माँ के दूध का महत्त्व :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

29 अगस्त 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (2341 बार पढ़ा जा चुका है)

माँ के दूध का महत्त्व :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संसार में वैसे तो मनुष्य से भी अधिक बलवान जीव पाये जाते हैं परंतु मनुष्य ने अपने बुद्धि - विवेक , बल - कौशल से सब पर ही विजय प्राप्त की है | मनुष्य जन्म लेने के बाद इस धराधाम पर जो पहला आहार लेता है वह है "माँ का दूध" | जिस प्रकार संसार में जल के अनेक स्रोत होने के बाद भी गंगाजल को ही सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है उसी प्रकार दुग्ध के अनेक स्रोत होने के बाद भी "माँ के दूध" की बराबरी किसी में नहीं है | गर्भकाल की यात्रा करके आया जीव यात्रा की थकान छूटने के बाद प्रथम आहार "माँ के दूध" के रूप में लेता है ! प्रत्येक माता का यह कर्तव्य है कि वह अपने बच्चे को स्वयं अपना दूध पिलाये ` मां के दूध पर बच्चे का जन्मसिद्ध अधिकार है जो माताएं अपने बच्चे को दूध पिलाती है उस बच्चे को मां की ममता अधिक मिलती है , साथ ही बच्चे को दूध पिलाने से गर्भाशय तथा मांसपेशियों को सिकुड़ने में सहायता मिलती है | प्रत्येक मां को अपने बच्चे को दूध पिलाने में एक स्वर्गीय आनंद मिलता है , उसके रोम-रोम में ममता फूट पड़ती है और इसी वात्सल्य प्रेम के आवेग से दूध बहने लगता है | मां के दूध का क्या महत्व है यह संसार के क्रिया - कलाप में भी परिलक्षित होता है | जब किसी के बल को ललकारा जाता है तो लोग कहते हैं कि :- "अगर तूने अपनी मां का दूध पिया है तो और जोर लगा लो" | मां के दूध की समानता कोई भी वस्तु नहीं कर सकती ! जब बच्चा गर्भ में रहता है तो मां के रुधिर से उसका पालन - पोषण होता है , जन्म के बाद मां का दूध ही उसका प्राकृतिक भोजन होता है | जैसा माँ खाती है उसका सार दूध में आ जाता है जो बच्चे मां के दूध पर पलते हैं उनका स्वास्थ्य ऊपरी दूध पर पले बच्चों से श्रेष्ठ होता है | जन्म के तुरंत बाद मां के द्वारा जो दूध बच्चे को पिलाया जाता है वह गर्भकाल के अंतर्गत उत्पन्न होने वाले अनेक रोगों से शिशु की रक्षा करता है | पूर्व काल में मनुष्य के वलिष्ठ एवं हष्ट - पुष्ट होने का यही रहस्य था |*


*आज के चकाचौंध भरे युग में आधुनिक माताएं अपने बच्चे को स्वयं का दुग्धपान नहीं कराना चाहती क्योंकि उनको अपने बच्चे से अधिक अपने शारीरिक सौंदर्य के बिगड़ जाने का भय होता है | वैसे यह बात सब पर तो नहीं लागू होती है परंतु आज जो देखने को मिल रहा है उसके अनुसार यही कहा जा सकता है कि जन्म लेते ही बच्चे को ऊपर के दूध पर पलने के लिए विवश होना पड़ रहा है जिसका परिणाम है कि बच्चे रोगी एवं कमजोर होते जा रहे हैं | जबकि स्वयं का दूध न पिला कर के माताएं भी अनेक प्रकार के रोगों से ग्रसित हो रही हैं | क्योंकि मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" जहां तक जान पाया हूं उसके अनुसार स्वयं के स्तन का दूध पिलाने से मां को भी कई लाभ होते हैं | एक तो स्तनपान कराने वाली माताओं के गर्भाशय अधिक जल्दी पूर्ववत् हो जाते हैं जबकि स्तनपान न कराने वाली माताओं के भीतर यह क्रिया बहुत देर बाद संपन्न होती है , दूसरे माता एवं शिशु को एक गहरी भावनात्मक पुष्टि मिलती है जो एक विशिष्ट मनोवैज्ञानिक लाभ है | अतः प्रत्येक जागरूक जननी को स्तनपान का महत्व भली-भांति समझना चाहिए और उसे एक विशेष कर्तव्य समझकर अति उच्च मनोभाव के साथ संपन्न कराना चाहिए | आज यदि नई पीढ़ी के द्वारा अपनी माता का तिरस्कार हो रहा है तो उसका एक कारण यह भी है कि अधिकतर बच्चों ने अपनी मां की अपेक्षा ऊपर का दूध पिया है तो उनको मां के दूध की लाज का ध्यान भी नहीं रह जाता है | यह एक अनुभव है कि यदि किसी भी माता को स्तनपान कराने की स्थिति में देखा जाए तो उसके मुखमंडल पर वैसी ही तल्लीनता एवं दिव्य रहस्यात्मक आनन्दपूर्ण अनुभूति की छाप दिखाई पड़ती है जैसे किसी ध्यानमग्न योगी के चेहरे पर देखी जाती है | मानव जीवन में मां के दूध का बहुत बड़ा महत्व है इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है |*


*जिस मकान की नींव कमजोर होती है वह मकान जल्दी ही गिर जाता है उसी प्रकार जिस बच्चे का लालन-पालन मां के दूध के बिना होता है उसका आंकलन भी किया जा सकता है |*

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दिव्य लेख आचार्य जी

आभार दीक्षित जी

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