पल दो पल फिर आँख कहाँ खुल पाएगी ...

02 सितम्बर 2019   |  दिगंबर नासवा   (3116 बार पढ़ा जा चुका है)

धूल कभी जो आँधी बन के आएगी

पल दो पल फिर आँख कहाँ खुल पाएगी


अक्षत मन तो स्वप्न नए सन्जोयेगा

बीज नई आशा के मन में बोयेगा

खींच लिए जायेंगे जब अवसर साधन

सपनों की मृत्यु उस पल हो जायेगी

पल दो पल फिर ...


बादल बूँदा बाँदी कर उड़ जाएँगे

चिप चिप कपडे जिस्मों से जुड़ जाएँगे

चाट के ठेले जब सीले पड़ जाएँगे

कमसिन सड़कों पर कैसे फिर खाएगी

पल दो पल फिर ...


कितने कीट पतंगे घर में आएँगे

मखमल के कीड़े दर्शन दे जाते जाएँगे

मेंढक की टर-टर झींगुर की रुन-झुन भी

आँगन में फिर गीत ख़ुशी के गाएगी

पल दो पल फिर ...

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रेणु
03 सितम्बर 2019

अक्षत मन तो स्वप्न नए सन्जोयेगा
बीज नई आशा के मन में बोयेगा!!!!
मध्रुरता भरी सादगी से मन के बालसुलभ चुलबुले भावों को रचना में पिरोया है | बारिश के बहाने बहुत प्यारी रचना के लिए हार्दिक शुभकामनायें आदरणीय दिगम्बर जी |

दिगंबर नासवा
04 सितम्बर 2019

बहुत आभार रेणु जी ...

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