लघुकथा- अल्पायु

09 सितम्बर 2019   |  शिल्पा रोंघे   (434 बार पढ़ा जा चुका है)

लघुकथा- अल्पायु

अपने स्कूल के आम के पेड़ के नजदीक खड़ा थी तन्वी, ये वही पेड़ था जिस पर वो आम तोड़ने जा चढ़ी थी। नन्ही तन्वी जो बमुश्किल १० साल की थी.जैसे तैसे चढ़ तो गई लेकिन उतरना जैसे टेढ़ी खीर बन गया।

पेड़ के नजदीक से गुजरते हुए रोशन ने झिझकते हुए तन्वी से कहा क्या मैं आपकी मदद कर सकता हूं। तन्वी ने सिर हिलाते हुए हामी भर दी।

रोशन की मदद से पेड़ से उतरी तन्वी बिना कुछ बोले अपने क्लासरुम की तरफ़ बढ़ गई।

रोशन उस वक्त १२ वीं क्लास में पढ़ता था।

तब स्कूल के इम्तिहान चल रहे थे यानी रोशन के स्कूल छोड़ने का वक्त अब आ चुका था।शहर के नामी वैघ का बेटा था रोशन,रोशन ने शायद तन्वी को शायद पहली बार ही देखा था, लेकिन तन्वी रोशन को कुछ हद तक पहचानती थी।

हर साल मेरिट में पहले नबंर पर आता था रोशन स्पोर्ट्स में भी वो ही आगे था।

स्कूल के बच्चों के लिए मिसाल था वो.आगे की पढ़ाई के लिए रोशन को शहर छोड़ना पड़ा।

रोशन तो शायद तन्वी को भूल भी गया.लेकिन २२ साल की तन्वी के जहन मेें रोशन की धुंधली तस्वीर जिंदा थी।

शायद इसलिए अपनी छोेटी बहन की शादी में आए रोशन को फौरन पहचान गई तन्वी।

तन्वी के जीजा का खास दोस्त था रोशन, घुंघराले बाल और मोहक मुस्कान वाला ये किशोर अब एक आकर्षक युवक में बदल चुका था।
अपनी मां के साथ दुल्हे को तिलक लगाने तन्वी स्वागत द्वार पर खड़ी थी। तन्वी रोशन की तरफ देखकर मुस्काराई हैरान रोशन तन्वी को पहचान नहीं पाया और आगे बढ़ा.सात फेरों के बाद अब वक्त हो चला था दोपहर के खाने का.तन्वी की छोटी बहन दुल्हे के साथ बातचीत में मशगुल हो गई। रोशन ना जाने कहां गायब हो गया था। तभी तन्वी की बगल वाली चेयर पर बैठी काकी ने तन्वी को कुछा कहा। क्या कहा आपने जरा तेज आवाज में बोलिए तन्वी ने कहा। तेज आवाज में लाउडस्पीकर्स पर बज रहे गाने की वजह से काकी की आवाज तन्वी के कानों तक नहीं पहुंच पाई थी। काकी ने अपनी चेयर तन्वी के पास खिसकाकर कहा अरे मैंने कहा तुम कब मुंह मीठा कराओगी अब तो तुम्हारी छोटी बहन की भी शादी हो गई है।

तन्वी बस मुस्कुराकर रह गई.कहती भी क्या तन्वी, उसकी मां ने जो कहा २३ साल से पहले तन्वी की शादी करना ठीक नहीं होगा।

ऐसा उसकी कुंडली में जो लिखा था।

सोचते-सोचते कब बिदाई का वक्त आ गया पता ही नहीं चला.जान्हवी के आंसूओं को पोंछते हुए तन्वी ने कहा खत लिखना मत भूलना हां.फूलों से सजी कार की तरफ बढ़ी जान्हवी खिड़की से झांक कर अलविदा कहते हुए आगे बढ़ती हुई कार के साथ कब आखो़ं के समाने से ओझिल हो गई पता ही नहीं चला।

जानह्वी की शादी हुए अभी कुछ ही दिन बीते थे कि रोशन के पिताजी तन्वी के घर रिश्ता लेकर पहुंचे।

ये बात जानकर बहुत खुश थी तन्वी, हो भी क्यों ना भला।

रोशन जैसे पति की चाह किस लड़की को नहीं होगी भला।

रेवेन्यू सर्विसेज़ में सिलेक्ट हो चुका था रोशन।

मां के ठीक बाजू में खड़ी तन्वी को मां ने चाय बनाने का इशारा किया।

हां कहते हुए तन्वी किचन की तरफ बढ़ी।

तन्वी अगले महीने २३ की होने वाली थी।

ना चाहते हुए भी तन्वी की मां को वैघ जी के सामने वो राज खोलने ही पड़ा जिसे वो तन्वी से बरसों से छुपाए थी। आपके रोशन में कोई कमी नहीं लेकिन ये रिश्ता नहीं हो सकता तन्वी के दिल में छेद है तन्वी की मां ने कहा।

तन्वी के फ़ैमली डॉक्टर ने ही ये बताया था कि वो अल्पायु है।

वैघ जी ने कहा कि क्या मैं उस डॉक्टर का नाम जान सकता हूं।

एक पुरानी डायरी को खोलते हुए तन्वी की मां ने डॉक्टर कुमार का पता आगे बढ़ाया।

तभी चाय की ट्रे लेकर तन्वी कमरे में दाखिल हुई।

तन्वी ने चाय का कप वैघ जी की तरफ़ आगे बढ़ाया.सब बातों से अंजान शादी के सपने बुन रही तन्वी अपने ही ख्यालों में गुम थी।

चाय खत्म करते हुए वैघ जी ने कहा अब चलता हूं बहन जी।

तन्वी के घर से निकलते हुए वैघजी पुराने भोपाल की तरफ बढ़े यही पर डॉक्टर कुमार का दवाखाना हुआ करता था।दिल की बीमारियों के खास जानकार थे वो।

मरीजों की लंबी कतार लगा करती थी यहां।

१० मरीजों के बाद वैघ जी का नंबर आया।

डॉक्टर ने वैघजी को सामने वाली चेयर पर बैठने को कहा।

क्या तकलीफ है आपको डॉक्टर ने कहा.वैघ जी ने कहा मुझे कोई तकलीफ़ नहीं है फिर क्यों आए है यहां डॉक्टर कुमार ने कहा।

मालूम हुआ है कि आप तन्वी के फैमली डॉक्टर है किस आधार पर आपने कह दिया की वो ज्यादा नहीं जिएगी।

देखिए मैं किसी का भाग्य नहीं लिख सकता लेकिन ये जरुर कह सकता हूं कि तन्वी की उम्र ज्यादा नहीं है, उसके दिल में छेद है।

जिंदगी कब दगा दे जाए इसका कोई भरोसा नहीं है।

डॉक्टर की बात पर पलटकर जी ने कहा भरोसा तो यहां किसी का नहीं है क्या आप जानते हैं कि आप कितने साल जिएंगें।

देखिए मुझे कोई शौक नहीं है किसी की तकदीर बताने का, अपने अनुभव के आधार पर मैंने ये बात कही थी।

माने या ना माने ये आपकी मर्जी डॉक्टर साहब ने कहा।

वैघ जी ने बिना कोई बहस किए वहां से निकलना ही मुनासिब समझा।

वो यकीन नहीं कर पा रहे थे कि जिस तन्वी को वो अपनी बहू बनाने की चाह पाले हुए थे,वो बस कुछ सालों की ही मेहमान है।
अगले दिन वो फिर तन्वी के घर पहुंचे और उसकी मां से कहा क्या मैं तन्वी से एक बार मिल सकता हूं।

तन्वी की मां ने अपना सिर हिलाकर हामी भरी,और बरामदे की तरफ़ इशारा किया जिसकी छत से टंगे झूले पर झूल रही तन्वी वैघ जी को देखकर अचानक ही रुक गई। आज वैघ जी ने एक पल में ही उस भूल को पकड़ लिया जिसे दिल के नामचीन डॉक्टर मिस कर गए थे.दरअसल तन्वी का दिल बाएं की बजाए दांई तरफ़ था जिसे डॉक्टर ने दिल में छेद करार दिया था।

दुनिया के तकरीबन १२ हजार लोंगो में से एक इंसान का दिल दाई तरफ़ होता है उस दौर में आज की तरह जांच के लिए मशीनें मौजूद नहीं थी। सिर्फ आले के भरोसे ही सारा काम होता था। बरामदे के दरवाजे पर खड़ी तन्वी की मां की तरफ देखते हुए वैघ जी ने कहा तन्वी इतनी जल्दी नहीं मरेगी।

आज उस राज का पर्दाफ़ाश हुआ जो तन्वी की मां सालों से अपने दिल में छुपाए हुए रखी थी।सच जानकर मां से ज्यादा हैरानी तन्वी को हुई कि किस तरह कुंडली के बहाने उसकी मौत के सच को कैसे मां ने सालों छुपा कर रखा।

अपनी मां के सीने पर सिर रख तन्वी निशब्द सी हो गई।

उसी आम के पेड़ की तरफ़ एकटक देख रही तन्वी अचानक यादों के झरोखे से तब बहार निकली जब रोशन ने आवाज दी अब कब तक इस पेड़ को निहारोगी।

अल्पायु तन्वी आज रोशन की पत्नी बन चुकी थी।

पैंसठ साल की दीर्घायु।



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