क्या खोया क्या पाया जग में

18 सितम्बर 2019   |  Shashi Gupta   (6023 बार पढ़ा जा चुका है)

क्या खोया क्या पाया जग में



क्या पाया क्या खोया जग में

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गुरु कृपा से उपजे ज्योति

गुरू ज्ञान बिन पाये न मुक्ति


माया का जग और ये घरौंदा

फिर-फिर वापस न आना रे वंदे


पत्थर-सा मन जल नहीं उपजे

हिय की प्यास बुझे फिर कैसे..


भावुक व्यक्ति की सबसे बड़ी कमजोरी यह होती है कि वह अपने प्रति किसी के द्वारा दो बोल सहानुभूति के क्या सुन लेता है , बिना जाँचें परखे झटपट उसे अपना सच्चा हितैषी समझ लेता है। वह यह नहीं समझ पाता कि जिस अजनबी से वह अचानक यूँ स्नेह करने लगा है ,वह उसके प्रति कितना संवेदनशील है। अकसर ऐसा होता है कि लोकव्यवहार के कारण भी तनिक प्रीति का प्रदर्शन लोग कर ही दिया करते हैं , परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि उनके लिये वह महत्वपूर्ण है। समय , परिस्थिति और मनोभाव के अनुरूप उनकी सहानुभूति में जब परिवर्तन आता है , तब ऐसे भावुक मनुष्य को उनके बदले हुये व्यवहार से वेदना होती है । जब कभी यह उपेक्षा तिरस्कार में बदल जाती है , तब हृदय को जो चोट पहुँचती है, उसकी भरपाई शीघ्र संभव नहीं है। अतः ऐसे इंसान जो भावनाओं में गोता लगाते रहते हैं , उन्हें किसी अपरिचित व्यक्ति से मित्रता करते समय सजग रहना चाहिए...।


संबंधों के रहस्य एक-एक कर उसके समक्ष खुलते चले गये , जब बीते गुरुपर्व पर विकल हृदय से जब वह काशी स्थित अपने उस पावन शरणस्थली का स्मरण कर रहा था।

तभी मानों ऐसा आभास हुआ उसे कि साक्षात गुरुदेव प्रगट हो गये हो। वैसा ही श्वेत वस्त्र , केश रहित विशाल ललाट, मुखमंडल पर अद्भुत तेज और मंद-मंद मुस्कान ।

यद्यपि गुरु - शिष्य में कोई प्रत्यक्ष संवाद नहीं हुआ, तथापि उनका मौन उससे अनेक प्रश्न कर रहा था ।

वे अपने शिष्य से यह जानना चाहते थें कि लगभग तीन दशक पूर्व आश्रम छोड़ने के पश्चात जिस अपनत्व की प्राप्ति के लिये वह दर- दर भटका , क्या उसकी प्राप्ति में सफल रहा ?

रोगग्रस्त उसकी दुर्बल काया , मुखमंडल पर छायी कालिमा एवं मंद पड़ गयी नेत्रों की ज्योति को देख द्रवित हो गये गुरुदेव , परंतु उनकी मौन वाणी में इस बार कठोरता थी। जिस गुरु ने उसे आश्रम जीवन में कभी फटकार तक नहींं लगायी थी। सदैव जिसे अपने सानिध्य में बैठा " सतनाम " जाप को कहा था ।

उनका सीधा सवाल था -- " जिस अपनत्व की प्राप्ति के लिये दर-दर भटका तू , ठोकर खाई और अब क्यों बिन मुक्तिपथ को प्राप्त किये ही राम नाम सत्य का उद्बोधन कर रहा है ? सामने पड़े 'अमृत कलश ' का परित्याग कर जिस ' मदिरापान ' के लिये निकला था , देख उसने तेरा क्या हाल किया है। आश्रम में मिले खड़ाऊँ एवं साधारण वस्त्रों को त्यागने के पश्चात तूने जो भी मूल्यवान वस्त्र-आभूषण धारण किये थे , वे क्या तुझे वहीं दिव्य तेज प्रदान कर सके ? "


गुरु महाराज प्रश्न पर प्रश्न ही किये जा रहे थें - " तनिक लौकिक स्नेह की चाह में भूल, अपराध, पाप, उपहास , तिरस्कार एवं ग्लानि जैसे अलंकार युक्त किन-किन आभूषणों को तू धारण किये है कि जिनका वजन तेरा यह विकल हृदय संभाल नहीं पा रहा है ? "

वे शिष्य के मुख से उसकी उस लम्बी जीवनयात्रा का वृत्तांत सुनना चाहते थें कि लौकिक स्नेह रुपी उस मृगतृष्णा जिसे वे उसके साधनाकाल में निरंतर ' मायाजाल ' बताते रहे , उसने उसकी पवित्रता को कहाँ- कहाँ कलंकित एवं लांछित किया ।

यद्यपि शिष्य अपने गुरु से दृष्टि नहीं मिला सका और न ही उनके चरणों पर वह अपना मलिन मस्तक रख पाया , तथापि उसके नेत्रों से निकले नीर को गुरु के पद कमल का पावन स्पर्श प्राप्त हुआ और तब रुंधे कंठ से उसने अपने सद्गुरु को वचन दिया-


अब लौं नसानी, अब न नसैहों।

रामकृपा भव-निसा सिरानी जागे फिर न डसैहौं॥

पायो नाम चारु चिंतामनि उर करतें न खसैहौं।

स्याम रूप सुचि रुचिर कसौटी चित कंचनहिं कसैहौं॥

परबस जानि हँस्यो इन इंद्रिन निज बस ह्वै न हँसैहौं।

मन मधुपहिं प्रन करि, तुलसी रघुपति पदकमल बसैहौं॥

अदृश्य होने से पूर्व गुरु यह कह उसे पुनः आगाह करते गये है - " देखो , अब तुम वचनबद्ध हो। संकल्प भंग मत करना। यही मेरी गुरुदक्षिणा है। जिसे दिये बिना ही तुमने आश्रम त्यागा था । "

- व्याकुल पथिक

( जीवन की पाठशाला)



अगला लेख: पथिक ! जो बोया वो पाएगा



कामिनी सिन्हा
23 सितम्बर 2019

अंतर्मन के दुवंद का मार्मिक चित्रण ," मन ही देवता मन ही ईश्वर मन से बड़ा ना कोय " और मन का ज्ञान ही सबसे बड़ा ज्ञान हैं ,बहुत ही मन से लिखी रचना ,सादर नमन शशि जी

Shashi Gupta
23 सितम्बर 2019

जी सही कहा आभार

रेणु
19 सितम्बर 2019

सर्वश्रेष्ठ लेख चुने जाने की हार्दिक बधाई

रेणु
19 सितम्बर 2019

प्रिय शशि भाई --- बहुत ही अलग तरह का अद्यतनीक बोध जगाती रचना जिसमें एक समर्पित शिष्य का स्वयं के प्रति सच्चा पारदर्शी चिन्तन बहुत भावपूर्ण है | एक आत्मज्ञानी गुरु जो स्वयं से साक्षात्कार करवादे मिलना संसार में दुर्लभ है और यदि मिल जाये तो किसी का परम सौभाग्य है | व्यर्थ के दावों से इतर गुरुदेव के दिखाए मार्ग और उनकी शिक्षा का अनुशरण करना ही सच्ची भक्ति है |

Shashi Gupta
19 सितम्बर 2019

जी दी बहुत बहुत आभार

कुसुम कोठारी
18 सितम्बर 2019

बहुत सारगर्भित! वेदना के अथाह गहराई से निकले उद्गार, गुरु से सच्चा स्नेह पर स्वयं के प्रति अपराध बोध ।पर कहीं गहरे आस्था के भाव सकारात्मकता का संदेश देती हृदय स्पर्शी प्रस्तुति।

Shashi Gupta
18 सितम्बर 2019

जी आभार दी

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