मौजूदा लेखकों की चुनौतियां

06 अक्तूबर 2019   |  शिल्पा रोंघे   (460 बार पढ़ा जा चुका है)

यूं तो लिखने वालों की कमी नहीं है और पढ़ी जाने वाली किताबों के लिए भी यही बात कही जा सकती है। आज प्रकाशन के लिए अनेक माध्यम उपलब्ध है। कई सालों पहले बहुत प्रतिभाशाली लेखक हुए, लेकिन उचित माध्यम ना मिलने के कारण उनके काम को उस वक्त वो नाम और शोहरत नहीं मिल पाई जो मिलनी चाहिए थी। चाहे बात पूर्व की हो या पश्चिम की कई ऐसे लेखक है जो अपनी मौत के कई सालों या सदियों को बाद मशहूर हुए। आज प्रिंट से लेकर डिजिटल माध्यम में लेखन की संभावनाएं काफी बढ़ गई है, कई लेखक लेखन के क्षेत्र में हाथ आजमा रहे है और उन्हें पढ़ा भी जा रहा है। तो क्या हमें ये मान लेना चाहिए की नए दौर में लेखन उतना कठिन नहीं रहा जितना कि पहले था, ये कहना पूरी तरह सही नहीं होगा, आज भले ही प्रकाशन आसान हो गया है,

लेकिन पाठकों का मिज़ाज जान पाना उतना ही कठिन हो चला है, कभी औसत सी जान पड़ने वाली रचनाएं भी मशहूर हो जाती है और बेहतरीन किस्म की रचनाएं भी उपेक्षित रह जाती है, हम इस बहस में नहीं पड़ना चाहते कि कौन अच्छा लिखता है और कौन औसत, हर लेखक की अपनी लेखन शैली और प्रिय विषय होता है जिस पर वो लिखना पसंद करता है। हर किताब से कुछ ना कुछ सीखने को ज़रूर मिलता है। पहले के ज़माने में भावना प्रधान रचनाएं बहुत पसंद की जाती थी, और आज भी की जाती है, लेकिन कभी कभी पाठकों से हम अक्सर ये सुनने को मिलता है कि कोई कहानी अच्छी तो लगी लेकिन उसमें नएपन का आभाव है, भावनाप्रधान कहानियों में नयापन लाना किसी चुनौती से कम नहीं, रहस्य और रोमांच में कई तरह के प्रयोग किए जा सकते है। कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि आज के लेखकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कहानी में ताजगी बनाए रखना। नएपन के साथ कहानी में रोचकता भी आवश्यक तत्व है।

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