सर्व श्रद्धया दत्त श्राद्धम् :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

26 सितम्बर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (428 बार पढ़ा जा चुका है)

सर्व श्रद्धया दत्त श्राद्धम् :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारे सनातन धर्म-दर्शन के अनुसार जिस प्रकार जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है; उसी प्रकार जिसकी मृत्यु हुई है, उसका जन्म भी निश्चित है | ऐसे कुछ विरले ही होते हैं जिन्हें मोक्ष प्राप्ति हो जाती है | पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं | इन्हीं को पितर कहते हैं | तर्पण करते समय सर्वप्रथम दिव्य पितृ तर्पण , देव तर्पण , ऋषि तर्पण और दिव्य मनुष्य तर्पण के पश्चात् ही स्व-पितृ तर्पण किया जाता है | भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं | जिस तिथि को माता-पिता की मृत्यु होती है, उसी तिथि को पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है | शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और घर-परिवार, व्यवसाय तथा आजीविका में हमेशा उन्नति होती है | ऐसा न करने पर परिवार में पितृदोष उत्पन्न हो जाता है | पितृ दोष के अनेक कारण होते हैं | परिवार में किसी का दुर्मरण होने से , अपने माता-पिता आदि सम्मानीय जनों का अपमान करने से , मरने के बाद माता-पिता का उचित ढंग से क्रियाकर्म और श्राद्ध नहीं करने से , उनके निमित्त वार्षिक श्राद्ध आदि न करने से पितरों को दोष लगता है | इसके फलस्वरूप परिवार में अशांति , वंश-वृद्धि में रूकावट , आकस्मिक बीमारी , संकट , धन में वृद्धि न होना , सारी सुख सुविधाएँ होते भी मन असन्तुष्ट रहना आदि पितृ दोष हो सकते हैं | यदि परिवार के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई हो तो पितृ दोष के निवारण के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार उसकी आत्म शांति के लिए किसी पवित्र तीर्थ स्थान पर श्राद्ध करवाएँ | अपने माता-पिता तथा अन्य ज्येष्ठ जनों का अपमान न करें | प्रतिवर्ष पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण अवश्य करें | यदि इन सभी क्रियाओं को करने के पश्चात् पितृ दोष से मुक्ति न होती हो तो ऐसी स्थिति में किसी सुयोग्य कर्मनिष्ठ विद्वान ब्राह्मण से श्रीमद् भागवत् पुराण की कथा करवायें | वैसे श्रीमद् भागवत् पुराण की कथा कोई भी श्रद्धालु पुरुष अपने पितरों की आम शांति के लिए करवा सकता है | इससे विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है |*


*आज का समय इतना ज्यादा आधुनिक हो गया है कि कुछ लोग तो इन क्रिया कलापों को मानना ही नहीं चाहते | श्राद्ध की तो बात छोड़ दीजिए आज लोग अपने पितरों को तिलांजलि भी नहीं देना चाहते | जबकि हमारे धर्मशास्त्र बताते हैं कि यदि पितरों के कुछ भी न करे तो भी कम से कम तर्पण (तिल मिश्रित जल से तिलांजलि) अवश्य प्रदान करे | क्योंकि :- "एकैकस्य तिलैर्मिश्रांस्त्रींस्त्रीन् दद्याज्जलाज्जलीन् ! यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति !! अर्थात :- जो अपने पितरों को तिल-मिश्रित जल की तीन - तीन अंजलियाँ प्रदान करते हैं , उनके जन्म से तर्पण के दिन तक के पापों का नाश हो जाता है | परंतु मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" देख रहा हूँ कि आज दूसरों को यह सब करने की शिक्षा देने वाले भी इन दिव्य कृत्यों से किनारा किये हुए हैं | कुछ लोग (पण्डित) तो ऐसे भी हैं जो दूसरों के यहाँ तो तर्पण / पिण्डदानादि कराते रहते परंतु स्वयं ही नहीं कर पा रहे हैं , क्योंकि उनको समय ही नहीं है | जबकि पूर्वकाल में पितृपक्ष में लोग मन कर्म एवं वाणी से संयम का जीवन जीते थे , पितरों को स्मरण करके जल चढाते थे , निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान देते थे पितृपक्ष में प्रत्येक परिवार में मृत माता-पिता का श्राद्ध किया जाता था | परंतु आज यह कुछ परिवारों तक ही सिमट कर रह गया है | विचार कीजिए कि जो पूर्वज इस संसार हमको सुखी रखने एवं ऐश्वर्यशाली बनाने के लिए दिन रात मेहनत करते हुए सारी सुख - सुविधाओं की व्यवस्था करके इस संसार से विदा हो जाते हैं उनके निमित्त उनकी संताने क्या कर रही हैं ?? कुछ लोग तो ऐसे दुर्भाग्यशाली होते हैं कि उनका अन्तिम संस्कार , दशाह , त्रयोदशाह भी ढंग से नहीं हो पाता है | क्योंकि आज की संतानों को यह सारे कृत्य व्यर्थ लगते हैं | ऐसे ही लोग आज अनेक प्रकार की आधि - व्याधियों से ग्रसित होकर अनेक उपाय करते देखे जा सकते हैं | नि:संतानता का दंश झेल रहे लोग अनेक प्रकार की चिकित्सा में अकूत धन खर्च करते रहते हैं परंतु किसी विद्वान के द्वारा पितृदोष बताने पर उस दोष को मिटाने का स्वांग भर करते हैं | इन सभी प्रकार के दोषों से बचने के लिए मनुष्य को समय समय पर तर्पण / श्राद्ध आदि करते रहना चाहिए | परंतु वाह रे मनुष्य ! अनेकों प्रकार के उपाय कर लेने वाले अपने पितरों को भूल जा रहे हैं और नाना प्रकार के दु:ख उठा रहे हैं |*


*पितर हमारी श्रद्धा के भूखे होते हैं | अपना सबकुछ आपके लिए छोड़कर चले जाने वाले पितर हमसे धन आदि की मांग न करके मात्र तिल मिश्रित जल ही मांगते हैं उनके निमित्त यह कृत्य सबको ही करते रहना चाहिए |*

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