माँ का दायित्व :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

22 अगस्त 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (2591 बार पढ़ा जा चुका है)

माँ का दायित्व :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में मानव जीवन प्राप्त करने के बाद मनुष्य के विकास एवं पतन में उसके आचरण का महत्वपूर्ण योगदान होता है | मनुष्य का आचरण जिस प्रकार होता है उसी के अनुसार वह पूज्यनीय व निंदनीय बनता है | मनुष्य को संस्कार मां के गर्भ से ही मिलना प्रारंभ हो जाते हैं | हमारे महापुरुषों एवं आधुनिक वैज्ञानिकों दोनों का ही मानना है कि गर्भकाल में मां का जैसा आचरण होता है उसी प्रकार के आचरण लेकर के संतान जन्म लेती है | मां के गर्भकाल में परिवार का परिवेश , साधन एवं परिस्थितियों का विशेष महत्व है जो कि सीधा गर्भस्थ शिशु पर प्रभाव डालता है | इतिहास में ऐसे कई उदाहरण है जब माताओं ने परिस्थितियों एवं साधन के अभाव में भी अपने बालकों की जीवन दिशा निर्धारित कर दी और परिस्थितियों की अवहेलना करते हुए बच्चों का व्यक्तित्व अभीष्ट दिशा में क्षमता संपन्न बना दिया | गर्भस्थ शिशु अभिमन्यु के द्वारा चक्रव्यूह की रचना का वृतांत सुना जाना अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है | दैत्त्यराज हिरणाकश्यप की पत्नी कयाधू गर्ऊकाल में ऋषियों के आश्रम में रहीं और सतसंग करती रहीं तो उनके गर्भ से प्रहलाद जैसा भक्त पैदा हुआ , वही उच्च ब्राह्मण कुल में उत्पन्न महात्मा पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा की पत्नी केकसी के विपरीत आचरण के फलस्वरूप रावण एवं कुंभकरण जैसा दुर्दांत निशाचर पैदा होता है | कहने का तात्पर्य है कि मां जैसा चाहे वह वैसा ही अपनी संतान को बना सकती है और इसका शुभारंभ गर्भकाल से ही होता है |*


*आज के आधुनिक युग में जहां समाज में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था एवं रहन सहन की सुविधा प्राप्त हुई है वही गर्भवती महिलाओं का भी आचरण परिवर्तित हुआ है | आज माताओं को कष्ट होता है कि हमारी संतान कुल के विपरीत आचरण कर रही है जबकि सत्य है कि यदि संतान ऐसे आचरण कर रही है तो उसमें मां को यह विचार करना चाहिए कि गर्भकाल में मेरा कैसा आचरण था | आज घर के कमरे में बैठी हुई महिला टेलीविजन पर जिस प्रकार के (अनर्गल) प्रसारण को देख रही है उसका सीधा प्रभाव गर्भस्थ शिशु पर पड़ता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" इतना ही कहना चाहता हूं कि राष्ट्र की भावी पीढ़ी का निर्माण करने वाली माँ ही है | समाज के निर्माण में नारी की महत्वपूर्ण भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है | अत: प्रत्येक माँ की जिम्मेदारी बनती है की संतान के जन्म लेने के पहले ९ महीने की जो तपस्या करनी पड़ती है उस तपस्या काल में सदाचरण , सत्संग एवं राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत ग्रंथ / साहित्यों का अध्ययन एवं अपनी संस्कृति के अनुसार ही परिवेश निर्मित करने का प्रयास करती रहें ! जिससे कि इस संसार में आने वाले नए प्राणी का आचरण अपनी कुल मर्यादा के अनुसार हो अन्यथा क्या हो रहा है यह सभी देख रहे हैं | यह अकाट्य सत्य है कि गर्भकाल में मां का जैसा आचरण होता है आने वाली संतान उसी का अंश लेकर के प्रकट होती है | अतः माताओं को गर्भकाल में बच्चे के भविष्य के विषय में सोच कर के विशेष सावधानी बरतनी चाहिए |*


*माता का स्थान सबसे ऊँचा कहा गया है | "मातृ देवो भव" का नारा इसीलिए दिया गया है क्योंकि माँ शिशु को जन्म देने के पहले ही उसकी दिशा निर्धारित कर देती है |*

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