धर्म मंथन

07 सितम्बर 2019   |  pradeep   (424 बार पढ़ा जा चुका है)

हिन्दुस्तान ही दुनियां का एकमात्र देश है जहाँ हज़ारों सालो से देवी देवता रात में ख्वाबों में आते है और अपना मंदिर बनाने का आदेश दे देते है, सुबह उठाकर राजा, रानी या कोई साहूकारा जिन्हे देवी या देवता ने चुना होता है, अपने लोगो को आदेश दे देता है और एक नए मंदिर का निर्माण हो जाता है. हर मंदिर के निर्माण की कोई न कोई कहानी ज़रूर है. ऐसा नहीं होता तो एक और तरीका है , देवी, देवता ज़मीन से प्रकट होकर किसी ब्राह्मण के ख्वाब में आकर मंदिर बनाने का आदेश दे देते है और ऐसा ना करने पर पुरे देश का अनिष्ट करने की धमकी दे देते है. यह देवी देवता कभी ग़रीबों और दलितों को ख्वाब नहीं देते? शायद जानते है कि उसकी क्षमता नहीं है कि वो मंदिर निर्माण कर सके? देवी देवता भी समर्थ आदमी को ही चुनते है? मंदिर निर्माण के बाद ही, दलितों पर पाबंदी लगा दी जाती है कि वो लोग मंदिर में प्रवेश ना करे, क्योकि ना तो देवी या देवता ने उन्हें ख्वाब दिया था और न ही उस गरीब ने धन या दौलत से उस मंदिर का निर्माण कराया था, भले ही मज़दूरी की हो उस मंदिर के निर्माण में? मंदिर का काम काज ब्राह्मणों का है, वहाँ से होने वाली कमाई भी उनकी तो राजा या रानी को या कि साहूकार को क्या मिला आशीर्वाद, ब्राह्मण देवता का, साथ में मिला प्रशाद. ब्राह्मण का काम है कि वो जनता को बताये कि इस राजा या रानी और या साहूकार ने इस मंदिर का निर्माण कराया है और इससे देवता खुश हुए है अब बारी तुम लोगों की है इनके हुकुम को मानने की, ताकि देवी देवता नाराज़ ना होवे, देवी या देवता नाराज़ हुए तो इस देश पर विपदाएं आयेंगी और तुम्हारा अनर्थ होगा, जनता को डरा दिया जाता है और राजा का राज्य जनता का समर्थन पा लेता है , साहूकार के व्यापार को कोई चुनौती नहीं दे सकता है और ब्राह्मण देवता मंदिर के चढ़ावे पर मौज़ मनाता है. सब खुश तो दलितों को भी खुश रहना चाहिए क्योकि मंदिर, महल या साहूकार के घर के बाहर उसे भी खाने के लिए झूठन मिल ही जायेगी. दलित भी जानता है कि जितना उनकी तरक्की होगी उनको भी उतनी ही झूठन मिलेगी. दक्षिण भारत के मंदिर में तो आम जनता भी ब्राह्मण की झूठी पत्तलों पर लोट लगाती है और आशीर्वाद लेती है. यह है भारत की सामन्ती प्रथा, यही है मनुवाद. कायस्थ बेचारे इन सबके बीच अपनी जगह टटोलते रहते है? ना तो वो सामन्ती प्रथा का विरोध कर पाते है और ना ही मनुवाद का. कायस्थों के बारे में एक महान पत्रकार, लेखक खुशवंत सिंह ने लिखा है " ब्राह्मण अपना घर मंदिर के चढ़ावे से चला लेता है, क्षत्रिय राज-काज से और वैश्य खेती-बाड़ी, पशु-पालन और व्यापार से, शूद्र इन सबका गंद उठाकर, एक कायस्थ ही ऐसा वर्ग है जिसका अपना कोई ऐसा व्यवसाय हो जिससे वो अपना घर चला सके. उन्हें तो राजा या साहूकार की नौकरी ही करनी पड़ती है, चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम. मुस्लिम राजाओं बादशाहों के दरबार में ज्यादातर कायस्थ ही थे, यही कारण है कि कायस्थों ने पारसी और अरबी ज़ुबान सींखी और उर्दू ज़ुबान में अपना योगदान दिया. लेकिन कायस्थों के इस हालात के लिए ज़िम्मेदार कौन है? कायस्थों से ज्यादा भोला समाज कोई नहीं है? वो कही अपने को ब्राह्मण बताते है तो कही क्षत्रिय, और सच यह है कि ना तो ब्राह्मण समाज उन्हें ब्राह्मण मानता है और ना ही क्षत्रिय समाज उन को क्षत्रिय मानता है, कायस्थ ख़ुद ही अपने को इनके साथ जोड़ने की कोशिश करते रहते है. यदि कायस्थ क्षत्रिय थे तो क्या ज़रूरत थी खुद को कायस्थ कहने की? यही से एक और सवाल उठता है कि चित्रगुप्त महाराज कौन थे? कायस्थ समाज में माना जाता है कि वो पुरे भूमण्डल के राजा थे और उन्होंने इसको अपने 12 बेटों में बाट दिया था? क्या यह सब सूर्यवंशियों या चंद्रवंशियों से पहले की बात है? क्योकि मनुस्मृति और दूसरे पुराणों में सिर्फ सूर्यवंशी या चंद्रवंशी राजाओं का ही ज़िक्र होता है उनमे कही भी चित्रगुप्त महाराज के बारे में नहीं कहा गया? क्या कायस्थ सूर्यवंशी और चंद्रवंशियों से हार गए थे? ऐसा ज़िक्र भी किसी पुराण में नहीं होता. कायस्थ बस इस बात से ही खुश है कि कम से कम उन्हें शूद्रों में नहीं रखा, भले ही उनकी माँ को शूद्र बताया जाता रहा है. कायस्थों के बारे में ज्यादातर संस्कृत विद्वानों का मानना है कि वो क्षत्रिय पिता और शूद्र माँ की संतान है. उनके अनुसार महाराजा चित्रगुप्त क्षत्रिय थे और माँ नागवंशी थी थी जिन्हे शूद्र माना गया है, और कायस्थ उनकी संतान है. आज कायस्थों को इस मनुवाद को छोड़ कर अपने और महाराजा चित्रगुप्त के विषय पर विचार करना होगा, हज़ारों सालो से मनुवाद की गुलामी को मज़बूर होकर उनकी सामंतीप्रथा का साथ देते रहे से बाहर निकल कर सोचना होगा. कायस्थ मनुवाद का हिस्सा कतई नहीं हो सकते, मनुवाद की शुरुआत मनु से होती है जिसने अपने पुत्रों को चार वर्गो में बाट दिया था, और चित्रगुप्त महाराज मनु के पुत्र नहीं थे, वो ब्रह्मा के संपूर्ण काया से उत्त्पन हुए थे. जिनमे सभी गुण थे. फिर बाद में ऐसा क्या हुआ कि कायस्थ अपना वैभव खो बैठे और मनुवादियों के गुलाम बन गए? आज भी इस पर विचार करने की वजाय हम हिन्दुत्ववादियों के हाथों में खेल रहे है. ज़रूरत है अपने को पहचान ने की, इस बात का चिंतन करने की कि महाराजा चित्रगुप्त कौन थे और कायस्थ कौन है? ना तो इसके प्रमाण शास्त्रों या पुराणों में मिलेंगे, ना ही इतिहास में ना ही किसी पत्थरों पर खुदे अभिलेखों में मिलेंगे और ना ही कोई वैज्ञानिक तरीके से, इसलिए काम कठिन है पर नामुमकिन नहीं, वापिस एक बार फिर से पुराणों को पढ़िए अपने तरीके से ना की ब्राह्मणो के बताये तरीके से ? यही से बहुत सारे सवाल पैदा होंगे. कृष्ण कौन थे, शिव कौन थे स्वयं ब्रह्मा कौन थे और विष्णु क्या एक थे या दो ? इन सवालों के जवाब भी है लेकिन इसके लिए दुबारा से तार्किक तरीकों से विचार करना होगा, अंधभक्त बनके इन सवालों का उत्तर नहीं मिलेगा. हिन्दू ना तो दुनिया का पहला धर्म है और नाही सबसे पुराना? इन सवालों पर एक एक करके चर्चा करंगे और जानने की कोशिश करेंगे सच्चाई.(भाग-१, आलिम)

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