"रविवार का सृजन (टूटता परिवार)"

15 सितम्बर 2019   |  डॉ कवि कुमार निर्मल   (6898 बार पढ़ा जा चुका है)

*गुम हो गए संयुक्त परिवार*

*एक वो दौर था* जब पति,

*अपनी भाभी को आवाज़ लगाकर*

घर आने की खबर अपनी पत्नी को देता था ।

पत्नी की छनकती पायल और खनकते कंगन बड़े उतावलेपन के साथ पति का स्वागत करते थे ।


बाऊजी की बातों का.. *”हाँ बाऊजी"*

*"जी बाऊजी"*' के अलावा दूसरा जवाब नही होता था ।


*आज बेटा बाप से बड़ा हो गया, रिश्तों का केवल नाम रह गया ।*


ये *"समय-समय"* की नही,

*"समझ-समझ"* की बात है


बीवी से तो दूर, बड़ो के सामने, अपने बच्चों तक से बात नही करते थे

*आज बड़े बैठे रहते हैं हम *सिर्फ बीवी* से बात करते हैं


दादाजी के कंधे तो मानो, पोतों-पोतियों के लिए

आरक्षित होते थे, *काका* ही

*भतीजों के दोस्त हुआ करते थे ।*


आज वही दादू - दादी

*वृद्धाश्रम* की पहचान है,

*चाचा - चाची* बस

*रिश्तेदारों की सूची का नाम है ।*


बड़े पापा सभी का ख्याल रखते थे, अपने बेटे के लिए

जो खिलौना खरीदा वैसा ही खिलौना परिवार के सभी बच्चों के लिए लाते थे ।

*'ताऊजी'*

आज *सिर्फ पहचान* रह गए

और,......

*छोटे के बच्चे*

पता नही *कब जवान* हो गये..??


दादी जब बिलोना करती थी,

बेटों को भले ही छाछ दे

पर *मक्खन* तो

*केवल पोतों में ही बाँटती थी।*


*दादी ने*

*पोतों की आस छोड़ दी*,

क्योंकि,...

*पोतों ने अपनी राह*

*अलग मोड़ दी ।*


राखी पर *बुआ* आती थी,

घर मे नही

*मोहल्ले* में,

*फूफाजी* को

*चाय-नाश्ते पर बुलाते थे।*


अब बुआजी,

बस *दादा-दादी* के

बीमार होने पर आते है,

किसी और को

उनसे मतलब नही

चुपचाप नयननीर बरसाकर

वो भी चले जाते है ।


शायद *मेरे शब्दों* का

कोई *महत्व ना* हो,

पर *कोशिश* करना,

इस *भीड़* में

*खुद को पहचानने की*,

*कि*,.......


*हम "ज़िंदा है"*

या

*बस "जी रहे" हैं"*

अंग्रेजी ने अपना स्वांग रचा दिया,

*"शिक्षा के चक्कर में*

*संस्कारों को ही भुला दिया"।*


बालक की *प्रथम पाठशाला परिवार*

पहला *शिक्षक उसकी माँ* होती थी,

आज

*परिवार ही नही रहे*

*पहली शिक्षक का क्या काम...??*


"ये *समय-समय* की नही,

*समझ-समझ* की बात है"।


अब *परोस कर दे बहु* तो *अहोभाग्य,* वरना उठो, परोस कर खालो और हाँ👉 *मेहरी* मायके गई है, *माँज* कर रख दो भाई। क्या लगता है? *दस-बीस साल* रह गये तो अपना नसीब वरना चला-चली है👍

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