छोटी सोच और पैर की मोच

30 सितम्बर 2019   |  हरीश भट्ट   (9234 बार पढ़ा जा चुका है)

छोटी सोच और पैर की मोच

छोटी सोच हो या पैर की मोच, कभी आगे नहीं बढ़ने देती. जहां छोटी सोच के चलते नीयत डोलने में देर नहीं लगती,वहीं पैर की मोच अपाहिज बना देती है. बाकी बची दुनिया, जिसके पीछे पड़ जाए, तो ऐसे पड़ती है कि जैसे खुद दूध की धुली हो. किसी काम की सकारात्मक या नकारात्मक समीक्षा हो सकती है. लेकिन किसी के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता है. हरेक की ख्वाहिश होती है कि वह एवरेस्ट की चोटी को फतह करें, लेकिन सामाजिक चक्रव्यूह के ताने-बाने के चलते हर कोई ऐसा नहीं कर पाता है, तो क्या उसको नकारा साबित कर दिया जाए. जिंदगी के उतार-चढ़ाव के बीच मुसीबत का आना जाना लगा रहता है. यह अलग बात है कि किसी की जिंदगी में मुसीबत का दौर कुछ ज्यादा ही लंबा हो जाता है. फिर इतिहास तो अपनी धुन में रमे फक्कड़ या सिरफिरे ही बनाते हैं, बाकी सब तो उनको फॉलो ही करते रहते हैं. विश्व की महान विभूतियों की जीवन यात्रा का अधिकांश समय कष्टपूर्ण ही बीता है. लेकिन अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्रता के चलते ही वो मिसाल बन पाए. इनके बीच एक महत्वपूर्ण बात यह है कि हिंसा नहीं होती तो अहिंसा का कोई मतलब ही नहीं था. तलवार- बंदूक और हंटर से शुरू हुई हिंसा का मुंहतोड़ जवाब देने वाले साबरमती के संत को कौन नहीं जानता. लेकिन पूर्ण कामयाबी के लिए हिंसा-अहिंसा के बीच सामंजस्य बैठाना बहुत जरूरी है. भले हिंसक विश्व विजेता हो जाए लेकिन दिलों पर तो शांति के दूत ही राज करते हैं.

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