पितरों को श्राद्ध की प्राप्ति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

20 सितम्बर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (427 बार पढ़ा जा चुका है)

पितरों को श्राद्ध की प्राप्ति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में पितरों के लिए श्राद्ध की अनेक विधियां बताई गई हैं , इन सभी विधियों में सबसे सरल दो विधि बताई गई है :- पिंडदान एवं ब्राह्मण भोजन | मृत्यु के बाद जो लोग देवलोक या पितृलोक में पहुंचते हैं वह मंत्रों के द्वारा बुलाये जाने पर उन लोकों से तत्क्षण श्राद्घदेश में आ जाते हैं और निमंत्रित ब्राह्मणों के माध्यम से भोजन कर लेते हैं | सूक्ष्मग्राही होने से भोजन के सूक्ष्म कणों के आधार से उनका भोजन हो जाता है और वे तृप्त हो जाते हैं | अथर्ववेद में कहा गया है कि ;-- "इममोदनं नि दधे ब्राह्मणेषु विष्टारिणं लोकजितं स्वर्गम् " अर्थात :- ब्राह्मणों के भोजन करने से वह भोजन पितरों को प्राप्त हो जाता है ! मन में यह कामना की जाती है कि इस ओदनोपलक्षित भोजन को ब्राह्मणों में स्थापित कर रहा हूं | यह भोजन विस्तार से युक्त है और स्वर्ग लोग को जीतने वाला है | पितरों के लिए हमारे सनातन धर्म में बताया गया है कि यह अपने कर्मवश अंतरिक्ष में वायवीय शरीर धारण कर रहते हैं | अंतरिक्ष में रहने वाले इन पितरों को "श्राद्ध काल आ गया है" यह सुनकर ही तृप्ति हो जाती है | ये मनोजव होते हैं अर्थात इनकी गति मन की गति की तरह होती है , यह स्मरण मात्र से ही श्राद्धदेश में आ जाते हैं और ब्राह्मणों के साथ भोजन करके तृप्त हो जाते हैं | इनको सब लोग इसलिए नहीं देख पाते हैं क्योंकि इनका शरीर वायु रूप में होता है | श्राद्ध के निमंत्रित ब्राह्मणों में पितर गुप्त रूप से निवास करते हैं | प्राणवायु की भाँति उनके चलते समय चलते हैं और बैठते समय उसी प्रकार की क्रिया करते हैं | श्राद्घकाल में ब्राह्मणों के साथ ही प्राण रूप में या वायु रूप में पितर आते हैं और उनके साथ ही बैठकर भोजन करते हैं | मृत्यु के पश्चात पितर सूक्ष्म शरीरधारी होते हैं इसलिए उनको कोई देख नहीं पाता है | सूक्ष्म शरीर होने से ये जल , अग्नि एवं वायुप्रधान होते हैं , इसीलिए लोक - लोकान्तर में कहीं भी जा सकते हैं |*


*आज के युग में मनुष्य के मस्तिष्क में स्वाभाविक जिज्ञासा उत्पन्न हो जाती है कि श्राद्ध में दी गई अन्न आदि सामग्रियां पितरों को कैसे प्राप्त होती हैं ?? क्योंकि विभिन्न कर्मों के अनुसार मृत्यु के बाद जीव को भिन्न-भिन्न गति प्राप्त होती है | कोई देवता बन जाता है , कोई पितर , कोई प्रेत , कोई हाथी , कोई चींटी , कोई चिनार का वृक्ष और कोई तृण | श्राद्ध में दिए गए छोटे से पिण्ड से हाथी का पेट कैसे भर सकता है ? इसी प्रकार यदि हमारे पितर चींटी बन गए हैं तो इतने बड़े पिंड को कैसे खा सकते हैं ? देवता अमृत से तृप्त होते हैं उन्हें पिण्ड से तृप्ति कैसे मिल सकती है ?? इन प्रश्नों का बड़ा ही स्पष्ट उत्तर हमारे शास्त्रों ने दिया है | जिसके अनुसार मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" बताना चाहूंगा कि नाम एवं गोत्र के सहारे विश्वेदेव एवं अग्निष्वात्त आदि दिव्य पितर हव्य - कव्य को पितरों को प्राप्त करा देते हैं | यदि पिता देवयोनि को प्राप्त हो गया हो तो दिया गया अन्न उन्हें वहाँ अमृत रूप में प्राप्त हो जाता है | मनुष्यों में अन्न रूप में , तथा पशुयोनि में तृण रे रूप में उन्हें उसकी प्राप्ति हो जाती है | नागादि योनियों में वायुरूप में यक्षयोनि में पान रूप में तथा अन्य योनियों में उसे श्राद्धवस्तु भोग जनक तृप्तिकर पदार्थों के रूप में प्राप्त होकर अवश्य तृप्त करती है | जिस प्रकार गौशाला में भूली माता को बछड़ा किसी न किसी प्रकार ढूंढ ही लेता है उसी प्रकार मंत्र के प्रभाव से वस्तुजात को प्राणी के पास किसी न किसी प्रकार पहुंचा ही देता है | नाम , गोत्र , हृदय की श्रद्धा एवं उचित संकल्प पूर्वक दिए गए पदार्थों को भक्ति पूर्वक मंत्र उनके पास पहुंचा देता है | वह चाहे सैकड़ों योनियों में क्यों ना पहुंच गया हो पर उसकी तृप्ति उसके पास पहुंच जाती है | इसलिए पितरों का श्राद्ध करते समय मन में कोई शंका नहीं होनी चाहिए |*


*मनुष्य यदि संदेह करके कोई कार्य करता है तो वह कार्य फलित नहीं हो सकता , क्योंकि श्राद्ध श्रद्धा का विषय है | इसलिए शास्त्र के अनुसार कृत्य करने के साथ ही मन में श्रद्धा का होना परम आवश्यक है |*

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