ध्यान और उसका अभ्यास - स्वामी वेदभारती जी

26 सितम्बर 2019   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (437 बार पढ़ा जा चुका है)

ध्यान और उसका अभ्यास - स्वामी वेदभारती जी

ध्यान और उसका अभ्यास

भूमिका

पिछले कुछ दशकों में ध्यान हमारे आधुनिक जीवन और हमारे शब्दकोष का एक सदस्य बन गया है | चिकित्सक, मनोवैज्ञानिक और अन्य व्यवसायी तनाव से मुक्ति दिलाने, स्वास्थ्य को सही बनाए रखने और सृजनात्मकता तथा ऊर्जा में वृद्धि के लिए एक प्रभावशाली साधन के रूप में ध्यान का समर्थन करते हैं | वास्तव में ध्यान एक ऐसी प्रभावशाली पद्धति है कि जिसका उपयोग अपनी शारीरिक क्रियाओं के सन्तुलन, मस्तिष्क की स्पष्टता और अपने भीतर के गहनतम स्तरों के प्रति जागरूकता के लिए प्रत्येक व्यक्ति कर सकता है | यहाँ तक कि जिन्होंने अभी तक ध्यान की गहन स्थिति को नहीं प्राप्त किया है वे भी शरीर और मन में स्थिरता उत्पन्न करना सीख सकते हैं और इस स्थिरता के बहुत से लाभों का अनुभव कर सकते हैं |

जिज्ञासुओं को ध्यान की प्राथमिक तकनीक और ध्यान की तैयारी के लिए आवश्यक अभ्यासों के विषय में दिशा निर्देश देने के लिए हिमालयन योग पद्धति के स्वामी राम के पट्टशिष्य स्वामी वेदभारती जी ने “Meditation and its practices - ध्यान और उसका अभ्यास” नाम से पुस्तक लिखी थी | इसका उद्देश्य था पाठकों को ध्यान का एक ऐसा स्पष्ट, क्रमबद्ध और उन्नत मार्ग दिखाना जो केवल दार्शनिक और सैद्धान्तिक ही न हो, अपितु व्यावहारिक भी हो और सरलता से बोधगम्य भी हो | मुझ जैसी अल्पबुद्धि पाठक और लेखिका पर कृपास्वरूप स्वामी जी ने कुछ पुस्तकों का हिन्दी अनुवाद का कार्य मुझे भी सौंपा था | मित्रों के लाभार्थ तथा पूज्य स्वामी जी को श्रद्धांजलि स्वरूप उन्हीं पुस्तकों को आप सरीखे मित्रों तक पहुँचाने के मेरे प्रयास का प्रथम सोपान आज मैं आरम्भ करने जा रही हूँ...

साधक अपने जीवन को और अधिक पवित्र, क्रियाशील और पूर्ण बनाने के लिए सहस्रों वर्षों से ध्यान के इस विज्ञान का अध्ययन और अभ्यास करते रहे हैं | ध्यान के अभ्यास के द्वारा आपमें ऐसी सामर्थ्य आ जाती है कि आप अपने स्वास्थ्य और सम्बन्धों में सुधार के साथ साथ अपनी कार्यक्षमता में वृद्धि और दक्षता भी प्राप्त कर सकते हैं | और यह सब केवल इसलिए होता है क्योंकि ध्यान वह सब कर सकता है जो किसी अन्य पद्धति के द्वारा सम्भव नहीं | ध्यान का अभ्यास आपको हर स्तर पर अपने आपसे परिचित होने का अवसर प्रदान करता है और अन्त में आपको आत्मचैतन्य के केन्द्र में ले जाता है – जहाँ से चेतना जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रवाहित होती है | चेतना के इस केन्द्र को “आत्मन्” कहते हैं | और जब एक जिज्ञासु को – प्रशिक्षु को – अन्वेषक को आत्मज्ञान हो जाता है – जब वह आत्मा में गहरे पैठ जाता है और मस्तिष्क तथा संसार की अन्य वस्तुओं से पहचान बन्द कर देता है तब उसकी महत्त्वाकांक्षा पूर्णता को प्राप्त हो जाती है |

जब एक अन्वेषक इस स्थिति को प्राप्त हो जाता है तब वह स्वयं को आत्मक्षेत्र में केन्द्रित कर लेता है | आत्मा की यही स्थिति समाधि कहलाती है | इस स्थिति को प्राप्त हो जाने पर समस्त प्रश्न समाप्त हो जाते हैं, समस्त उत्तर प्राप्त हो जाते हैं और सम्पूर्ण समस्याओं के समाधान हो जाते हैं |

क्योंकि ये प्रारम्भिक अभ्यास सरलता से ग्राह्य हैं इसलिए आप पाएँगे की जितनी निरन्तरता और नियमितता से आप अभ्यास करते हैं आपको उतना ही अधिक लाभ का अनुभव होता है | आरम्भ में आपको साधारण से परिवर्तन अनुभव होंगे – जैसे शान्ति में वृद्धि और तनाव में कमी | पर जैसे जैसे अभ्यास बढ़ता जाएगा, आप अपने भीतर बहुत गहरे और कुछ विशेष प्रकार के सुधारों का अनुभव करेंगे | यह अन्तर्यात्रा बहुत आनन्ददायक है – जो लगन के साथ नियमित अभ्यास से प्राप्त होती है |

ध्यान की यह क्रियात्मक विधि इतनी जिज्ञासा उत्पन्न करने वाली एवम् आकर्षक है कि योग की दूसरी शाखाओं जैसे आसन, प्राणायाम, स्वास्थ्य में सुधार, दर्शन तथा ध्यान के मनोविज्ञान के प्रति भी आपकी उत्सुकता एवम् आकर्षण बढ़ता जाएगा |

https://www.astrologerdrpurnimasharma.com/2019/09/26/meditation-and-its-practices/

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