन में विश्‍वास घर कर गया था कि विनीता उसे इस व्‍यस्‍न से मुक्ति दिलवा देगी । वैसे भी दिखने में बहुत सुन्‍दर और व्‍यवहार में बहुत शालीन थी विनीता । उसने उसके परिवार के विषय में बहुत कुछ पूछा । उसे अपनी सहेली सी लगने लगी थी विनीता । कुछ देर के बाद वो ध्‍यान कक्ष में चली गयी । वहॉ काफी समय तक योग ध्‍यान करने के बाद नाश्‍ता करने के लिये डाईनिंग हाल मे चली गयी थी । वहॉ बहुत से लोग नाश्‍ता कर रहे थे । कुछ लोग काफी स्‍वस्‍थ दिख रहे थे परन्‍तु कुछ के चेहरों पर अभी भी अवसाद के चिन्‍ह दिखलाई पड रहे थे । उनमें से सबकी अपनी कहानी थी । एक तेराह चौदह साल का बच्‍चा भी वहॉ था । उसे उसकी मॉ ने वहां भर्ती किया था । उसे शराब की आदत उसके पिता ने ही डाली थी । उसका पिता दर शराबी था और जब वो शराब पीता था तो उसे भी एक गिलास में थोडी सी डालकर दे देता था। बचचा नासमझ था वो पिता की देखा देखी शराब पी लेता और बाद में उसे शराब पीने में मजा आने लगा । धीरे धीरे उसे भी शराब की लत पकड ली । शराबी बाप ज्‍यादा दिन जिंदा नहीं रह पाया पर जो व्‍यसन अपने पुत्र को देकर गया वो दूर होने का नाम ही नहीं ले रहा था ।बच्‍चा नशे के लिये घर से पैसे चुराने लगा । घर की चींजें बेच आता । अपनी मॉ से हाथापाई करता । बस मॉ का जीन दुश्‍वार कर दिया था । पिछले हफ्‍ते ही उसकी मॉ उसे इस केन्‍द्र में भर्ती करा के गयी थी । स्‍वाति ने बडे स्‍नेह से उसके सर पर हाथ फेरा ना जाने उसे देखकर उसे अपने बडे बेटे की याद आ गयी थी । इसी उम्र का तो है उसका इवान । सोचने लगी बस परमात्‍मा का शुक्र है कि उसका इवान बच गया। ऐसा भी हो सकता था कि उसकी जगह आज इवान इस केन्‍द्र में होता । वो मन ही मन में परमात्‍मा से विनती करने लगी कि हम सभी को इस व्‍यसन से मुक्ति दे दे ।

आज का दिन बहुत अच्‍छी तरह गुजरा था । सूरज फिर ढलने लगा था । ढलते सूरज को देखकर ना जाने क्‍यों उसे बैचेनी होने लगती है । उसे कुछ घबराहट सी महसूस हुई , पर उसने निर्णय ले लिया था कि आज वो बिलकुल नहीं चिल्‍लायेगी और किसी को भी सहायता के लिये नहीं पुकारेगी । उसने बिस्‍तर से उतर कर फर्श पर चादर बिछा दी थी । वो ध्‍यान की मुद्रा में बैठ गयी थी और प्रणायम करना शुरु कर दिया था । अचानक कमरे को दरवाजा खुला । सूरज और विनीता ने कमरे में प्रवेश किया । स्‍वाति को प्रणायम करता देख बहुत प्रसन्‍न हो गये । विनीता ने तो ताली बजाकर अपनी खुशी का इजहार भी कर दिया । सूरज से भी नहीं रहा गया उसने स्‍वाति को उठाकर गले लगा लिया। स्‍वाति की ऑखों में ऑसू झलक आये थे , खुशी के ऑसू , किसी चुनौती को स्‍वीकार कर मात देने में जो प्रसन्‍नता मिलती है वो ही झलक रही थी उसकी ऑखों में । बहुत देर तक वो ना जाने अतीत सी जुडी कितनी घटनाओं की चर्चा वो सूरज से करती रही । विनीता के आग्रह पर सूरज भी स्‍वाति के साथ भोजन के लिये चला गया था । सूरज ने कई कौर स्‍वाति को अपने हाथ से खिलाये । बस स्‍वाति यही सोचती रही कि वास्‍तव में सूख है क्‍या वो अंधेरी रात जो उसने पहली बार शराब के नशें में सूरज के साथ बितायी थी या ये प्रेम भरा स्‍पर्श, आलिंगन । उसने तय कर लिया था कि उसकी जिन्‍दगी और उसके परिवार के लिये क्‍या जरुरी है । विनीता ने स्‍वाति को सोने से पहले रात की दवाईयां खिला दी थी और उसे ठीक से उसके बिस्‍तर पर व्‍यवस्थित कर दिया था । आज सवाति का तीसरा दिन था जब उसने शराब की एक बॅूद भी नहीं चखी थी । आज उसे बैचेनी कम थी औीर माथे पर पसीना भी कम आया था । आज भी वो गहरी नींद के आगोश में चली गयी थी अपने भविष्‍य के रंगीन सपनों के साथ ।

दिन प्रतिदिन स्‍वाति की सकी्यता बढती जा रही थी । उसके आत्‍म विश्‍वास में बढोत्‍तरी हो रही थी । अब वो केन्‍द्र में इधर उधर घूमती और सबसे बातें करती । अपनी ओर से दूसरे मरीजो को समझाने का प्रयास भी करती । घर के सभी लोग रोज ही उससे मिलने आते और स्‍वाति को ठीक होता देख सभी को अत्‍यंत प्रसन्‍नता होती । इवान और शिवान दोनों अपनी मम्‍मी के साथ बैठकर घर की सारी बातें करते । स्‍कूल में क्‍या हुआ, टयूशन मे क्‍या हुआ , दिन भी में क्‍या खाया सब कुछ बताते ।आखिर वो दिन भी आ गया जब स्‍वाति को इस केन्‍द्र से रिलीव किया जाना था । आज स्‍वाति सुबह सुबह ही तैयार होकर बैठ गयी थी । वो केन्‍द्र के सभी मरीजो से मिली और हर किसी का नाम ,पता और टेलीफोन नम्‍बर भी उसने नोट कर लिया था । सूरज दोनों बेटों के साथ उसे लेने आ चुका था । उसके हाथ में उपहार के कई पैकेट थे । स्‍वाति ने उसे गत रात उसे ये लाने के लिये कहा था । स्‍वाति ने अपने हाथों से सबसे पहले केन्‍द्र की प्रभारी माया जी को उपहार पकडाया और उसके बाद उसने विनीता को अपने गले लगाया और उससे वादा लिया कि जब कभी उसे समय मिले तो उससे मिलने उसके घर जरुर आये । स्‍टाफ के सभी लोगों को उपहार देकर वो अपनी कार की ओर चलने लगी । केन्‍द्र को मेन गेट खुल चुका था और आसमान पर सूरज मुस्‍कराते हुये निकल आया था । स्‍वाति मन ही मन बुदबुदा रही थी ,’लो अब फिर से हो गयी भोर ।‘

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