मृगतृष्णा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

30 अगस्त 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (2338 बार पढ़ा जा चुका है)

मृगतृष्णा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस सृष्टि में जीव चौरासी लाख योनियों की यात्रा किया करता है | इन चौरासी लाख योनियों के चक्रानुक्रम में समस्त कलुषित कषाय को धोने के उद्देश्य जीव को मानव योनि प्राप्त होती है | इसी योनि में पहुंचकर जीव पूर्व जन्मों के किए गए कर्म - अकर्म को अपने सत्कर्म के द्वारा धोने का प्रयास करता है | मानव योनि में जन्म लेने के बाद जीव अपने जीवनकाल में अनेकों उद्देश्य की पूर्ति करता है परंतु जीव का परम उद्देश्य होता है भगवान का दर्शन करना | भगवान का दर्शन सर्वप्रथम मनुष्य अपने हृदय में करता है | भगवान का दर्शन हृदय में तब होता है जब मनुष्य का हृदय निर्मल एवं छल कपट से रिक्त हो , क्योंकि मानस में भगवान ने स्वयं घोषणा की है कि :- "निर्मल मन जन सो मोंहिं पावा ! मोंहिं कपट छल छिद्र न भावा !! अर्थात भगवान को वही प्राप्त कर सकता है जिसके मन में काम , क्रोध , मद , लोभ , छल , कपट आदि के लिए कोई स्थान न हो | सीधी सी बात है कि यदि आपके घर में कोई आता है तो उसको बैठने के लिए स्थान होना चाहिए , क्योंकि जब आपके घर में स्थान ही नहीं होगा तो आगंतुक कहां बैठेगा ? उसी प्रकार यदि हृदय में छल , कपट काम , क्रोध मोह आदि विकार भरे हैं तो भगवान के लिए स्थान कहां होगा ? हमारे पूर्वजों ने इन षड्विकारों का त्याग करके अपने हृदय में एवं साक्षात भी भगवान के दर्शन किये हैं | इन्हीं षड्विकारों को माया कहा गया है और जहाँ माया की प्रबलता होती है वहाँ भगवान कभी नहीं पधारते | मनुष्य को दो में से एक का चयन करना होता है या तो वह माया को प्राप्त कर ले या फिर भगवान को | माया में लिप्त होने के कारण ही मनुष्य भगवान के दर्शन से वंचित रह जाता है | हृदय में भगवान के लिए स्थान न बना पाने वाला मनुष्य भगवान की कृपा एवं दर्शन चाहता है तो यह असम्भव एवं उसकी मूर्खता ही कहा जा सकता है |*


*आज संसार में चतुर्दिक माया का प्रभाव देखने को मिल रहा है मनुष्य माया में इस प्रकार लिप्त हो गया है कि उसे भगवान के विषय में सोंचने का अवसर ही मिलता है | ऐसा नहीं है कि पूर्वकाल में माया प्रभावहीन थी माया का प्रभाव इस सृष्टि में आदिकाल से ही रहा है परंतु महापुरुषों ने स्वयं को संयमित करते हुए इस माया पर विजय प्राप्त करके ही भगवान के दर्शन किये थे | आज मनुष्य अनेकों प्रकार के व्रत , अनुष्ठान एवं साधनायें तो करता है परंतु उसके हृदय से काम , क्रोधादि विकार नहीं निकल पाते | कहने को तो मनुष्य किसी भी कामना विशेष से ईश्वर की पूजा - आराधना करता हुआ भगवान से भौतिक वस्तुओं की मांग करता है और उसे प्राप्त भी कर लेता है परंतु हास्यास्पद एवं आश्चर्यजनक यह है कि मनुष्य सदैव" भगवान से" मांगता है कोई भी आज "भगवान को" मांगने वाला नहीं दिखाई पड़ता | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि जिस प्रकार मनुष्य भौतिक संसाधनों की प्राप्ति के लिए अनेकानेक उद्योग करते हुए भगवान से उन वस्तुओं की माँग करता है उसी प्रकार यदि मनुष्य हृदय से छल - कपट आदि विकारों का त्याग करके यदि थोड़ा भी उद्योग भगवददर्शन के लिए कर ले तो वह आज के युग में भी भगवान का दर्शन असम्भव नहीं है , परंतु यह कर पाने में मनुष्य असमर्थ होता जा रहा है | दिखावे के लिए तो मनुष्य बड़े - बड़े अनुष्ठान , जप , यज्ञादि करता है परंतु उसका मन एक क्षण के लिए भी सांसारिक भावनाओं / वासनाओं से नहीं निकल पाता | ऐसा कर पाने में असमर्थ मनुष्य जब अपने द्वारा किये गये किसी भी अनुष्ठान का समुचित फल नहीं प्राप्त कर पाता तो वह सारा दोष भगवान को या फिर अनुष्ठान सम्पन्न कराने वाले वैदिक विद्वानों के ही माथे मढ़ देता है क्योंकि उसे अपने दोषों के दर्शन नहीं कर पाता | यह अकाट्य सत्य है कि जब तक मनुष्य ठगी , बेईमानी , झूठ , कपट , छल , छिद्रान्वेषण आदि विकारों में उलझा रहेगा तब तक उसे भगवान की कृपा नहीं प्राप्त हो सकती | मानव जीवन के परम उद्देश्य "भगवान के दर्शन" से आज जीव भटक गया है , यह कारण है कि आज वह अवेकों प्रकार की परेशानियों से घिरा रहता है |*


*मनुष्य जीवन अति दुर्लभ है इसे प्राप्त करने के बाद जीव को अपने पूर्वजन्मों में किये गये कुकृत्यों के सुधार का प्रयास करना चाहिए परंतु सर्वश्रेष्ठ मानव जीवन पाकर जीव और भी अधिक कुकृत्यों में लिप्त हो जाता है तो भला भगवान की कृपा प्राप्त कर पाना कैसे सम्भव हो सकता है |*

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