विचार शक्ति :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

21 अगस्त 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (3014 बार पढ़ा जा चुका है)

विचार शक्ति :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*परमपिता परमात्मा के द्वारा इस समस्त सृष्टि में चौरासी लाख योनियों का सृजन किया गया , जिसमें सर्वश्रेष्ठ बनकर मानव स्थापित हुआ | मनुष्य यदि सभी प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है तो उस का प्रमुख कारण है मनुष्य की बुद्धि , विवेक एवं विचार करने की शक्ति | मनुष्य यदि अपने विचार शक्ति पर समुचित नियंत्रण करके सकारात्मकता के साथ संचालन कर ले तो वह इसके माध्यम से विद्युत की भांति बड़े से बड़े कार्य भी संपन्न कर सकता है , परंतु जिनके विचार अनुशासित नहीं है जिनका अपने विचारों पर नियंत्रण नहीं है वह स्वयं को नष्ट तो करते ही हैं साथ ही अपने आस पास के लोगों के लिए घातक ही सिद्ध होते हैं | नियंत्रित एवं सकारात्मक विचार एक मित्र की तरह मनुष्य की रक्षा एवं सहायता करता है तो नकारात्मक एवं अनियंत्रित विचार शत्रु की भाँति घातक होता है | विचार की शक्ति अद्भुत है , विचार करने की शक्ति का संचय करके हमारे मनीषियों ने नित्य नवीन अनुसंधान किये हैं जिनका लाभ सम्पूर्ण मानव जाति ले रही है | इतिहास साक्षी है कि नकारात्मक एवं अनियंत्रित विचारों के वशीभूत होकर ही त्रैलोक्य विजयी , प्रकाण्ड विद्वान , एवं उच्चकुल में जन्म लेने वाला रावण कुल समेत नष्ट तो हो ही गया साथ ही युग व्यतीत हो जाने के बाद भी निन्दा का ही पात्र बना हुआ है | नियंत्रित एवं सकारात्मक विचार का इतना महत्त्व है कि उसी कुल में उत्पन्न विभीषण कल्प भर लंका में शासन करता रहा | इसीलिए मनुष्य को अपने विचार क्षमता का आंकलन करके उसे सकारात्मक दिशा में मोड़ना चाहिए | विचारों का तेज मनुष्य को ओजस्वी बनाकर नित्य नई सफलता दिलाता रहता है | प्रबल विचार शक्ति वाले कभी भी , किसी भी क्षेत्र में पराजित नहीं होते हैं |*


*आज के भागदौड़ भरे जीवन में मनुष्य को किसी भी विषय पर विचार करने का पर्याप्त समय ही नहीं पा रहा है | स्वयं को आधुनिकता के मकड़जाल में फंसाकर मनुष्य अपने संस्कारों , संस्कृति एवं परिवेश के विपरीत कार्य करता हुआ देखा जा सकता है | अपनी विचार शक्ति को जागृत एवं प्रबल बनाने की अपेक्षा आज का मनुष्य सबकुछ नकल करके ही कर लेना चाहता है | आज समाज में जिस प्रकार अनाचार , पापाचार बढ़ रहा है उसका प्रमुख कारण यही है कि मनुष्य के विचार अनियंत्रित एवं नकारात्मक होते जा रहे हैं , जिसके कारण मनुष्य अपराधी बनकर जीवन व्यतीत कर रहा है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यही कहना चाहूँगा कि यदि प्रत्येक मनुष्य के विचार मांगलिक हैं तो वह इसी धराधाम पर स्वर्ग की अनुभूति कर सकता है | अनियंत्रित विचार के वशीभूत होकर मनुष्य कुछ ऐसे कृत्य कर देता है कि उसका सुखमय जीवन भी नारकीय हो जाता है | मनुष्य को सदैव अपने विचारों पर नियंत्रण रखना चाहिए क्योंकि जहाँ मनुष्य के विचार स्वतंत्र होते हैं वहीं उनको कलंकित होना पड़ता है जिसके फलस्वरूप मनुष्य नरक की भीषण ज्वाला में जलने लगता है | विचारों की शक्ति बहुत ही प्रबल एवं तीव्र है इसकी चपेट में आने से संसार की कोई शक्ति नहीं बचा सकती , इससे वही बच पाता है जिसका अपने विचारों पर नियंत्रण है |*


*मनुष्य को सुख - दुख , सम्मान - अपमान या किसी भी परिस्थिति में सदैव अपने विचारों पर नियंत्रण बनाये रखना चाहिए | जो प्रबुद्ध हैं वे अपने विचार शक्ति के माध्यम से इस संसार में सब कुछ प्राप्त करके ईश्वर को भी पा जाते हैं |*

अगला लेख: संयुक्त परिवार :---- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
21 अगस्त 2019
*इस सृष्टि में आदिकाल से सनातन धर्म विद्यमान है | सनातन धर्म से ही निकलकर अनेकों धर्म / सम्प्रदाय एवं पंथ बनते - बिगड़ते रहे परंतु सनातन धर्म आदिकाल से आज तक अडिग है | यदि सनातन धर्म आज तक अडिग है तो इसका मूल कारण है सनातन के सिद्धांत एवं संस्कार , जिसे सनातन की नींव कहा जाता है | इस संसार में नींव
21 अगस्त 2019
21 अगस्त 2019
जा
जाने कब नज़र बदल जाए, जो आज अपने हैं वो पराए बन जाएं। आईना भी संभल कर देखना , जाने कब अपनी ही नजर लग जाये। ख्वाबो को दामन मे सहेज कर रखना , जाने कब किस्मत के सितारे बदल जाएं ।दर्द को भी निगाहों मे छिपा कर रखना , जाने कब दर्द ही दवा बन जाये। हवाओं से भी शर्त लगा लेना , जाने कब हम हवाओं से भी आगे निकल
21 अगस्त 2019
03 सितम्बर 2019
*इस समस्त सृष्टि में जहां अनेकों प्रकार के जीव भ्रमण करते हैं जलचर , थलचर , नभचर मिला करके चौरासी लाख योनियाँ बनती है | इन चौरासी लाख योनियों में मानव योनि को सर्वश्रेष्ठ बताते हुए हमारे धर्मग्रंथ इस पर अनेकों अध्यात्म वर्णन करते हुए दृष्टिगत होते हैं | प्रायः सभी धर्मग्रंथों में इस मानव शरीर को द
03 सितम्बर 2019
21 अगस्त 2019
*मानव जीवन में शत्रु - मित्र , दिन - रात , सकारात्मकता - नकारात्मकता की तरह ही सुख एवं दुख भी आते जाते रहते हैं | यह सारे क्रियाकलाप या रिश्ते - नाते मनुष्य की सोच के ऊपर निर्भर होते हैं | यह मनुष्य स्वयं तय करता है कि वह सुखी रहना चाहता है या दुखी ? क्योंकि इसके मूल में मनुष्य की सोच ही होती है |
21 अगस्त 2019
05 सितम्बर 2019
*हमारा भारत देश एवं उसकी संस्कृति इतनी दिव्य एवं अलौकिक है यहां नित्य कोई ना कोई पर्व , कोई न कोई व्रत मनाया कि जाता रहता है | हमारे ऋषि - महर्षियों ने मात्र के कल्याण के लिए जीवन के सभी क्षेत्रों में इतने विधान बता दिये हैं कि शायद ही कोई ऐसा दिन हो जिस दिन कोई व्रत - उपवास , पर्व - त्यौहार ना हो
05 सितम्बर 2019
17 अगस्त 2019
*इस सृष्टि के आदिकाल में जहाँ सनातन धर्म के अतिरिक्त कोई अन्य धर्म नहीं था वहीं सनातन धर्म के विद्वान ऋषि वैज्ञानिकों ने ऐसे - ऐसे रहस्यों को संसार के समक्ष रखा जिसको आज के वैज्ञानिक अभी तक नहीं समझ पा रहे हैं | मानव जीवन में समय के महत्त्वपूर्ण स्थान एवं योगदान को समझते हुए हमारे पूर्वज ऋषि वैज्ञान
17 अगस्त 2019
21 अगस्त 2019
*मानव जीवन में शत्रु - मित्र , दिन - रात , सकारात्मकता - नकारात्मकता की तरह ही सुख एवं दुख भी आते जाते रहते हैं | यह सारे क्रियाकलाप या रिश्ते - नाते मनुष्य की सोच के ऊपर निर्भर होते हैं | यह मनुष्य स्वयं तय करता है कि वह सुखी रहना चाहता है या दुखी ? क्योंकि इसके मूल में मनुष्य की सोच ही होती है |
21 अगस्त 2019
26 अगस्त 2019
*इस संसार में राजा - रंक , धनी - निर्धन सब एक साथ रहते हैं | इन सबके बीच दरिद्र व्यक्ति भी जीवन यापन करते हैं | दरिद्र का आशय धनहीन से लगाया जाता है जबकि धन से हीन व्यक्ति को दरिद्र कहा जाना उचित नहीं प्रतीत होता क्योंकि धन से दरिद्र व्यक्ति भी यदि विचारों का धनी होते हुए सकारात्मकता से जीवन यापन कर
26 अगस्त 2019
29 अगस्त 2019
*पूर्वकाल में मनुष्य ने आत्मिक प्रगति की थी | संस्कारों का स्वर्णयुग पूर्वकाल को कहा जा सकता है तो इसका प्रमुख कारण था संयुक्त परिवार | संयुक्त परिवार में सुख शांति एवं व्यवस्था का आधार आत्मीयता एवं पारस्परिक सहयोग ही होता है | जहां एक काम को परिवार के सभी सदस्य मिलकर के पूरा कर लेते थे और सामूहिक ध
29 अगस्त 2019
30 अगस्त 2019
*इस सृष्टि में जीव चौरासी लाख योनियों की यात्रा किया करता है | इन चौरासी लाख योनियों के चक्रानुक्रम में समस्त कलुषित कषाय को धोने के उद्देश्य जीव को मानव योनि प्राप्त होती है | इसी योनि में पहुंचकर जीव पूर्व जन्मों के किए गए कर्म - अकर्म को अपने सत्कर्म के द्वारा धोने का प्रयास करता है | मानव योनि म
30 अगस्त 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x