मानव मन की बात ही क्या?

04 अक्तूबर 2019   |  हरीश भट्ट   (4529 बार पढ़ा जा चुका है)

मानव मन की बात ही क्या?

मानव मन की बात ही क्या, पता नहीं कब कौन सी बात उसके मन को भा जाए और कब कौन की बात उसके दिल में घर कर जाए, कहां नहीं जा सकता। कब वह आकाश की ऊंचाइयों को छूने की कल्पना करने लगे और कब वह धड़ाम से जमीन पर आ गिरे। आज तक कोई भी मानव मन की थाह तो क्या, उसके एक अंश को भी नहीं जान पाया। आपका प्रिय आपकी कौन सी बात से प्रसन्न होकर आपके गले लगकर आपको आश्चर्यचकित कर दे, आपको खुद नहीं पता होता है। दूसरी ओर आप उसकी ख़ुशी के लिए दिन-रात एक कर दे, और आपको उसके हसीन चेहरे पर मुस्कराहट की एक झलक भी देखने को न मिले। यह मानव मन की असमंजस की स्थिति नहीं है, तो क्या है कि हंसी-ख़ुशी के माहौल में कई दौर की बातचीत के बाद जिंदगी भर साथ-साथ जीने-मरने के वादे के साथ शुभ मंडप के नीचे अग्नि के फेरे लेने वाले नवयुगल दंपत्ति कुछ दिनों या सालों बाद अचानक कोर्ट-कचहरी में वकीलों के चक्कर लगाने लगते है कि उनको अब उनका साथी बोझ लगने लगा है, और उससे छुटकारा पाना है। उनका या उनके साथी का मन अब किसी ओर की आकर्षित हो गया है। अब मन बैचेन रहता है, एक साथ रहने में दम घुटता है, यही मन था जब साथी के बगैर दम निकला जा रहा था। ऑफिस हो या घर हर समय अपने साथियों के बीच एक या दो बहुत अजीज विश्वासपात्र कब आपके विपरीत चले जाए, आपको खुद इसका पता तब चलता है कि जब वह आपकी खुशहाल जिंदगी में कडवाहट भरा माहौल पैदा कर देते है और तब भी हम मन को ही समझाते है, हे भगवान यह क्या हो गया, हमने तो ऐसा सोचा भी न था कि एक दिन अपना ही कोई मेरे लिए खाई खोद देगा। इसी मन के चक्कर में भगवान श्रीराम को महापंड़ित व अजर-अमर रावण का वध करना पड गया, जरा सोचिए अगर सूपर्णखा के मन को राम-लक्ष्मण की मोहिनी सूरत न भाती या माता सीता के मन को सुनहरा हिरन न भाता तो क्या हनुमान को श्रीलंका को जलाने की आवश्यकता थी। यही मन की तो बात थी कि शकुनि ने अपने मन के प्रिय दुर्योधन को राजपाट दिलाने के लिए महाभारत करवा दिया। अगर वह अपने व दुर्योधन के मन को समझा लेता तो क्या जरूरत थी महाभारत की। यह मन ही तो है कि आज हमारे नेताओं का मन नहीं मान रहा है बगैर सत्ता हासिल किए, अगर उनको आम जनता की खुशहाली के लिए कुछ करने की तमन्ना है तो वह बगैर कुर्सी या सत्ता के भी करा जा सकता है। जवाहर लाल नेहरू व जिन्ना के मन को समझाते-समझाते महात्मा गांधी का मन इतना टूट गया कि उन्होंने दुःखी मन से भारत-पाक बंटवारे को स्वीकार किया। अगर हम अपने मन को समझा-बुझा कर रखे तो शायद हमको दुःखी नहीं होना पडेगा हमको अपनी क्षमता और योग्यता के अनुरूप ही कुछ मिलता है, और उसमें ही अपनी जिंदगी को बेहतरीन करने का प्रयास करना चाहिए। प्रकृति का नियम है कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड ता। जब हमको कुछ मिलता है तो मन प्रसन्न रहता है और जब हम कुछ खोते है तो मन दुःखी हो जाता है। बस यही एक छोटी सी बात हमको ध्यान में रखते हुए अपने मन को समझाना चाहिए कि जिसका उदय हुआ है, वह अस्त भी जरूर होगा। हां इसमें एक बात हो सकती है कि कुछ चीजों को हम समय से पहले खो देते है, और उसका गम हमको पूरी जिंदगी सताता है। इन्हीं सब बातों को देखते हुए हमको मन को अपने काबू में रखना चाहिए, ताकि जिंदगी में सुख-दुःख की हर घडी में हमारा मन टूट न सके।

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