महिला होने का महत्व : Value of being a woman

19 अगस्त 2019   |  अनिल शर्मा   (3890 बार पढ़ा जा चुका है)

महिला होने का महत्व : Value of being a woman

zindagi ke anubhav,Blog on life experience

स्त्री

महिला अर्थार्थ दादी , माँ , पत्नि , बहन , बेटी, बुआ , मासी ,............आदि ..... आदि| इनके बिना घर केवल मकान होता है, घर नहीं। इनकी कमी का अहसास तब होता है, जब वे घर में नहीं होतीं या आपके साथ किसी स्त्री का सम्बंध नहीं होता। यदि अपवाद को छोड़ दें तो स्त्री के बिना समाज में पुरुष की value कुछ भी नहीं।


इसका अनुभव मुझे तब हुआ, जब मैं पहली बार नौकरी join करने के लिए अपने घर भरतपुर से दिल्ली गया। चूँकि नौकरी करनी थी, तो रहने के लिए घर भी चाहिए था। पहले तो कोई मकान मिला नहीं । फिर , ऑफिस के तीन बन्दों के साथ मिल कर एक फ्लैट ले लिया। लेकिन चार महीने ही गुजरे थे कि फ्लैट स्वामी ने फ्लैट खाली करने के लिए कह दिया। बोले कि फ्लैट परिवार वाले को देना है। मैं समझ गया की हम तीन लोग छडे हैं इसीलिए उनका मानस बदल गया है। हाँ , अगर हमारे साथ माँ , दादी या बीबी हो तो कोई दिक्कत नहीं थी ।

हांलाकि आज के समय में हॉस्टल / पेइंग -गेस्ट की सुविधा है। पर अभी भी यदि किसी तरह मकान मिल भी जाए, तब भी लोगों की नज़रें रहती हैं, आपकी गलत हरकतों पर, और आपके ऑफिस की कोई महिला साथी आपसे मिलने आ जाए तो फ़ौरन ज़माने की त्योरिआं चढ़ जाती हैं, क्योकि आपका परिवार नहीं है। पड़ोस में खुसर -फुसर शुरू हो जाती है।


स्त्री का समाज में महत्व तब से है, जब से कायनात है। बिना स्त्री के परिवार नहीं , परिवार नहीं तो उमंग नहीं , उमंग नहीं तो त्यौहार नहीं। क्या कभी "रक्षाबंधन" बिना बहन के मनाया जा सकता है? क्या होली , दीपावली बिना माँ , पत्नी के अच्छी लगती है? ज़िन्दगी के हर पहलू में स्त्री का अस्तित्व है, उसके बिना संसार नहीं। जरा हम केवल कल्पना ही करें कि, " दुनियाँ में केवल पुरुष ही होते तो दुनिया कैसी होती "। पहली बात तो ये कि, सृष्टि ही नहीं होती, और यदि होती भी, तो ज़िन्दगी इतनी हंसीं नहीं होती।

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स्त्री



ये लाड़ , प्यार , दुलार जब एक माँ अपने बच्चे को देती है तो बच्चे की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता। बहन जब अपने भाई से प्यार भरी लड़ाई लड़ती है तो भाई को उसे छेड़ने में कितना आनंद आता है। पत्नि जब समय-समय पर अपने पति को सहारा देती है, उसके सुख-दुःख में सहयोगी बनती है तो पति को कितना सम्बल मिलता है। ये जो ''तीज-त्यौहार'' मनाये जाते हैं, क्या बिना स्त्री के संभव हैं!! घर को संवारना , परिवार की हर जरूरत का ध्यान रखना , कठिन समय में परिवार के साथ कंधे से कन्धा मिलकर खड़े रहना, स्त्री के अस्तित्व को नई ऊंचाइयां प्रदान करता है।

कभी जब कल्पना करता हूँ कि "अगर मैं घर में अकेला हूँ "| माँ , पत्नि , बहन कोई न हो तो !! तो मुझसे से मिलने मेरा पडोसी भी नहीं आएगा, मेरे रिश्तेदार भी सोचेंगे हैं कि अकेले के घर क्या जाएँ। विशेषकर पड़ोस की महिला तो मेरे घर आने से ही हिचकिचाएगी। बच्ची की यदि शादी करदी है, तो वो भी मुझे अपने घर पर ही बुलाएगी, अपने पापा के घर आने में वो सोचेगी की "मम्मी तो हैं नहीं"। बेटी-बेटे अपने दिल की बात माँ से ज्यादा करते है , जरूरत होने पर ही वो बात पापा तक पहुँचती है। यदि मेरी बेटी की डिलीवरी होनी है, तो जो सहायता मेरी माँ , पत्नि , बहन कर सकती है, क्या मैं कर पाउँगा? नहीं ........... कदापि नहीं।


कई बार सोचता हूँ कि "मेरी पत्नि मुझे शराब पीने से क्यों रोकती है" !! क्यों वो अपना खाना-पीना भूल जाती है, पर मुझे व् बच्चों को दवाई खिलाना नहीं भूलती, जब मैं व् बच्चे बीमार पड़ जाते हैं। वो इसलिए कि अगर मुझे कुछ हो गया तो उसका व् परिवार का क्या होगा ? फिल्म "मदर इंडिया" का वो सीन आज भी याद आता है, जब पति के घर छोड़ कर चले जाने पर पत्नि पर बूढी सास व् दो बच्चों को सँभालने की जिम्मेदारी आ जाती है। और ज़िन्दगी से उसका लम्बा संघर्ष शुरू हो जाता है। कमोबेश, वो ही स्थिति आज भी हमारे गाँवो में है। क्या स्त्री हार मान लेती है ? क्या वो तुरंत दूसरी शादी कर लेती है। आमतौर पर तो नहीं। और मर्द ........??????

जब मेरी पत्नी मुझे गलत काम करने से रोकती है, तो मैं अपनी मर्दानगी इसी बात में समझता हूँ की, मुझे इससे दब कर नहीं रहना, वरना..... दुनियां मुझे ताने मारेगी। मर्द होने का मतलब ये कदापि नहीं कि अपनी पुष्ट भुजाओं को कमजोरों पर आजमाता रहूँ। मेरी नज़र में मर्द वो है जो पत्नि की भावनाओं की कद्र करे , कठिन स्थिति में उनका साथ दे।


कन्या पूजन

हिन्दू धर्म में नवरात्री में कन्या-पूजन का प्रावधान है , क्यों ?

हिंदू दर्शन के अनुसार, इन लड़कियों को सृजन के प्राकृतिक बल की अभिव्यक्ति माना जाता है [As per Hindu philosophy, these girls are considered as the manifestation of the natural force of creation]

देवी पूजा के एक भाग के रूप में "कन्या-पूजा" बालिकाओं में निहित स्त्री शक्ति को पहचानने के लिए और उन्हें सामाजिक ताने-बाने में उतनी ही अहमियत देने के लिए है , जो तथाकथित उत्तराधिकारी [लड़के ]हैं , जिन्हें अन्यथा औसत रूप में घर जाना जाता है [Kanya puja as a part of Devi worship is to recognise the feminine power vested in the girl-child and to give them as much importance in the social fabric as the so-called heir apparents (boys) who are otherwise known to be pampered in an average household.]

इन सबके बीच भी, एक बच्ची को उसकी मासूमियत की वजह से सबसे शुद्ध माना जाता है।

[source wikipedia]


हिन्दू मान्यताओं के अनुसार:-सृष्टि की "उत्पत्ति-शक्ति" स्त्री ही है। इसलिए वो वंदनीय है। हालाँकि उसके व्यवहार,चरित्र भिन्न हैं. लेकिन उसके महत्व् को समाज में कम नहीं आँका जा सकता। शारीरिक बल में वो पुरुष से भले ही कम हो, परन्तु बौद्धिक व् मानसिक क्षमता में वो पुरुष के बराबर है।


अब जो सबसे बड़ा सवाल है, वो ये कि, हम पुरुष उन्हें किस नज़र से देखते हैं ? जिस नज़रिये से भी देखते हैं , क्या उसमे बदलाव की जरूरत है? ये नजरिया ही है जिससे समाज के विभिन्न धर्मों , जातिओं में स्त्री का अलग-अलग स्तर देखने को मिलता है। यदि समाज, परिवार शिक्षित है, तो स्त्री का सम्मान भी उत्कृष्ट है, इसके विपरीत........... स्त्री की स्थिति ख़राब है, वहाँ स्त्री की भावना की कोई कद्र नहीं है फिर चाहे वो माँ , बेटी , पत्नी किसी भी रूप में हो। बेहद शर्म की बात है !




और स्वयं स्त्री का अपने बारे में क्या विचार है। अधिकतर स्त्रिओं ने अपने आप को , अपने महत्व को पहचाना ही नहीं है। क्या वो स्वयं को पुरुष का सहभागी मानती है, क्या वो आत्मनिर्भर हैं, क्या उसे अपनी हैसियत का अनुमान है, क्या वो किसी पर आश्रित हैं ?

यह कहना पड़ेगा कि आज के समय में स्त्री जागरूक हुई है। उसने अपने अस्तित्व व् महत्व को पहचाना है। अब वो अबला नहीं है। उसने आवाज़ बुलंद करना सीख लिया है। परन्तु अभी भी उसे बहुत कुछ करना बाकी है, विशेष कर पिछड़े समाज की महिला को, जो अभी भी अशिक्षा , पर्दा -प्रथा , रूढ़िवादिता के कुचक्र में फँसी हुई है। उन्हें अपनी सहायता स्वयं करना सीखना होगा।


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रूचि
21 अगस्त 2019

क्या लेख लिखा है अपने, ये तो सुपर से भी ऊपर वाला है | दिल खुश हो गया |

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