गांधीजी का शिक्षा दर्शन

02 अक्तूबर 2019   |  गौरीगन गुप्ता   (404 बार पढ़ा जा चुका है)



शिक्षा ........


जन-जन के प्रेरणा स्त्रोत गांधीजी की सूक्तियों,चिंतनशील विचारों में समाहित अनगिनत शिक्षाओं को आत्मसात करने से,जीवन में तम की जगह उजास और प्रेरणा भर जाती हैं.जीवन पथ प्रशस्त करने वाले राजनीतिक आन्दोलनांतर्गत रचनात्मक कार्यों जैसे-खादी ग्रामोद्योग,विद्यार्थियों के लिए,अस्पृश्यता निवारण आदि सामाजिक उत्थान की कड़ी बने जिनमें गहरी सोच व तपश्चर्या निहित होने के साथ विचार,वाणी,कर्म के संतुलन से व्यक्तित्व में विश्वसनीयता का प्रकाश प्रदीप्त होता हैं क्योकि हमारे विचार ही शब्द बनकर कर्म करते हैं.अद्वैत परमशक्ति में विश्वास रखते हुये नियमों से निबद्ध प्रार्थना करना चाहिए जिससे संकल्प शक्ति दृढ़ होती हैं और प्रार्थना,व्रत,मौन तीनों साबुन,पानी,तौलिया जैसे होना चाहिए जिसके द्वारा प्रतिदिन अपने हृदय का प्रक्षालन करके निर्मल बनाना.ये एक प्रकार के आध्यात्मिक आहार हैं जिसकी ऊर्जा देश सेवा,समाज सेवा जैसे कार्यों में लगाना चाहिए. काश्तकार की वेषभूषा अपनाकर त्याग की भावना का संदेश दिया.सृजनात्मक कार्यों के कारण लोगों में स्वाधीनता को लेकर चेतना और जागरण का प्रस्फुरण हुआ.किसी को भी अयोग्य न मानकर उसकी क्षमतानुसार कार्य सौंपकर उद्धेश्य पूर्ति कराने का समभाव होना चाहिए.सत्य,अहिंसा,अस्तेय,सत्याग्रह,स्वराज,स्वावलंबन का वैचारिक दृष्टि से महत्व हैं जिसमें निर्भीक होकर डटकर अपनी बात कहना,भेदभावरहित सभ्यता उत्थानवादी,पुनरूत्थानवादी अवधारणा की जीवन शैली व मूल्यों में आत्मसात करना चाहिए.अनुशासन जीवन संगठन की कुंजी और प्रगति की सीढ़ी हैं.आत्मनिर्भर बनकर आत्मदीपक बने.बुद्धि के विकास का अर्थ हैं कि विचार और विवेक की परिपक्वता,सोचने और सोचे हुये विचारों को व्यक्त करने की आजादी मानवीय चिंतन और उसका सम्मान.


सादा जीवन,उच्च विचार रखने वाले गांधीजी शिक्षा को बच्चों का मूल अधिकार मानते हुये कहा कि बच्चों के सर्वागीर्ण विकास के लिए 3 H अर्थात head,heart,hand इन तीनों का समन्वित विकास करना.विभिन्न व्यक्तित्व वाले बच्चों के विचारों तथा उसकी कर्मठता को,उसके सम्पूर्ण आचरणों को इस प्रकार प्रभावित,परिमार्जित तथा संगठित करना जिससे वो मानव कल्याण में योगदान कर सके.विदेशी संस्कृति पर आधारित शिक्षा के विरोधी गांधीजी ने बच्चों को मातृभाषा में निःशुल्क शिक्षा देकर उनके मानवीय गुणों का विकास करना,साथ ही बच्चों में तन-मन-आत्मा का सामंजस्यपूर्ण विकास होना चाहिए और शिक्षा को स्थायी उत्पादन उद्योगों के माध्यम से देना चाहिए.इसलिए गांधीजी ने सुविधा की दृष्टि से ज्ञान की अखंडता में विश्वास रखते हुये विभिन्न शाखाओं में विभक्त कर समवाय विधि से अर्थात समस्त विषयों की शिक्षा किसी कार्य या हस्तशिल्प के माध्यम से देनी चाहिए.स्थायी ज्ञान के लिए व्यावहारिक शिक्षण विधि अर्थात करके सीखना,अनुभव द्वारा सीखना,क्रिया के माध्यम से सीखने पर बल दिया.


सामुदायिक जीवन के आधारभूत व्यवसायों से जुड़ी बुनियादी राष्ट्रीय सभ्यता व संस्कृति के नजदीक थी.आधारभूत शिल्प में कृषि,कताई,बुनाई,लकड़ी,चमड़े,मिट्टी का काम,पुस्तक कला,मछली पालन,फल,सब्जी का बागवान अर्थात व्यावहारिक-व्यावसायिक शिक्षा द्वारा सांस्कृतिक उद्धेश्यों की पूर्ति करते हुये बच्चों की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति कर आत्मनिर्भर बनाना.बालिकायेँ शिल्प के स्थान पर गृहविज्ञान ले.चुने गए विषयों में पारंगत कर स्वावलंबी जीवन व्यतीत कर सके.शारीरिक श्रम को महत्व देकर स्थानीय व भौगोलिक आवश्यकताओं के अनुकूल शिक्षाप्रद हस्तशिल्प के अलावा गणित,मातृभाषा,सा. वि.,हिन्दी,शारीरिक शिक्षा प्रदान करना.यह सत्य हैं कि अक्षर ज्ञान से जीवन का सौंदर्य बढ़ता हैं लेकिन यह अपवाद हैं कि बिना अक्षरज्ञान के नैतिक,शारीरिक,आर्थिक विकास हो ही नही सकता.इस तरह प्रारंभिक शिक्षा की बुनियाद पर ही उच्च शिक्षा की ईमारत खड़ी करना हैं क्योकि कुकुरमुत्तों की तरह अँग्रेजी स्कूलों की बाढ़ सैद्धांतिक शिक्षा प्रदान करती हैं,न कि मातृभाषा में शिक्षा देकर बच्चों का चरित्र निर्माण करना.


राजनीतिक आंदोलन में सम्मिलित रचनात्मक कार्यक्रमों की प्रासंगता शैक्षिक दर्शन में स्पष्ट दृष्टिगोचर होती हैं,जो वर्तमान की आवश्यकता हैं.स्पष्ट उद्धेश्य हैं-शिक्षा को आत्मनिर्भर बनाना,सर्वोतमुखी विकास,और विदेशी धागे और कपड़े को बहिष्कार का रास्ता खोलना अर्थात कुशल नागरिक का निर्माण कर स्वावलंबी जीवन व्यतीत करने के लिए प्रोत्साहित करना.बच्चों के खेल में हल जोतना,हस्तशिल्प के जरिये शिक्षित कर उन्हें दूरगामी अहिंसक सामाजिक क्रान्ति का वाहक बनाना क्योकि केवल बौद्धिक विकास सम्पूर्ण शिक्षा नहीं हैं बल्कि 3 H शिक्षा द्वारा आत्मविकास करना.समाज व राष्ट्र में व्याप्त बुराईयों को नष्ट करने के लिए व क्रांतिकारी उद्धेश्य प्राप्ति के लिए सर्वोदय समाज कि स्थापना के लिए शिक्षा ही एक मात्र साधन हैं. समाज की आवश्यकतानुसार क्रियाशील पाठ्यक्रम का निर्माण समवाय विधि से शिक्षित करना अर्थात शिल्प उद्योग को विषय से जोड़कर पढ़ाना.कताई-सिलाई के माध्यम से विभिन्न सभ्यताओं में प्रचलित वस्त्रों से परिचय करा इतिहास का व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करना.उद्योग शिल्प के लिए माल के लेन-देन से गणित संबंधी व्यावहारिक ज्ञान मिलता हैं.शारीरिक दण्ड के प्रबल विरोधी गांधीजी आत्मानुशासन पर ज़ोर देते हुये कहते हैं कि प्राकृतिक सामाजिक परिवेश में स्वच्छ व सहयोग कर अनुशासन बनाए रखा जा सकता हैं.व्यावहारिक जीवन के मसलों से जूझने के लिए व्याकरण और रेखागणित की शिक्षा मानसिक उन्नति के लिए अतिआवश्यक हैं.


आध्यात्मिक-सामाजिक मूल्यों की शिक्षा द्वारा प्राचीन भारतीय संस्कृति को परिष्कृत कर निश्चेष्ट,निष्प्राण मानवों के हृदय में बुझी ज्योति को नयी ऊर्जा प्रदान की.सर्वोदय,स्वावलंबन प्रवृति का प्रस्फुटन ही व्यक्ति में सुधारवादी,सहनशीलता,दृढ़ता और अपने सुविचारित निर्णय पर स्थिर रहने जैसे उच्च मूल्य स्थापित कर उनमें आत्मविश्वास और प्रखरता की वृद्धि करते हैं क्योकि घर्षण के बिना चमक नही आती,न बाह्य और न आंतरिक.आंतरिक दृढ़ता व शक्ति से समरसतता की ओर बढना जीवन की समस्याओं का समाधान अपने आपको बदलकर करना सिखाया.दया,प्यार,उदारता का पाठ पढ़ाते हुये गलत कार्यों के विरुद्ध सत्याग्रह की राह करना लेना.छोटी-छोटी बातों से जुड़े जीवन में अपने बजनदारी शब्दों से दुनियाँ बदलने की ताकत दिखाई.आलोचनाओं से ज्यादा आत्मावलोकन,आत्मानुशासन,आत्मसुधार द्वारा स्वावलंबी व स्वाभिमान भारत का निर्माण किया जा सकता हैं.चरखे पर कातते सूत में जीवन की समग्रता देखकर सत्य को सरोकार करने के लिए जीवन समर्पित करना चाहिए.


समदृष्टि गांधीजी ने सिखाया कि सत्य का साया,धर्मनिरपेक्षता का स्तंभ और विनम्रता व सहयोग से संघर्षों की पाठशाला में समस्याओं का समाधान ,मैं और मेरा की भावना त्यागकर असहयोग आंदोलन,अहिंसा की व्यापकता में हैं.सर्वशक्तिईश्वर के प्रति विश्वास रखते हुये आशावादी दृष्टिकोण रख,दूसरों पर भरोसा रखना सिखाया,अन्यथा शंका वातावरण को दूषित्त कर आपस में दूरियाँ बढ़ा देती हैं.सत्य सर्वोच्च बुद्धिमत्ता हैं तो मौन कई समस्याओं का समाधान.आचरणरहित विचार खोटे मोती की तरह होते हैं,अति सर्वत्र वर्जयते को ध्यान में रखकर माध्यम मार्ग अपनाना व स्वाध्याय ज्ञान संचय और आत्मविकास का सर्वोच्च साधन हैं.परिस्थितियों में घुटने टेकने के वजाय लड़ने का रास्ता खोजना.


सारांशतः शिक्षा एक ऐसा अमोध अस्त्र हैं,जिसके द्वारा राष्ट्रोत्थान एवं समाजोत्थान की दिशा में लोगों को आत्मनिर्भर,जागरूक एवं सक्रिय किया जाता हैं,जिसके लिए अक्षरज्ञान से आगे जाकर देश,समाज की परम्पराओं ,जीवन बोध-मूल्यों का अभिज्ञान कराया जाता हैं.





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