जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है...

12 अगस्त 2019   |  pradeep   (4524 बार पढ़ा जा चुका है)

जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है...

जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जनसंघ के संस्थापक, हिन्दू महासभा के के अध्यक्ष , कलकत्ता यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर, मुस्लिमलीग की सरकार में मंत्री, नेहरू सरकार में मंत्री. माना जाता है कि मुखर्जी कश्मीर में 370 धारा के खिलाफ थे? कितना सच है? क्या मुखर्जी कश्मीर के भारत में विलय के पक्ष में थे? क्या मुखर्जी भारत के विभाजन के विरोधी थे? क्या मुखर्जी का भारत की आज़ादी में कोई योगदान था? या वो उन लोगो में से थे जब शादी की तैयारी हो गई खाने की पत्तले सज गई तो फूफाजी आकर बैठ गए कि इन पर मेरा अधिकार पहला है क्योकि मैं इस घर का दामाद हूँ, फूफा हूँ. इन सब को समझने के लिए जरुरी है कि इतिहास के पन्ने पलटे जाएँ और देखा जाए कि क्या उन्होंने बलिदान दिया था कश्मीर के लिए?


कश्मीर के लिए बलिदान हुए मुखर्जी


india


श्यामा प्रसाद मुखर्जी के पिता जी थे सर आशुतोष मुखर्जी, उनके पिताजी को सर की उपाधि अंग्रेजी सरकार ने दी थी, और वो कलकत्ता यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर थे. उनके पिता अंग्रेजी राज के विरोधी नहीं रहे होंगे तभी तो उन्हें सर की उपाधि दी गई होगी, सर की उपधि मिलने का मतलब यही होता है कि आप उस सरकार के साथ है. इसलिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी का पालन पोषण ऐसे परिवार में हुआ जो अंग्रेजी हुकूमत के पक्ष में था. श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी किसी आज़ादी के आंदोलन से नहीं जुड़े थे. वो हिन्दू महासभा के अध्यक्ष थे, हिन्दू महासभा अंग्रेजो से हिन्दुओं के लिए ज्यादा अधिकार और हिन्दुओं को हथियार रखने का अधिकार मांग रही थी, उस संस्थान का मानना था कि हमारे दुश्मन अंग्रेज नहीं मुसलमान है. यह बात सावरकर से लेकर अब तक के हिंदुत्ववादी ( हिन्दू और हिंदुत्ववादी में अंतर है) मानते है. 1934 में अंग्रेजी हुकूमत उन्हें कलकत्ता विश्विद्यालय का वाइस चांसलर बना देती है, क्योकि वो देश भक्त थे? जब गांधी जी और अन्य कांग्रेस के लोग अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन चला रहे थे तब जबकि गाँधी जी, सुभाष चंद्र बोस सरकारी नौकरी छोड़ कर आंदोलन का हिस्सा बन रहे थे तब वो अंग्रजों की नौकरी कर रहे थे. सावरकार जिन्होंने अंग्रेजों से माफ़ी मांगी और उनका साथ देने का वादा किया था और उसे निभाया भी, उनके अनुसार भारत एक राष्ट्र नहीं बल्कि दो राष्ट्र है हिन्दू राष्ट्र और मुसलमान राष्ट्र. उनका मानना था कि अगर हिन्दुस्तान आज़ाद होगा तो उसे दो राष्ट्रों में बटना पड़ेगा या यहाँ पर अंग्रेजी हुकूमत बनी रहे और उसमे हिन्दुओं को ज्यादा अधिकार मिल जाए. उनकी ही सोच का फायदा मुस्लिम लीग के जिन्ना ने उठाया.

जिन्ना हिन्दुस्तान के बटवारे के पक्ष में नहीं थे. यह झूठ खूब तेज़ी से फैलाया गया कि देश के विभाजन के लिए कांग्रेस खासतौर पर गांधी और नेहरू ज़िम्मेदार है. जबकि सच यह है कि गांधी जी तो हत्या से पहले पाकिस्तान जाने और जिन्ना को समझाने की बात कर रहे थे गाँधी जी ने नेहरू और पटेल को भी राज़ी कर लिया था कि पाकिस्तान जाकर वो जो भी फैसला लेंगे उसे कांग्रेस मान लेगी यानी पाकिस्तान को वापिस हिन्दुस्तान में मिलाने की बात. इसके खिलाफ हिन्दू महासभा और संघ दोनों थे वो गांधी जी को वहाँ जाने देना नहीं चाहते थे, क्योकि दोनों ही अब चाहते थे कि विभाजन हो गया और अब सब मुसलमान पाकिस्तान चले जाए और भारत को हिन्दू राष्ट्र बना दिया जाए, अगर मुसलमान यहां रहेंगे तो भारत कभी भी हिन्दू राष्ट्र नहीं बन सकेगा. संघ और हिन्दू महा सभा विभाजन के पक्ष में शुरू से ही थी, लेकिन जब गांधी और कांग्रेस के रहते उनका सपना पूरा नहीं हुआ और पाकिस्तान बनने के बाद भी भारत हिन्दू राष्ट्र नहीं बना तो इन दोनों संगठनो की नफ़रत नेहरू से बढ़ गई क्योकि गाँधी जी की हत्या कर उन्हें रास्ते से हटाया जा चुका था, पटेल की भी मौत जल्दी हो गई, राजेंद्र प्रसाद ,राष्ट्रपति थे लेकिन उनके पास कोई ख़ास अधिकार नहीं थे, ऐसे में सिर्फ नेहरू ही थे जो उनके रास्ते में रुकावट थे ( गांधी जी ने नेहरू को ही क्यों अपना उत्तराधिकारी बनाया, अगला लेख ) . उन्हें बदनाम करने , उनके और पटेल के रिश्तों पर कीचड़ उछालने के अलावा उनके पास कुछ नहीं था. मुखर्जी ने मई 1947 में लार्ड माउंटबेटन को खत लिखा कि अगर हिन्दुस्तान का विभाजन नहीं होता तब भी बंगाल का विभाजन ज़रूरी है, इसका विरोध कांग्रेस ने किया, सुभाष चंद्र बोस के बड़े भाई शरतचंद्र बोस ने किया, शरतचंद्र बोस ने तो कहा कि अगर बंगाल का विभाजन करना है तो पूरे बंगाल का भारत से विभाजन कर दो ,ताकि उत्तरी भारत की यह हिन्दू और मुस्लिम राजनीति ख़त्म हो जाये बंगाल में कोई भी धार्मिक राजनीति नहीं चाहिए. सुभाषचंद्र बोस ख़ुद हिन्दुराष्ट्र के विरोधी थे. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की बंगाल की जनता पर कोई पकड़ ही नहीं थी. वो सावरकर की ही तरह अंग्रेजी हुकूमत के तरफ़दार थे , और किसी भी तरह भारत की आज़ादी को रोकने के लिए काम कर रहे थे. 1941 में जब कांग्रेस ने अपनी सरकार बर्खास्त कर दी और अंग्रेज़ो के ख़िलाफ़ भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया तो मुस्लिम लीग और मुखर्जी ने इसका विरोध किया और दोनों ने मिलकर सरकार बनाई और अंग्रेजी हुकूमत को मदद की इस भारत छोड़ो आंदोलन को दबाने की, कांग्रेस ने फ़ैसला लिया कि वो दूसरे विश्व महा युद्ध में हिस्सा नहीं लेंगे और जनता को कहा कि वो अंग्रेजी नौकरियां छोड़ दे , असहयोग आंदोलन चलाये तब अंग्रेज़ों को सुभाषचंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज़ से लड़ने के लिए फौजियों की ज़रूरत थी तब उन्होंने कैम्प लगाए और लोगो को फौज में भर्ती किया, किससे लड़ने के लिए? सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फौज से लड़ने के लिए. हिन्दू महा सभा और संघ की नहीं चली और हिन्दुस्तान आज़ाद हो गया . अब आज़ादी के जश्न में शामिल होने फूफाजी यानि संघ और हिन्दू महासभा दोनों आ गए.

गाँधी जी के बारे में कहा जाता है कि उनका मानना था कि कांग्रेस एक खास मकसद यानी हिन्दुस्तान की आज़ादी के लिए बनी है उसे अब खत्म कर देना चाहिए? इसका मतलब भी गलत लगाया गया और जानबूझकर इसे गलत तरीके से फैलाया गया, इसके लिए भी नेहरू को ही दोष दिया गया, अगर ऐसा था तो पटेल, राजेंद्र प्रसाद, ज़ाकिर हुसैन और लाल बहादुर शास्त्री क्या नेहरू की गुलामी कर रहे थे? गाँधी जी का इससे मतलब था कि आज़ादी के बाद किसने आज़ादी के आंन्दोलन में हिस्सा लिया या नहीं, किसने अंग्रेज़ों का विरोध किया या किसने अंग्रेज़ों का साथ दिया इसे भूल कर राष्ट्र निर्माण के लिए सबको बुलाया जाए और सरकार का गठन सबको साथ लेकर किया जाए, इसिलए जब नेहरू जी ने सरकार बनाई तो सभी को आमंत्रित किया, जिसमे श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी थे. जब राज्यों का भारत में विलय हो रहा था तब उनकी क्या राय थी? उनकी राय से सभी मुस्लिम बाहुल्य इलाको को अलग कर देना चाहिए, जिसमे कश्मीर भी आता था. नेहरू जी को छोड़ कर कोई भी कश्मीर के भारत में विलय के पक्ष में नहीं था, यहां तक कि लोहपुरुष पटेल भी नहीं. आज कश्मीर अगर हिन्दुस्तान का हिस्सा है तो वो नेहरूजी की जिद्द की वजह से. कश्मीर के 370 धारा को बनाने वाले पटेल थे और मंत्रिमंडल की सहमति से पास हुआ था जिसमे श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी थे. लेकिन हिन्दुत्ववादियों के ये सब सही इसलिए नहीं लग रहा था क्योकि इसके चलते उन्हें जनता का सहयोग नहीं मिल रहा था हिन्दू राष्ट्र के लिए.



गांधी जी की हत्या के बाद पूर्वी बंगाल जो पकिस्तान बन गया था, में फिर दंगे भड़के तब नेहरू ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली के साथ समझौता किया कि हिन्दुस्तान यहाँ के अल्पसंख्यकों को सुरक्षा देगा और पाकिस्तान वहाँ बसे अल्पसंख्यकों को, दोनों देश अल्पसंख्यक आयोग बनायेगे अल्पसंखयकों के अधिकारों की रक्षा करेंगे. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और उनके साथियों को लगा कि उनका सपना इस समझौते के बाद मुश्किल है, क्योकि वो चाहते थे कि दोनों देशों में ऐसा माहौल बने ताकि हिन्दू वापिस हिन्दुस्तान आ जाए और इस के चलते हम मुसलमानों को यहां से निकाल सके, तब यहां हिन्दू होंगे और हमारे लिए हिन्दू राष्ट्र बनाना आसान हो जाएगा. तब मुखर्जी ने इस समझौते के खिलाफ सरकार से इस्तीफा दे दिया. हिन्दू महासभा और संघ पर गांधी की हत्या की वजह से काफी प्रतिबन्ध थे, इसलिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने संघ और हिन्दू महासभा के साथ मिलकर राजनितिक पार्टी जनसंघ बनाई. जनसंघ को हिन्दू राष्ट्र पर कोई खास सफलता नहीं मिल रही थी, ना ही उनके पास कोई और मुद्दा था तब कश्मीर मुद्दा बनाया गया ताकि इस मुद्दे को लेकर जनता के बीच जाया जा सके. जनसंघ के पास ना तो कोई अर्थव्यवस्था का विकल्प था नाही कोई और सिर्फ और सिर्फ एक ही मुद्दा था, हिन्दुराष्ट्र और कश्मीर. इसलिए श्यामा प्रसाद का भारतीय राजनीति में क्या योगदान है यह एक प्रश्न चिन्ह है. (आलिम)

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