'भारत रत्न' लाल बहादुर शास्त्री की मौत का रहस्य आज भी है क्यों कायम? जानिए इनका जीवन-परिचय

20 सितम्बर 2019   |  स्नेहा दुबे   (455 बार पढ़ा जा चुका है)

'भारत रत्न' लाल बहादुर शास्त्री की मौत का रहस्य आज भी है क्यों कायम? जानिए इनका जीवन-परिचय

भारत देश यूही महान नहीं माना जाता, यहां पर कई वीर ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी की हर सांस देश के नाम कर दी थी। आजादी से पहले, आजादी के बाद या फिर आजादी के समय बहुत से ऐसे स्वंतत्रता सेनानी रहे हैं जिन्होंने देश के लिए अपना सबकुछ कुर्बान कर दिया और आज उनका इतिहास में नाम है। उन्हीं स्वतंत्रता सेनानियों में एक थे लाल बहादुर शास्त्री जिनकी लोकप्रियता आज भी कायम है। Lal Bahadur Shastri आजाद भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख नेता भी थे। यहां हम आपको शास्त्री जी के बचपन, पारिवारिक जीवन, राजनीतिक करियर, कार्यों, उपलब्धियां और जीवन के बारे में सबकुछ बताने जा रहे हैं। Lal Bahadur Shastri Biography के बारे में आपको जरूर जानना चाहिए।


लाल बहादुर शास्त्री का प्रारंभिक जीवन - Early Life of Lal Bahadur Shastri


Lal Bahadur Shastri

2 अक्टूबर, 1904 को उत्तरप्रदेश के मुगलसराय में जन्में लाल बहादुर शास्त्री ब्रिटिश इंडिया के कई चीजों को शुरु से ही देखते आ रहे हैं। इनके पिता मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव प्राथमिक शाला के अध्यापक ते और इनकी मां राम दुलारी थी जो एक गृहिणी थीं। शास्त्री जी के बचपन में ही उनके पिता का निधन हो गया था तो उनकी मां शास्त्री के साथ उनके नाना के घर हजारी लाल के घर मिर्जापुर आ गईं। Lal Bahadur Shastri को बचपन में सभी 'नन्हे' कहकर बुलाते थे। शास्त्री जी की प्रारंभिक शिक्षा मिर्जापुर में हुई और आगे की पढ़ाई काशी-विद्यापीठ में हुई। इन्होंने संस्कृत भाषा से स्नातक किया और यहां पर इन्हें 'शास्त्री' नाम की उपाधि मिली थी। इसके बाद उन्होंने साल 1928 में ललिता देवी से विवाह हुआ और इनकी 6 संताने हुईं। इनका एक बेटा अनिल शास्त्री कांग्रेस पार्टी के सदस्य रहे हैं।


ऐसा बताया जाता है कि लाल बहादुर शास्त्री बचपन में बहुत शरारती थे और गांव में एक बगीचे से अक्सर कुछ ना कुछ चुराया करते थे। एक दिन जब माली ने उन्हें पकड़ लिया और शास्त्री जी को समझाते हुए बोला कि दूसरे बच्चों की तरह शरारत नहीं करना चाहिए। वे बिना पिता के बच्चे हैं तो अपने पिता का नाम खराब नहीं करे। उस दिन शास्त्री जी के मन को उस माली की बात लग गई और उन्होंने ठान लिया कि जीवन में बहुत आगे जाएंगे बिना लापरवाही किये। बाद में वे जो भी बने ये पूरा देश जानता है, शास्त्री जी ने ना सिर्फ देश में बल्कि विदेश में भी अपने नाम का लोहा मनवाया था।


लाल बहादुर शास्त्री संघर्ष- Lal Bahadur Shastri Freedom Struggle


Lal Bahadur Shastri

भारत की स्वतंत्रता की लड़ाई शास्त्री जी ने भी लड़ी और उन्होंने क्रांतिकारियों से कह दिया था 'करो या मरो', फिर नौजवानों ने इस नीति को अपनाकर देश में क्रांति ला दी थी। साल 1920 में शास्त्री जी आजादी की लड़ाई में कूद गए थे और भारत सेवक संघ की सेवा करने लगे। ये एक गांधी-वादी नेदा था, जिन्होने पूरे जीवन देश और गरीबों की सेवा मात्र की। शास्त्री जी सभी आंदोलनों एवम् कार्यक्रमों में लिया लिया और इसकी वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा। इन्होने साल 1921 में असहयोग आंदोलन , साल 1930 में दांडी यात्रा और साल 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। शास्त्री जी गांधी सी से काफी प्रभावित रहते थे और उनके आदर्शों पर चलकर उनके सभी आंदोलनों में हिस्सा लिया करते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भारत में आजादी की लड़ाई भी तीव्र हो गई थी और नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 'आजाद हिंद फौज' का गठन करके उसे 'दिल्ली चलो' बना दिया। इसी समय 8 अगस्त, 1942 को गांधी जी ने भारत-छोड़ो आंदोलन तीव्रता से बढ़ाई और शास्त्री ने इलाहाबाद में इस नारे में परिवर्तन करके इसे मरो नहीं मारो कर दिया था, और पूरे देश वासियों से इसे अपने जीवन में उतारने के लिए आग्रह किया। इस आंदोलन के समय शास्त्री जी ग्यारह दिन अंडरग्राउंड हो गए थे और फिर 19 अगस्त, 1942 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। मगर कुछ समय बाद कुछ बड़े नेताओं के साथ इन्हें भी रिहा कर दिया गया था।


आजादी के बाद लाल बहादुर शास्त्री- Lal Bahadur Shastri Political Career


Lal Bahadur Shastri

15 अगस्त, 1947 को देश आजाद हुआ और उस जश्न में इन्हें भी शामिल किया गया था। स्वतंत्र भारत में ये उत्तर प्रदेश की संसद के सचिव नियुक्त किए गए थे। गोविंद वल्लभ पंत के मंत्रीमंडल में शास्त्री जी को रेल एवं परिवहन मंत्री नियुक्त किया गया था। इस दौरान शास्त्री जी ने पहली महिला कंडक्टर नियुक्त की थी और पुलिस विभाग में उन्होने लाठी के बजाए पानी की बौछार से भीड़ को नियंत्रित करने का नियम बनाया था। साल 1951 में शास्त्री जी को अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का महा सचिव चुना गया। लाल बहादुक शास्त्री अपनी पार्टी के प्रति समर्पित रहते थे, उन्होंने 1952, 1957,1962 के चुनाव में पार्टी के लिए बहुत सारा प्रसार-प्रचार भी किया और हर बार कांग्रेस भारी बहुमत से विजय बनाया था। इसी से जुड़ी एक घटना है कि शास्त्री जी ने अपनी मां या पत्नी को नहीं बताया था कि वे रेल मंत्री हैं। इसके पीछे की वजह ये थी कि वो नहीं चाहते थे कि कोई भी जान-पहचान वाला उनसे नौकरी लगवाने को कहे। उनकी मां को पता था कि शास्त्री जी रेलवे में कर्मचारी हैं लेकिन जब उनकी मां को किसी ने बताया तो वे हैरान रह गई थीं। हालांकि भारतीय रेलवे और परिवहन का विकास उनके अधीन ही हुआ लेकिन साल 1952 में तमिलनाडु में एक भयंकर रेल दुर्घटना हो गई थी। इसकी जिम्मेदारी शास्त्री जी ने ली और अपने पद से इस्तिफा दे दिया। आपको बता दें कि इस दुर्घटना में 112 लोगों की मृत्यु हुई थी। साल 1957 में कैबिनेट में शास्त्री जी को वाणिज्य और उद्योग मंत्री चुना गया और 4 साल के अंदर उऩ्हें गृह मंत्री के पद के लिए भी चुना गया था। साल 1964 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु हो गई थी तो उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष कामराज ने शास्त्री जी का नाम इस पद के लिए आगे भेजा और उन्हें इसी वर्ष पीएम चुन लिया गया।


शास्त्री जी ने अपने बचपन में गरीबी झेली है तो उन्हें इसका दुख अच्छे से पता था। उन्होने अपने कार्यकाल के दौरान खूब काम किए। गरीबों के लिए अलग-अलग कानून बनाए और देश को अलग ही प्रगति पर ले गए। प्रधानमंत्री के रूप में शास्त्री जी ने साल 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान देश का नेतृत्व किया था। इस दौरान ही उन्होंने 'जय जवान जय किसान' का नारा देश के सम्मुख रखा और ये नारा राष्ट्रीय नारा बन गया था। साल 1965 में पाकिस्तान के साथ युद्ध विराम होने के बाद उन्होंने पाकिस्तान मुहम्मद अयूब खान के साथ ताशकंद के एक शिखर सम्मेलन में भी भाग लिया था। इसके बाद अगले साल दोनों नेताओं ने ताशकंद घोषणा में हस्ताक्षर किया था।


शास्त्री की प्रमुख कार्य और पुरस्कार- Lal Bahadur Shastri Achievements


Lal Bahadur Shastri

लाल बहादुर शास्त्री ने अलग-अलग मंत्रालयों में अपने कार्यकाल के दौरान कई बुनियादी समस्याओं का सामना करना पड़ा था। उन्होंने भोजन की कमी, बेरोजगारी और गरीबी जैसी समस्याओं पर चिंता जाहिर किया था और इसपर काम करने का खूब प्रयास किया। तीव्र भोजन की कमी को दूर करने के लिए शास्त्री जी ने दीर्घकालिक राणनीति तैयार की जिसमें 'हरित क्रांति' की लहर आई। उन्होंने हरित क्रांति के अलावा श्वेत क्रांति को बढ़ावा देने में भी काफी मदद की थी। शास्त्री जी पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्हें मरने के बाद यानी मरणोपरांत भारत का सबसे ऊंचा नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से नवाजा गया था। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड का गठन साल 1965 में शास्त्री के शासनकाल में प्रधानमंत्री के रूप में हुआ था। इसके अलावा वाराणसी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम भी उनके ही नाम पर रखा गया था। इस एयरपोर्ट का नाम Lal Bahadur Shastri International Airport है। आपको बता दें जब ताशकंद समझौते के लिए शास्त्री जी जा रहे थे तब उनसे एक सवाल किया गया कि आप कद में छोटे हैं और पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान छोटे हैं तब आप उनसे बात कैसे करेंगे? तब ऐसे में शास्त्री जी ने जवाब दिया कि भारत सिर उठाकर बात करेगा और पाकिस्तान को मेरे सामने सिर झुकाकर बात करना पड़ेगा। कुछ ऐसी पर्सनैलिटी के मालिक थे लाल बहादुर शास्त्री जिन्होंने अपने छोटे कद को कभी छोटा नहीं समझा।


लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु - Death of Lal Bahadur Shastri


Lal Bahadur Shastri

रूस और अमेरिका के दबाव में आकर शास्त्री जी शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए पाकिस्तानी राष्ट्रपति अयूब खान से रूस की राजधानी ताशकंद में मिले थे। ऐसा कहा जाता है कि उनके ऊपर दबाव बनाकर हस्ताक्षर करवाया गया था और उस समय शास्त्री जी को दिल का दौरा पड़ा था, मगर इनका पोस्टमार्टम नहीं किया गया था। ऐसा इसलिए क्योंकि इन्हें जहर देकर मारा गया था जो एक सोची समझी साजिश थी जो आज भी ताशकंद की आबो-हवा में दबा हुआ एक राज मात्र है। इनकी मृत्यु के बाद फिर से गुलजारी लाल नंदा को कार्यकालीन प्रधानमंत्री चुना गया था। इनकी अन्त्येष्टी यमुना नदी के किनारे की गई और उनको स्थान दिल्ली के विजय घाट में दिया गया।


साल 1978 में 'ललिता के आंसू' नाम की एक किताब आई जिसमें इनकी पत्नी ने शास्त्री जी की मृत्यु की कथा लिखी है। कुलदीप नैयर जो कि शास्त्री जी के साथ ताशकंद गए थे, उन्होंने भी कई तथ्य बताए लेकिन कोई उचित परिणाम आज भी नहीं मिल पाए। साल 2012 में इनके बेटे सुनील शास्त्री ने भी न्याय मांगा लेकिन कुछ हो नहीं सका। इस तरह से शास्त्री जी की मौत एक रहस्य बनकर रह गई।

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