जानिए पितृपक्ष में पितरों के लिए पिण्डदान और श्राद्ध कैसे करें??

13 सितम्बर 2019   |  पं दयानन्द शास्त्री   (439 बार पढ़ा जा चुका है)

जानिए पितृपक्ष में पितरों के लिए पिण्डदान और श्राद्ध कैसे करें??

शास्त्रों में मनुष्य के लिए तीन ऋण कहे गये हैं- देव ऋण, ऋषि ऋण व पितृ ऋण। इनमें से पितृ ऋण को श्राद्ध करके उतारना आवश्यक है। क्योंकि जिन माता-पिता ने हमारी आयु, आरोग्यता तथा सुख सौभाग्य की अभिवृद्धि के लिए अनेक प्रयास किये, उनके ऋण से मुक्त न होने पर हमारा जन्म लेना निरर्थक होता है। इसे उतारने में कुछ अधिक खर्च भी नहीं होता। श्राद्ध की तिथियों में लोग अपने पितरों का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि पर करते है और उन्हें जल और पिंड दान देते हैं। वर्षभर में केवल एक बार अर्थात् उनकी मृत्युतिथि को सर्वसुलभ जल, तिल, यव, कुश और पुष्प आदि से उनका श्राद्ध सम्पन्न करने और गौ ग्रास देकर एक, तीन या पांच ब्राह्मणों को भोजन करा देने मात्र से यह ऋण उतर जाता है।

श्राद्ध साधारण शब्दों में श्राद्ध का अर्थ अपने कुल देवताओं, पितरों, अथवा अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करना है. हिंदू पंचाग के अनुसार वर्ष में पंद्रह दिन की एक विशेष अवधि है जिसमें श्राद्ध कर्म किये जाते हैं इन्हीं दिनों को श्राद्ध पक्ष, पितृपक्ष और महालय के नाम से जाना जाता है. मान्यता है कि इन दिनों में तमाम पूर्वज़ जो शशरीर परिजनों के बीच मौजूद नहीं हैं वे सभी पृथ्वी पर सूक्ष्म रूप में आते हैं और उनके नाम से किये जाने वाले तर्पण को स्वीकार करते हैं।

✍🏻✍🏻🌹🌹👉🏻👉🏻


कौन कहलाते हैं पितर ??


पितृ

पितर वे व्यक्ति कहलाते है, जो इस धरती पर जन्म लेने के बाद जीवित नहीं है, उन्हें पितर कहते हैं। ये विवाहित हों या अविवाहित, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष जिनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कहा जाता है ।परिवार के दिवंगत सदस्य चाहे वह विवाहित हों या अविवाहित, बुजूर्ग हों या बच्चे, महिला हों या पुरुष जो भी अपना शरीर छोड़ चुके होते हैं उन्हें पितर कहा जाता है। मान्यता है कि यदि पितरों की आत्मा को शांति मिलती है तो घर में भी सुख शांति बनी रहती है और पितर बिगड़ते कामों को बनाने में आपकी मदद करते हैं लेकिन यदि आप उनकी अनदेखी करते हैं तो फिर पितर भी आपके खिलाफ हो जाते हैं और लाख कोशिशों के बाद भी आपके बनते हुए काम बिगड़ने लग जाते हैं।

✍🏻✍🏻🌹🌹👉🏻👉🏻

कई पुराणों और ग्रंथों में गया में पिंडदान और श्राद्ध का महत्व बताया गया है। ऐसी मान्यता है कि यहां पितरों का कर्म करने से उन्हें मुक्ति मिल जाती है। इसलिए पितृपक्ष में बड़ी संख्या में लोग गया जाते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पिंडदान के लिए केवल गया ही एक मात्र जगह नहीं है बल्कि इसके अलावा भी कुछ ऐसी जगह हैं जहां पिंडदान किया जाता हैं।


भारत में श्राद्ध के लिए हरिद्वार, गंगासागर, जगन्नाथपुरी, कुरुक्षेत्र,उज्जैन, चित्रकूट, पुष्कर, बद्रीनाथ सहित 55 स्थानों को महत्वपूर्ण माना गया है जहां पिंडदान किया जा सकता है। लेकिन शास्त्रों में पिंडदान के लिए इनमें से तीन जगहों को सबसे विशेष माना गया है। जिसमें बद्रीनाथ भी शामिल है। बद्रीनाथ के पास ब्रह्मकपाल सिद्ध क्षेत्र में पितृदोष मुक्ति के लिए तर्पण का विधान है। दूसरा हरिद्वार में नारायणी शिला के पास लोग अपने पूर्वजों का पिंडदान करते हैं। तो तीसरा जिसे सबसे मुख्य माना गया है वो है गया। बिहार की राजधानी पटना से 100 किलोमीटर दूर गया में साल में एक बार 17 दिन के लिए मेला लगता है। जिसे पितृ-पक्ष मेला कहा जाता है।


पितृ पक्ष में फल्गु नदी के तट पर विष्णुपद मंदिर के पास और अक्षयवट के पास पिंडदान करने से पूर्वजों को मुक्ति मिलती है।

✍🏻✍🏻🌹🌹👉🏻👉🏻


क्या होता है पिंडदान?




विद्वानों के मुताबिक, किसी वस्तु का गोलाकर रूप पिंड कहा जाता है। इसी तरह प्रतीकात्मक रूप में शरीर को भी पिंड कहा गया है। पिंडदान के समय मृतक के निमित्त अर्पित किए जाने वाले पदार्थ, जिसमें जौ या चावल के आंटे को गूंथकर बनाया गया जाता है वह गोलाकृति पिंड कहलाता है। दक्षिणाभिमुख होकर, आचमन कर जनेऊ को दाएं कंधे पर रखकर चावल, गाय के दूध, घी, शक्कर और शहद को मिलाकर बनाए गए पिंडों को श्रद्धा भाव के साथ अपने पितरों को अर्पित करना ही पिंडदान कहलाता है। पिंडदान के समय जल में काले तिल, जौ, कुशा और सफेद फूल मिलकार उस जल से विधिपूर्वक तर्पण करने से पितर तृप्त होते हैं। श्राद्ध के बाद ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है।श्राद्ध पक्ष के दिनों में पूजा और तर्पण करें। पितरों के लिए बनाए गए भोजन के चार ग्रास निकालें और उसमें से एक ग्रास गाय, दूसरा हिस्सा कुत्ते, तीसरा टुकड़ा कौए और एक भाग मेहमान के लिए रख दें। गाय, कुत्ते और कौए को भोजन देने के बाद ब्राह्मण को भोजन कराएं। जो श्रद्धा पूर्वक किया जाएं उसे श्राद्ध कहते हैं। पुराणों के अनुसार मनुष्य का अगला जीवन पिछले संस्कारों से बनता है। श्राद्ध कर्म इस भावना से किया जाता है, कि अगला जीवन बेहतर हो। जिन पितरों का हम श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करते हैं, वे हमारी मदद करते हैं।

✍🏻✍🏻🌹🌹👉🏻👉🏻

पितृपक्ष(महालय या श्राद्धपक्ष) के दिनों के बारे में माना जाता है कि पूर्वज अपने परिवारों में आते हैं और इस दौरान परिजनों द्वारा उनकी मुक्ति के लिए जो कर्म किया जाता है उसे श्राद्ध कहा जाता है। जिन परिवारों को अपने पितरों की तिथि याद नहीं रहती है उनका श्राद्ध अमावस्या को कर देने से पितर संतुष्ट हो जाते हैं। इस दिन शाम को दीपक जलाकर पूड़ी पकवान आदि खाद्य पदार्थ दरवाजे पर रखे जाते हैं। जिसका अर्थ है कि जाते समय पितर भूखे न जायें। इसी तरह दीपक जलाने का आशय उनके मार्ग को आलोकित करना है। कुछ लोग कौओं, कुत्तों और गायों के लिए भी भोजन का अंश निकालते हैं। मान्यता है कि कुत्ता और कौवा यम के नजदीकी हैं और गाय वैतरणी पार कराती है। जो लोग जीवन रहते माता पिता की सेवा नहीं कर पाते, यदि वह चाहें तो अपने पूर्वजों को श्राद्ध कर्म पूरी श्रद्धा के साथ करके प्रसन्न कर सकते हैं।

✍🏻✍🏻🌹🌹👉🏻👉🏻


क्या कहता हैं वेद और गुरुड़ पुराण "पितृपक्ष" के बारे में ??

वेदों में कहा गया है कि सावन की पूर्णिमा से ही पितर मृत्यु लोक में आ जाते हैं और कुशा की नोकों पर विराजमान हो जाते हैं। पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं। श्राद्ध पक्ष से जुड़ी एक मान्यता यह भी है कि इस दौरान कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। पितृ पक्ष में हम जो भी पितरों के नाम का निकालते हैं, उसे वह सूक्ष्म रूप में आकर ग्रहण करते हैं। वेदों के अनुसार, मनुष्यों के पास यह एक मौका होता है कि यदि उनसे अपने पूर्वजों के प्रति कोई गलती हुई हो तो वह इस दौरान उसके लिए क्षमा मांग लें। पितर भी इस दौरान अपने बच्चों की सभी गलतियों को माफ कर देते हैं और उन्हें सुख समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

✍🏻✍🏻🌹🌹👉🏻👉🏻




क्या करें ताकि मिलता रहे पितरों का आशीर्वाद ओर कृपा ??


हर वर्षभाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से प्रारम्भ करके आश्विन कृष्ण अमावस्या तक सोलह दिन तक अपने पितरों को तर्पण देने का साथ साथ विशेष तिथि को उनका श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

जिस किसी भी माह की तिथि को अपने परिजन या माता पिता की मृत्यु हुई हो, उस तिथि को श्राद्ध आदि करने के अलावा आश्विन कृष्ण पक्ष में उसी तिथि को श्राद्ध, तर्पण, गौ ग्रास और ब्राह्मणों को भोजन कराना आवश्यक है। इससे पितृगण प्रसन्न होते हैं और हमें सौभाग्य की प्राप्ति होती है। जिस स्त्री के कोई पुत्र न हो, वह स्वयं ही अपने पति का श्राद्ध कर सकती है। इस प्रकार करने से यथोचित रूप में पितृ व्रत पूर्ण होता है।

अगला लेख: क्या पंचकों में अस्थि संचयन हो सकती है ???



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
13 सितम्बर 2019
अंत‌िम संस्कार का शास्‍त्रों में बहुत वर्णन द‌िया गया है क्योंक‌ि इसी से व्यक्त‌ि को परलोक में उत्तम स्थान और अगले जन्म में उत्तम कुल पर‌िवार में जन्म और सुख प्राप्त होता है। गरुड़ पुराण में बताया गया है क‌ि ज‌िस व्यक्त‌ि का अंत‌िम संस्कार नहीं होता है उनकी आत्मा मृत्‍यु के बाद प्रेत बनकर भटकती है औ
13 सितम्बर 2019
31 अगस्त 2019
आज के दौर में तकनीक ने हर क्षेत्र में अपनी जगह बना ली है और ट्रेन तो बस सुपरफास्ट होती ही जा रही है। ट्रेन में सफर करना बहुत आसान हो जाता है और हमें एक रिजर्व सीट मिल जाती है जिसपर हम सोकर बैठकर अपनी उस जगह पर पहुंच जाते हैं जहां पर भी हम जाना चाहते हैं। AC कोच में बैठकर हम ठंडी हवा लेकर हम अपनी मनप
31 अगस्त 2019
14 सितम्बर 2019
पितृ सदा रहते हैं आपके आस-पास। मृत्यु के पश्चात हमारा और मृत आत्मा का संबंध-विच्छेद केवल दैहिक स्तर पर होता है, आत्मिक स्तर पर नहीं। जिनकी अकाल मृत्यु होती है उनकी आत्मा अपनी निर्धारित आयु तक भटकती रहती है। हमारे पूर्वजों को, पितरों को जब मृत्यु उपरांत भी शांति नहीं मिलती और वे इसी लोक में भटकते रह
14 सितम्बर 2019
14 सितम्बर 2019
भाद्रपद (भादों मास) की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर आश्विन मास की अमावस्या तक कुल सोलह तिथियां श्राद्ध पक्ष की होती है। इस पक्ष में सूर्य कन्या राशि में होता है। इसीलिए इस पक्ष को कन्यागत अथवा कनागत भी कहा जाात है। श्राद्ध का ज्योतिषीय महत्त्व की अपेक्षा धार्मिक महत्व अधिक है क्योंकि यह हमारी धार्मिक आस
14 सितम्बर 2019
13 सितम्बर 2019
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की शतभिषा नक्षत्र में शुरू हो रहे पितृ आराधना के पर्व में श्राद्ध करने से सौ प्रकार के तापों से मुक्ति मिलेगी।इस वर्ष भाद्रपद माह की पूर्णिमा पर 13 सितंबर 2019 ( शुक्रवार) को शततारका (शतभिषा) नक्षत्र,धृति योग,वणिज करण एवं कुंभ राशि के चंद्रमा की साक्
13 सितम्बर 2019
02 सितम्बर 2019
90 के दशक की बहुत सारी एक्ट्रेसेस रही हैं जिनका सिक्का उस समय तो खूब चलता था लेकिन धीरे-धीरे उनका चार्म खत्म होने लगा। उस दौर की अभिनेत्रियों पर अंडरवर्ल्ड का साया भी रहता था। मगर फिर भी वे इस डर के साये में अच्छे से जिंदगी को जीना नहीं भूलती थीं, उन्हीं में से एक थीं एक्ट्रेस सोनम जो 90 के दशक में
02 सितम्बर 2019
02 सितम्बर 2019
भारतीय टीम इंडिया के सिर पर जितना प्रेशर होता है वो लोग उतना ही लाइफ को मजे के साथ लेते हैं। ऐसा आज से नहीं बल्कि दशकों से होता आया है। अगर टीम इंडिया के सिर पर मैच का ज्यादा स्ट्रेस रहता है तब भी वे अपने हर पल को अच्छे से व्यतीत करते हैं। कुछ ऐसा ही किस्सा हम आपको बताने जा रहे हैं जब टीम इंडिया ने
02 सितम्बर 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x