लघु कथा ।

10 अगस्त 2019   |  त्रिशला रानी जैन   (454 बार पढ़ा जा चुका है)

👩‍🌾एक लघुकथा 👩‍🌾

अरे जीजी,...... काहे दो तीन दिनों से दिखी नही ,कही गयी थी क्या ? ओह पीछे मुड़ कर
देखा तो शीला आवाज़ दे रही थी ।

मन ही मन सोचा अब तो ये बस मेरा....... दिमाग .....
ही खा जाएगी लो अब हो गया मेरा मोर्निंग वॉक ।मेने फीकी से हँसी हंसते हुए कहा " अरे
कहाँ जाती ।घर मे ही थी बहू दो दिन को ऑफिस के काम से बाहर गयी थी बेटा टूर पर
पहिले से ही है ।
नाती के साथ कब समय निकल गया पता ही
नहीं चला । अरे दीदी हम तो कहते है कही
तीर्थ चलो ।क्यों भला ? हमे तो अपने नाती के साथ ही अच्छा लगे है ।
तो का करहे जा के?

शीला बोली घूमेंगे फिरेंगे ऐश करेंगे और क्या ? अब तो मैं मुस्कुरा दी। अरे भगवान के
दरबार मैं मस्ती नही भक्ति होती है।

का दीदी कभी तो हँस लिया करो । अरे ,तुम्हारी
तरह हम पर फिल्मों का असर नही है ।
दीदी हम तो कहत है दो दिन की ज़िन्दगी है
सो मस्ती से गुजार लो ।
अरे दीदी तुमने बताया नही दो दिन बहु के पीछे
का करत रही ?
अरे मुन्नू को पंद्रह अगस्त की तैयारी करवा रहे थे । केसी ? अब तो मेरी जान ही लेलेगी ।
मुन्नू को एक देशभक्ति का गीत तैयार करवाया था उसी में व्यस्त थी ।
है । दीदी कौन सा ? शीला के हर प्रश्न का जबाब देना,,, अपना तो सिर ही घूम जाता है।

"अरे वही इंसाफ की डगर पे ।," कितना अच्छा गीत है। दीदी हमे बता देती हम तो बड़ा ही अच्छा गाती है।
पर दीदी हमारी नातिन का तो अंग्रेजी स्कूल है, पता है बहुत फीस है उसकी ।

सो वो तो अंग्रेजी मैं ही गाना गायेगी ।दीदी ऐसी गिटिर पिटिर अंगेजी बोतल है कि हमारी
तो कछु समझ नही आवत है ।

ये कहते हुए शीला बड़ा ही गर्व महसूस कर रही थी ।
मै सोच रही थी कि हम आज भी किस मानसिकता मैं जी रहे है । स्कूलों मैं हिंदी बोलना उनकी शान के खिलाफ है ।हम ये नही कहते की अंग्रेजी मत सीखो पर हिंदी
की अवहेलना भी तो मत करो । स्कूल में तो हिदी बोलने पर फाइन लिया जाता है ।क्या पता सच है की नही । हमने तो सुना है।
माता पिता भी अब तो बच्चो से घर मैं भी
अंग्रेजी मैं ही बात करते है।
मैने शीला से पूंछा कि तुम्हारी उनकी बात समझ मैं आती है।
अरे कहाँ दीदी हम एतेक कहाँ पढ़े है। मैं तो कमरा बन्द करके मोबाइल पर सिनेमा देखत रहती हूँ ।

बच्चों को समय कहाँ है वो भी कार्टून देखते
रहते है ।मै मन ही मन सोच रही थी कि ये बात बहुत कुछ सही है समय बड़ी तेजीसे बदला है और.....

हम इस दौड़ में बहुत पीछे रह गए है।
अरे शीला तुम्हारे चक्कर मे भूल ही गयी
मैं तो गाय को रोटी डालने आयी थी ।
दीदी क्या आपको पता है गाय हमारे लिये कितनी उपयोगी है।

अरे ....अब तो इनका गाय पर निबंध भी सुनना पड़ेगा । दीदी पता है विदेश में तो अब
गाय से बीमारियों का इलाज भी होने लगा है।
गाय ही ऐसा जानवर है जो ऑक्सीजन लेती है
और ऑक्सीजन ही छोड़ती है ।
पता है ,दीदी लोग गायों के बाड़े में दो रहने
के बहुत पैसे देते है। वहाँ उनको मानसिक शांति मिलती है । यहाँ तो गायों की कदर ही
नही, कचरा खाती रहती है । बस नाम की पूजा करत है हम लोग ।
मुझे लगा गाय पर निबंध तो सच में ही उपयोगी है । मै तो इसे यूँ ही.......समझती थी पर ये तो बड़ी होशियार है ।
मेने कहा शीला में इस बार मुन्नू को ये निबंध में
जरूर लिखवाऊंगी ।पर अब तो स्कूलों में गाय
पर निबंध कहाँ लिखवाया जाता है ।

न सही पर ये बात सबको बताऊंगी कि ये नई
थैरेपी तो आयी है। काश लोग गायो को यूं न
सड़क पर छोड़ते ।
अच्छा शीला आज तो तुमने मुझे बहुत ही
अच्छी बात बताई है। दीदी मोबाइल पर
कभी कुछ जानकारी भी देख लेती हूँ ।अरे
दीदी चलू ।घर पर बहुत काम पड़ा है।
मैन कहा हां मैं भी चलूँ । मन ही मन सोच
रही थी कि अच्छा हुआ नही तो पता नही
अब किस पर निबंध लिखवा दे। ये शीला भी न.......
त्रिशला जैन।

अगला लेख: कृष्ण जन्माष्टमी पर ।



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लिखूं कोई खत ऐसा,,,,,,लिखूं कोई तो खत तुम्हारे नाम ऐसा कि मेरी ज़िन्दगी की कह दे कहानी पर उम्मीदे कभी होती नही पूरी आसमान की ऊचाई पर बादलो के भ्रम की चादर से , शायद तुम्हें कुछ दिखाई नहीं देता पर फिर भी सोचती हूँ शायद तुमने........ मेरे ख़त का एक हर्फ़ तो पढ़ा होगा तभी तो ये ज़मी भीगे आँसू की कहानी लिख रही है तभी तो , खिल गए है मुहब्बतो के फूल किसी के लिये गजरे बन कर खूबसूरत प्रिया का श्रृंगार बन जायेगे या किसी नन्ही हथेलियों से तोड़ लिए जाएंगे तो क्यो न इन्हें मंदिर में किसी देवता पर अर्पित कर दूँ ताकि न पैरों तले कुचल जाए ये, चाहत है कि सूख कर भी ये किसी मुहब्बत की कहानी लिखें या ज़मी में अपने को ख़ाकसार करके फिर से नया बीज बन अंकुरित हो जाएं । त्रिशला जैन ।
03 अगस्त 2019
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