समाजसेवा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

11 अक्तूबर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (425 बार पढ़ा जा चुका है)

समाजसेवा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*माता - पिता के संयोग से परिवार में जन्म लेने के बाद मनुष्य धीरे धीरे समाज को जानता - पहचानता है क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक जीव है। समाज ही उसका कर्मक्षेत्र है। अतः उसे स्वयं को समाज के लिए उपयोगी बनाना पड़ता है। मनुष्य ईश्वर की भक्ति एवं सेवा बहुत ही तन्मयता से करता है परंतु समाज की ओर बगुत ही कम ध्यान दे पाता है जबकि ईश्वर पूजा का फल तभी प्राप्त हो सकता है जब मनुष्य के हृदय में दया , दान एवं परोपकार की भावना हो | सीधा सा अर्थ है कि यदि इन भावों को हृदय में जागृत करके समाज के दबे कुचले , असहाय , निर्बल एवं दुखियों के सहायता एवं परोपकार के भाव हृदय में आ जायं तो यही सच्ची ईश्वर की सेवा कही जायेगी क्योंकि परोपकार और सहानुभूति पर ही समाज स्थापित है । इस संसार में जहाँ स्वार्थ का ही बोलबाला है वहाँ भी कुछ लोग अपने-अपने स्वार्थ का थोड़ा-बहुत त्याग करके ही समाज को स्थिर रखते हैं | हमें प्राईमरी की कक्षाओं में प्रात: प्रार्थना के माध्यम से संकल्प कराया जाता है कि :--- "हम दीन - दु:खी , निर्बलों विकलों के सेवक बन संताप हरें ! जो हैं अटके भूले भटके उनको तारें खुद तर जावें !!" समाज के प्रति दया एवं परोपकार की भावना हृदय में प्राथमिक कक्षाओं से ही आरोपित की जाती रही हैं ! यही भारतीय संस्कृति की विशालता है | नि:स्वार्थ भाव से समाज सेवा करने वाले अनेकों चरित्र हमारे इतिहास में देखने व पढ़ने को मिलते हैं | ऐसे लोगों को समाजसेवी या समाजसेविका का नाम दिया जाता रहा है | यह नाम भी उन्हें उनके इन सराहनीय कार्यों के लिए समाज के द्वारा ही प्रदान किया जाता था | यह उन समाजसेवियों का सम्मान समाज के द्वारा किये जाने की विधा थी | अपना कार्य एवं अपने लिए साधन जुटाने का कार्य तो सभी करते हैं परंतु जो दूसरों के भी जीवनोपयोगी आवश्यकताओं का ध्यान देकर यथासमय उसकी पूर्ति करने का प्रयास करे वही सच्चा समाजसेवी है |*

*आज के आधुनिक समाज में समाजसेवियों की बाढ़ सी आ गयी है | यह एक सुखद संकेत है | किसी के कुसमय में उनके साथ खड़े होकर उनकी सहायता करना ही सच्ची ईश्वर सेवा है | परंतु आज समाज सेवा करने से ज्यादा अपना नाम करने की होड़ सी लगी हुई है | जहाँ पहले ऐसे लोगों को समाज के द्वारा "समाजसेवी" की उपाधि दी जाती थी वहीं आज लोग स्वयं अपने नाम के आगे "समाजसेवी" लिखकर स्वयं का प्रचार कर रहा है | इसमें इन तथाकथित समाजसेवियों का स्वार्थ (अपना नाम करने का) छुपा होता है जबकि मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि सेवा निःस्वार्थ भाव से होनी चाहिए | जो व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से दुखियों की सेवा करता है, वह लोकप्रिय बन जाता है | अनेक समाजसेवी तो ऐसे हैं जो समाज का अर्थ ही नहीं जानते | किसी बीमार व्यक्ति को चिकित्सालय में जाकर के एक दर्जन केला देकर चार लोग फोटो खिंचवा कर के शोसलमीडिया पर उसे डालकर समाज सेवा का दम्भ भरते हैं | अनेक समाजसेवी ऐसे भी हैं जो यह नहीं जानते हैं कि समाज का प्रथम अंग / प्रथम इकाई परिवार होता है | आज परिवार का भरण पोषण एवं उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति न कर पाने वाले स्वयं को समाजसेवी कह कर प्रचारित कर रहे हैं | किसी के माता-पिता वृद्धावस्था में कष्ट भोग रहे हैं तो किसी ने अपनी पत्नी का त्याग करके समाज सेवा करना प्रारंभ किया है | ऐसे समाजसेवी जो अपने परिवार का सम्मान नहीं कर पा रहे हैं वे समाज की आवश्यकताओं की कितनी पुर्ति करेंगे ? यह एक यक्ष प्रश्न है | समाज सेवा कोई साधारण कार्य नहीं है , समाज सेवा करने के पहले व्यक्ति को अपने परिवार की सेवा एवं उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति का ध्यान अवश्य देना चाहिए , अन्यथा समाजसेवी लिखने का कोई अर्थ नहीं है | इसे पाखंड एवं थोथा प्रदर्शन ही कहा जाएगा | यद्यपि जिस प्रकार हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं होती हैं उसी प्रकार सभी समाजसेवी भी ढोंगी नहीं कहे जा सकते , परंतु आज के समाज में यह भी सत्य है व्यर्थ के समाजसेवी होने का ढोंग करने वालों की संख्या कुछ अधिक ही बढ़ रही है | इससे समाज का भला नहीं होने वाला है अतः ऐसे लोगों को आईना दिखाने की आवश्यकता है |*


*समाज सेवा त्याग का एक अनूठा उदाहरण है ! यह एक साधना है !! इसे हमारे शास्त्रों में तपस्या भी कहा गया है | अतः समाज सेवा करने के पहले मनुष्य को एक साधक बनना पड़ता है |*

समाजसेवा :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

अगला लेख: श्री राम चरित मानस :-- आचार्य अजुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
27 सितम्बर 2019
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🔴 *आज का सांध्य संदेश* 🔴🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻 *संसार में मनुष्य सहित जितने भी जीव हैं सब अपने सारे क्रिया कलाप स्वार्थवश ही करते हैं | तुलसीदास जी ने तो अपने मानस के माध्यम से इस संसार से ऊपर उठकर देवत
27 सितम्बर 2019
19 अक्तूबर 2019
*हमारा देश भारत आध्यात्मिक सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से आदिकाल से ही सर्वश्रेष्ठ रहा है | संपूर्ण विश्व भारत देश से ही ज्ञान - विज्ञान प्राप्त करता रहा है | संपूर्ण विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जहां समय-समय पर ईश्वरीय शक्तियों ने अवतार धारण किया जिन्हें भगवान की संज्ञा दी गई | भगवान धरा धा
19 अक्तूबर 2019
30 सितम्बर 2019
*नवरात्रि के नौ दिनों में आदिशक्ति के नौ रूपों की आराधना की जाती है | इन्हीं नौ रूपों में पूरा जीवन समाहित है | प्रथम रूप शैलपुत्री के रूप में जन्म लेकर महामाया का दूसरा स्वरूप "ब्रह्मचारिणी" है | ब्रह्मचारिणी का अर्थ होता है तपश्चारिणी अर्थात तपस्या करने वाली | कन्या रूप में ब्रह्मचर्य का पालन करना
30 सितम्बर 2019
30 सितम्बर 2019
*हमारे देश भारत में नारी को आरंभ से ही कोमलता , भावकुता , क्षमाशीलता , सहनशीलता की प्रतिमूर्ति माना जाता रहा है पर यही नारी आवश्यकता पड़ने पर रणचंडी बनने से भी परहेज नहीं करती क्योंकि वह जानती है कि यह कोमल भाव मात्र उन्हें सहानुभूति और सम्मान की नजरों से देख सकता है, पर समानांतर खड़ा होने के लिए अपने
30 सितम्बर 2019
17 अक्तूबर 2019
*सनातन धर्म एक दिव्य एवं अलौकिक परंपरा को प्रस्तुत करता है , समय-समय पर सनातन धर्म में प्रत्येक प्राणी के लिए व्रत एवं पर्वों का महत्व रहा है | परिवार के जितने भी सदस्य होते हैं उनके लिए अलग अलग व्रतविशेष का विधान सनातन धर्म में ही प्राप्त होता है | सृष्टि का आधार नारी को माना गया है | एक नारी के द्
17 अक्तूबर 2019
22 अक्तूबर 2019
*हम उस दिव्य एवं पुण्यभूमि भारत के निवासी हैं जहाँ की संस्कृति एवं सभ्यता को आदर्श मानकर सम्पूर्ण विश्व ने अपनाया था | जहाँ पूर्वकाल में समाज की मान्यताएं थी कि दूसरों की बहन - बेटियों को अपनी बहन -बेटियों की तरह मानो | जहाँ तुलसीदास जी ने अपने मानस में लिखा कि :- "जननी सम जानहुँ परनारी ! धन पराव वि
22 अक्तूबर 2019
19 अक्तूबर 2019
*हमारा देश भारत आध्यात्मिक सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक दृष्टि से आदिकाल से ही सर्वश्रेष्ठ रहा है | संपूर्ण विश्व भारत देश से ही ज्ञान - विज्ञान प्राप्त करता रहा है | संपूर्ण विश्व में भारत ही एक ऐसा देश है जहां समय-समय पर ईश्वरीय शक्तियों ने अवतार धारण किया जिन्हें भगवान की संज्ञा दी गई | भगवान धरा धा
19 अक्तूबर 2019
29 सितम्बर 2019
*हमारा देश भारत विभिन्न मान्यताओं और मान्यताओं में श्रद्धा व विश्वास रखने वाला देश है | इन्हीं मान्यताओं में एक है पितृयाग | पितृपक्ष में पितरों को दिया जाने वाला तर्पण पिण्डदान व श्राद्ध इसी श्रद्धा व विश्वास की एक मजबूत कड़ी है | पितृ को तर्पण / पिण्डदान करने वाला हर व्यक्ति दीर्घायु , पुत्र-पौत्र
29 सितम्बर 2019
19 अक्तूबर 2019
*इस धरा धाम पर वैसे तो मनुष्य की कई श्रेणियां हैं परंतु आध्यात्मिक दृष्टि से मनुष्य को दो श्रेणियों में बांटा गया है :- प्रथम भक्त एवं दूसरा ज्ञानी | भक्त एवं ज्ञानी दोनों ही आध्यात्मिक पथ के पथिक हैं परंतु दोनों में भी भेद है | जहाँ भक्त बनना कुछ सरल है वहीं ज्ञानी बनना अत्यंत कठिन | भक्तों के लिए
19 अक्तूबर 2019
24 अक्तूबर 2019
*सनातन धर्म में मानव जीवन को चार भागों में विभक्त करते हुए इन्हें आश्रम कहा गया है | जो क्रमश: ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , सन्यास एवं वानप्रस्थ के नाम से जाना जाता है | जीवन का प्रथम आश्रम ब्रह्मचर्य कहा जाता है | ब्रह्मचर्य एक ऐसा विषय है जिस पर आदिकाल से लेकर आज तक तीखी बहस होती रही है | स्वयं को ब्रह्म
24 अक्तूबर 2019
25 अक्तूबर 2019
*सनातन धर्म के मानने वाले भारत वंशी सनातन की मान्यताओं एवं परम्पराओं को आदिकाल से मानते चले आये हैं | इन्हीं मान्यताओं एवं परम्पराओं ने सम्पूर्ण विश्व के समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत किया है | सनातन की संस्त परम्पराओं में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वैज्ञानिकता भी ओतप्
25 अक्तूबर 2019
21 अक्तूबर 2019
*परमात्मा ने सृष्टि का सृजन करते हुए आकाश , पाताल एवं धरती का निर्माण किया , फिर इसमें पंच तत्वों का समावेश करके जीवन सृजित किया | पृथ्वी पर जीवन तो सृजित हो गया परंतु इस जीवन को संभाल कर उन्नति के पथ पर अग्रसर करने हेतु प्रोत्साहित करने वाले एक योद्धा की आवश्यकता प्रतीत हुई | एक ऐसा योद्धा जो अपनी
21 अक्तूबर 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x