खुशी तुम कहाँ हो..?

29 अगस्त 2019   |  त्रिशला रानी जैन   (489 बार पढ़ा जा चुका है)

तुम कहाँ छिप जाती हो" खुशी"
मैं तुमको बार बार ढूढ़ती हूँ
कोई तो मुझे इसका पता बता दो
मेरे मधुर संगीत का साज थी वो

नदी का कल कल थी, झरने सी
बहती थी तू मेरी रागिनी बन कर
कई बार मुझसे लिपट जाती थी
फूलो सी सुगन्ध सी लुभाती थी

प्यार की चाशनी में पगी हुई
मेरे होठो पर मधु बन कर
मुस्कान बन जाती थी और
मुझे प्रेम का संगीत सुनाती थी

बहुत ढूढ़ती हूँ कहाँ है "खुशी"
शायद.........
मेरे हृदय के किसी कोने में
अल्हड़ नायिका सी छिप गयी है

मैंने सदां तुमको चाहा है ...
फिर क्यो रूठ जाती हो बार बार
टकराकर चट्टान से भी तुमको
मेने सदां मुस्कुरा कर दिखाया है

अब धीरे से तुमने मुझे
प्यार से यूं बताया है.....
एक बार फिर से तो देखो मेरी तरफ
मैं आज भी तेरी मुकुराहट में हूँ

पर तुझे ही एक अरसे से
हँसते हुए न पाया है
में तेरे आंसुओ में दफन हो गयी
तेरे मन के कोने में छिपी हूँ

मुझे ग़म के इन आँसुओ में
इस तरह न भिगोकर ....
मुझे अस्तित्व विहीन करो
कि मैं किसी बच्चे की किलकारी हूँ

किसी के प्यार का भरोसा हूँ
किसी की ज़िन्दगी का प्यार हूँ
दीपों की रोशनी सी जगमगाहट हूँ
होली में किसी के प्यार का रंग हूँ

फिर क्यों न सारा जहां तुझे चाहेगा
खुशियों को अपने गले लगाएगा
ज़िन्दगी तू मुझे इससे दूर न कर
मन घबरा गया है पीर के इस दर्द से ।
🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻🌻
त्रिशला ।


...

अगला लेख: कृष्ण जन्माष्टमी पर ।



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