वैष्णव एवं स्मार्त्त :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

25 सितम्बर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (496 बार पढ़ा जा चुका है)

वैष्णव एवं स्मार्त्त :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म एक विशाल वृक्ष है जिसकी कई शाखायें हैं | विश्व के जितने भी धर्म या सनातन के जितने भी सम्प्रदाय हैं सबका मूल सनातन ही है | सृष्टि के प्रारम्भ में जब वेदों का प्राकट्य हुआ तो "एको ब्रह्म द्वितीयो नास्ति" की भावना के अन्तर्गत एक ही ईश्वर एवं एक ही धर्म था जिसे वैदिक धर्म कहा जाता था | धीरे - धीरे वैदिक विधानों का विस्तार हुआ एवं एक ईश्वर से अनेकों ईश्वर विशेषकर पंचदेवों (गणेश , विष्णु , शिव , दु्र्गा एवं सूर्य) का पूजन सनातन के अनुयायियों के लिए अनिवार्य हो गया | तब सनातन में भी अन्कों सम्प्रदाय (शैव , वैष्णव , शाक्त , गाणपत्य एवं सौर्य ) हो गये | एक समय ऐसा भी आया जब आदि शंकराचार्य जी ने भारत के सनातनियों को आपस में लड़ते देखा तो उनको एक करना प्रारम्भ किया और वैष्णवों में भी एक नया सम्प्रदाय बनाया जिसे "स्मार्त्त" का नाम दिया | आदि शंकराचार्य जी ने वैष्णव एवं स्मार्त्त की व्याख्या करते हुए समझाने का प्रयास भी किया कि जो लोग वेदों को मानते हुए तथा किसी वैष्णव सम्प्रदाय के गुरु से विधिवत दीक्षा लेकर कंठी माला ग्रहण करते हैं या तप्त मुद्रा से शंख - चक्र का निशान गुदवाते हैं तथा सात्त्विक भोजन लेते हैं वे ही वैष्णव कहे जाने के योग्य हैं | शंकर ने स्पष्ट किया है कि गृहस्थ धर्म का पालन करने वाले वैष्णव नहीं बल्कि स्मार्त्त ही माने जायेंगे | श्रुति एवं स्मृति यही दो माध्यम हैं अपने धर्म का पालन करने का | श्रुति अर्थात सुना हुआ ( वेद ) स्मृति अर्थात याद किया हुआ जिसके अन्तर्गत सूत्र, आगम, तंत्र और स्मृतियां हैं जो वेदों के तत्व ज्ञान और नियमों की परंपरा से व्याख्या करते हैं | ये सभी स्मृति ग्रंथ कहे गये हैं | स्मृतियों को धर्मशास्त्र भी कहा जाता है | इन स्मृतियों को मानने वाले एवं पंचदेवों का पूजन करने वाले ही "स्मार्त" कहे गये हैं | अपने ईष्ट (विष्णु ) को छोड़कर अन्य किसी भी देवी - देवता को न मानने वाले ही परम वैष्णव कहे जा सकते हैं | गृहस्थ - धर्म का पालन करने वाले वैष्णव कहे तो जाते हैं परंतु वे स्मार्त्त की ही श्रेणी में आते हैं | ये अनेकों सम्प्रदाय होने के बाद भी सबका मूल भगवान विष्णु ही हैं | कहा गया है कि :-- "आकाशात्पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम् ! सर्वदेव नमस्कार: केशवं प्रति गच्छति !! अर्थात :- जिस प्रकार आकाश से गिरा हुआ जल अनेक माध्यमों से सागर में ही पहुँचता है उसी प्रकार किसी भी देवी - देवता का पूजन और किया हुआ प्रणाम भगवान विष्णु को ही प्राप्त होता है | यह समझने की आवश्यकता है |*


*आज प्राय: विद्वानों में वैष्णव एवं स्मार्त्त के विषय पर चर्चा होती रहती है कभी कभी तो यह चर्चा विवादित बहस भी बनते देखी जा रही है | स्वयं को वैष्णव बताते हुए विद्वतमण्डली उसके अनेकों उदाहरण भी प्रस्तुत करती है जबकि सत्यता यह है कि वे स्वयं वैष्णव का अर्थ नहीं जानते हैं | एक सत्यनिष्ठ वैष्णव अपने ईष्ट के अतिरिक्त किसी भी अन्य को नहीं मानता चाहे वह उनके ईष्ट का ही अन्य स्वरूप क्यों न हो | तुलसीदास जी वृन्दावन में भगवान कन्हैया को तब तक मस्तक नहीं झुकाते हैं जब तक उनके हाथ में मुरली की जगह धनुष बाण नहीं आ गया | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" मात्र इतना ही कहना चाहूँगा कि वैष्णव तो सभी हैं परंतु अपनी - अपनी श्रेणी अलग है | जिस प्रकार किसी रेलगाड़ी में यात्री एक ही स्थान पर जाने वाले होते हैं परंतु सबके डिब्बों की श्रेणियां भिन्न होती हैं उसी प्रकार सनातन धर्म एक रेलगाड़ी है | आज स्वयं को वैष्णव कहने वाले कितने लोग हैं जो भगवान विष्णु के अतिरिक्त किसी अन्य देवी - देवता को नहीं मानते हैं ?? तामसिक भोजन (लहसुन - प्याज) न करने वाला ही वैष्णव हो सकता है ! आज गृहस्थी में रहकर इनका त्याग करने वाले कितने लोग हैं ?? काम क्रोधादि षडरिपुओं पर विजय प्राप्त करके ब्रह्म , मुक्ति , भोग , योग एवं संसार को विधिवत जान लेने वाला ही वैष्णव है | महाभारत के अनुसार चार वेद एवं सांख्यशास्त्र (पांचरात्र) का ज्ञान रखने वाले ही वैष्णव की श्रेणी में आते हैं शेष सभी स्मार्त्त ही हैं | यह ज्ञान रखने वाले आज कितने लोग हैं ?? कहने का तात्पर्य यह है कि आज लगभग सभी लोग "स्मार्त्त" की ही श्रेणी में रखे जाने के योग्य हैं | स्वयं को स्मार्त्त की श्रेणी में रखना कोई अपमान की बात नहीं है | भविष्य के एक वैष्णव का जन्म स्मार्त्त (ग्राहस्थ्य) में ही होता है , अत: इस विषय पर कभी भी बहस नहीं करनी चाहिए |*


*हम चाहे वैष्णव हों या स्मार्त्त हमें अपने - अपने धर्म एवं कर्म का पालन करने में तत्पर रहना चाहिए | कर्म ही वह साधन है जिसके माध्यम से इस संसार में सफलता प्राप्त करके परलोक में भी सफल हुआ जा सकता है |*

अगला लेख: त्रिपिण्डी श्राद्ध :---- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
12 सितम्बर 2019
*सनातन धर्म में मानव कल्याण के लिए अनेकों व्रत विधान की एक लंबी श्रृंखला है जो कि जो मानव जीवन के कष्टों को हरण करते हुए मनुष्य को मोक्ष दिलाने का साधन भी है | इसी क्रम में भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को "अनंत चतुर्दशी" का व्रत किया जाता है | भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित है यह व्रत | अनन्त अर्
12 सितम्बर 2019
13 सितम्बर 2019
*हमारे सनातन ग्रंथों में एक कथानक पढ़ने को मिलता है जो समुद्र मंथन के नाम से जाना जाता है | देवताओं एवं दैत्यों ने अमृत प्राप्त करने के लिए मन्दाराचल को मथानी एवं वासुकि नाग को रस्सी बनाकर समुद्र का मन्थन किया | अथक परिश्रम से मन्थन करने के बाद समुद्र से अमृत निकला परंतु अमृत निकलने के पहले समुद्र स
13 सितम्बर 2019
27 सितम्बर 2019
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🔴 *आज का सांध्य संदेश* 🔴🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻 *संसार में मनुष्य सहित जितने भी जीव हैं सब अपने सारे क्रिया कलाप स्वार्थवश ही करते हैं | तुलसीदास जी ने तो अपने मानस के माध्यम से इस संसार से ऊपर उठकर देवत
27 सितम्बर 2019
26 सितम्बर 2019
*हमारे सनातन धर्म-दर्शन के अनुसार जिस प्रकार जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है; उसी प्रकार जिसकी मृत्यु हुई है, उसका जन्म भी निश्चित है | ऐसे कुछ विरले ही होते हैं जिन्हें मोक्ष प्राप्ति हो जाती है | पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों
26 सितम्बर 2019
22 सितम्बर 2019
*सनातन धर्म में व्रत व त्यौहारों को मनाने का विशेष एक महत्व व एक विशेष उद्देश्य होता है | कुछ व्रत त्यौहार सामाजिक कल्याण से जुड़े होते हैं तो कुछ व्यक्तिगत व पारिवारिक हितों से | आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में जहां पितर शांति के लिये श्राद्ध पक्ष मनाया जाता है तो वहीं शुक्ल पक्ष के आरंभ होते ही आदिशक
22 सितम्बर 2019
22 सितम्बर 2019
*सनातन धर्म में व्रत व त्यौहारों को मनाने का विशेष एक महत्व व एक विशेष उद्देश्य होता है | कुछ व्रत त्यौहार सामाजिक कल्याण से जुड़े होते हैं तो कुछ व्यक्तिगत व पारिवारिक हितों से | आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में जहां पितर शांति के लिये श्राद्ध पक्ष मनाया जाता है तो वहीं शुक्ल पक्ष के आरंभ होते ही आदिशक
22 सितम्बर 2019
01 अक्तूबर 2019
*हमारा देश भारत बहुत ही समृद्धशाली रहा है | भारत यदि समृद्धिशाली एवं ऐश्वर्यशाली रहा है तो उसका कारण भारत की संस्कृति एवं संस्कार ही रहा है | समय समय पड़ने वाले पर्व एवं त्यौहार भारत एवं भारतवासियों को समृद्धिशाली बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान करते हैं | इस समय नवरात्रि का पावन पर्व चल रहा है
01 अक्तूबर 2019
21 सितम्बर 2019
*सनातन धर्म इतना बृहद एवं विस्तृत है कि इसके विषय में जितना जानने का प्रयास करो उतनी ही नवीनता प्राप्त होती है | सनातन धर्म के संपूर्ण विधान को जान पाना असंभव सा प्रतीत होता है | जिस प्रकार गहरे समुद्र की थाह पाना एवं उसे तैरकर पार करना असंभव है उसी प्रकार सनातन धर्म की व्यापकता का अनुमान लगा पाना
21 सितम्बर 2019
10 सितम्बर 2019
*सनातन धर्म ने मानव जीवन में आने वाली प्राय: सभी समस्याओं का निराकरण बताने करने का प्रयास अपने विधानों के माध्यम से किया है | नि:संतान दम्पत्ति या सुसंस्कृत , सदाचारी सन्तति की प्राप्ति के लिए "पयोव्रत" का विधान हमारे शास्त्रों में बताया गया है | दैत्यराजा बलि के आक्रमण से देवता स्वर्ग से पलायन करके
10 सितम्बर 2019
13 सितम्बर 2019
*मानव जीवन ही नहीं सृष्टि के सभी अंग - उपांगों मे अनुशासन का विशेष महत्व है | समस्त प्रकृति एक अनुशासन में बंधकर चलती है इसलिए उसके किसी भी क्रियाकलापों में बाधा नहीं आती है | दिन – रात नियमित रूप से आते रहते हैं इससे स्पष्ट है कि अनुशासन के द्वारा ही जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है | विचार कीजिए कि
13 सितम्बर 2019
20 सितम्बर 2019
*सनातन धर्म में पितरों के लिए श्राद्ध की अनेक विधियां बताई गई हैं , इन सभी विधियों में सबसे सरल दो विधि बताई गई है :- पिंडदान एवं ब्राह्मण भोजन | मृत्यु के बाद जो लोग देवलोक या पितृलोक में पहुंचते हैं वह मंत्रों के द्वारा बुलाये जाने पर उन लोकों से तत्क्षण श्राद्घदेश में आ जाते हैं और निमंत्रित ब्
20 सितम्बर 2019
30 सितम्बर 2019
*नवरात्रि के नौ दिनों में आदिशक्ति के नौ रूपों की आराधना की जाती है | इन्हीं नौ रूपों में पूरा जीवन समाहित है | प्रथम रूप शैलपुत्री के रूप में जन्म लेकर महामाया का दूसरा स्वरूप "ब्रह्मचारिणी" है | ब्रह्मचारिणी का अर्थ होता है तपश्चारिणी अर्थात तपस्या करने वाली | कन्या रूप में ब्रह्मचर्य का पालन करना
30 सितम्बर 2019
21 सितम्बर 2019
*सनातन धर्म में प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपने पितरों का श्राद्ध तर्पण करना अनिवार्य बताया गया है | जो व्यक्ति तर्पण / श्राद्ध नहीं कर पाता है उसके पितर उससे अप्रसन्न होकर के अनेकों बाधाएं खड़ी करते हैं | जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के लिए श्राद्ध एवं तर्पण अनिवार्य है उसी प्रकार श्राद्ध पक्ष के कुछ न
21 सितम्बर 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x