अपने तो अपने होते हैं

29 अगस्त 2019   |  हरीश भट्ट   (2378 बार पढ़ा जा चुका है)

अपने तो अपने होते हैं

वक्त के साथ-साथ इंसान इतना बदल गया है कि उसको अपनी परछाई से भी डर लगने लगा है. पता नहीं कौन सा डर उसके दिल में घर कर गया है कि वह घंटों इंटरनेट पर उपलब्ध सोशल नेटिवर्किंग साइट्‌स में परायों को अपना बनाने के लिए सिर खपाता रहता है. जबकि दूसरी ओर उसके अपने रिश्तेदार, दोस्त उससे बात करने और मिलने के लिए तरसते रहते हैं. इन साइट्‌स के अस्तित्व में आने के बाद तो माहौल एकदम से बदल गया है. जो हमारे सामने साक्षात मौजूद है, उससे बात करते हुए हम कतराते हैं, जबकि दूसरी ओर जिसके बारे में हमारी जानकारी शून्य है, जिसके अस्तित्व का पता नहीं, उससे दोस्ती की फरियाद लगाने की जुगत में रहते हैं कि वह किसी तरह हमारा दोस्त बन जाए. उससे खुलकर अपने दिल की बात की जाए. यहां पर एक बात और है, जो हमारे सामने मौजूद है, वह हमारे बारे में ज्यादा नहीं तो थोड़ी बहुत जानकारी तो रखता ही होगा, फिर चेहरा और उम्र भी इंसान के बारे में बहुत कुछ कह देती है और चेहरा देखकर ही दोस्ती की शुरूआत होती है. सच्चाई बहुत कड़वी होती है, इसलिए इस कड़वाहट से बचने के लिए झूठ का सहारा ले लिया. तभी तो इन साइट्‌स पर अपने दोस्तों को छोड़ इंटरनेट की मदद से पराई कम्युनिटी में शामिल होने को बेताब रहते है. जहां पर न कोई हमारा चेहरा जानता है और न ही उम्र का बंधन. इन साइट्‌स पर अपने दिल के दबे-कुचले अरमानों को व्यक्त करते हुए उम्र पचपन की दिल बचपन की कहावत को आसानी से चरितार्थ किया जा सकता है. फिर यहां पर कोई पाबंदी भी नहीं होती कि अपने बारे में दूसरे को ईमानदारी से सच बताए. यहां की दुनिया हकीकत की दुनिया से बहुत अलग ही होती है. यहां की दुनिया बहुत हसीन व सतरंगी सपनों से भरीपूरी होती है. किसी को भी दोस्त बनाओ, घंटों बाते करो, नए सपनों को बुने, कोई रोकटोक नहीं. जबकि हकीकत की दुनिया में ऐसा नहीं होता है, वह बहुत संघर्षशील और कदमकदम पर सच्चाई से रूबरू कराने वाली होती है. इस हकीकत की दुनिया में वही कामयाबी से अपना सफर तय करते है, जिनके पास कुछ करने का जज्बा हो, सच्चाई से लडऩे की हिम्मत हो. यहां पर चेहरा और उम्र मायने नहीं रखती, इस दुनिया योग्यता व आत्मविश्वास के बल पर ही स्थाई दोस्त व हमसफर मिलते है, जो जिंदगी भर साथ देते है. जो हर दुःखदर्द में साथ खडे़ होते है. जबकि इंटरनेट की दुनिया में ऐसा नहीं हो सकता, जहां पर जरा भी सच बोलने की कोशिश की, समझा गए काम से. अब क्योंकि हम तो आज में ज्यादा विश्वास करते है और अपने आज को ईमानदारी से स्वीकारते भी नहीं. अब क्योंकि हमारे संस्कार ईमानदारी व सच्चाई की बुनियाद पर ही आधारित है. और हमने इन दोनों को तिलांजलि दे दी है. यही कारण है हमको अपनों से तो क्या अपनी परछाई से भी डर लगने लगा है. यही कारण है कि इन सोशल नेटवर्किंग साइट्‌स ने आज के युवा वर्ग के दिलोंदिमाग को अपनी गिरफ्त में ले लिया है. जहां पर वह हकीकत से दूर सपनों की सुनहरी दुनिया में ही जीते हैं. कुछ अपवाद हो सकते है. पर सच्चाई यह है कि इन साइट्‌स पर मौजूद कम्युनिटी की बुनियाद ही जब झूठ पर आधारित हो, वहां पर हम कैसे विश्वास कर सकते हैं कि हम सबसे अलग हैं और हमसे बेहतर कौन हो सकता है? जब हम खुद झूठ के सहारे दूसरों को अपना बना रहे हैं, तो क्या सामने वाला दोस्त वास्तव में सच कह रहा होगा. जिस दिन झूठ की दुनिया का सामना सच्चाई से होता है, उसी दिन धरती आसमान का फर्क समझ में आ जाता है. दूसरी तरफ हम अपनों को जो दूर कर रहे हैं वही कहीं न कहीं हमारे बीच अपने अस्तित्व का एहसास करवाते हैं. हमें भी अपने अंदर झांक कर देखना होगा समझ में आ जाएगा अपने तो अपने होते हैं.

अगला लेख: सेल्फी विद हेमंत छाबड़ा



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