महिला मताधिकार की जनक : कामिनी रॉय (बांग्ला : য়ামিন রায়)

12 अक्तूबर 2019   |  इंजी. बैरवा   (427 बार पढ़ा जा चुका है)

महिला मताधिकार की जनक : कामिनी रॉय (बांग्ला : য়ামিন রায়)


जी हां, कामिनी रॉय जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए अपना पूरा जीवन ही समर्पित कर दिया था ।

आज 12 अक्टूबर को उनकी 155वीं जयंती है । कामिनी पहली ऐसी महिला हैं जिन्होंने ब्रिटिश इंडिया में ऑनर्स में ग्रेजुएशन की थी । कामिनी एक एक्टिविष्ट, शिक्षाविद् होने के साथ ही एक कवियित्री भी थी ।

कामिनी रॉय का जन्म 12 अक्टूबर 1864 को तत्कालीन बंगाल के बेकरगंज में हुआ था । हालांकि, अब बेकरगंज बांग्लादेश का हिस्सा है । कामिनी एक सम्भ्रान्त बंगाली बैद्य परिवार से थी । उनके पिता चंडी चरण सेन, एक न्यायाधीश, एक लेखक और ब्रह्म समाज के एक प्रमुख सदस्य थे । निशीथ चंद्र सेन, उनके भाई, कलकत्ता उच्च न्यायालय में एक प्रसिद्ध बैरिस्टर थे और बाद में कलकत्ता के महापौर बने । जबकि उनकी बहन जैमिनी तत्कालीन नेपाल शाही परिवार की गृह चिकित्सक थीं ।

कामिनी बचपन से ही आजाद ख्यालों की थी, उन्होंने हमेशा से ही शिक्षा को तवज्जों दी थी ।

1886 में कोलकाता यूनिवर्सिटी के बेथुन कॉलेज से संस्कृत में ऑनर्स ग्रेजुएशन की थी । वह ब्रिटिश इंडिया की पहली महिला थी जिन्होंने ग्रेजुएशन की थी । 1894 में उन्होंने केदारनाथ रॉय से शादी की । कामिनी रॉय ने अपने पिता के पुस्तक-संग्रह से बहुत कुछ सीखा और वे पुस्तकालय का बड़े पैमाने पर उपयोग करती थीं । जैसे ही कामिनी रॉय की शिक्षा पूरी हुई उसके बाद उसी विश्वविद्यालय में उन्हें पढ़ाने का मौका मिला । उन्होंने महिला अधिकारियों से जुड़ी कविताएं लिखना शुरू किया । इसी के साथ उनकी पहचान का दायरा बढ़ा । कामिनी अपनी एक सहपाठी, अबला बोस से काफी प्रभावित थी । उनसे मिली प्रेरणा से ही उन्होंने नारीवाद का बीड़ा उठाया । कलकत्ता के एक बालिका विद्यालय में दिए गए संबोधन में उन्होंने घोषणा की कि महिलाओं की शिक्षा का उद्देश्य उनके सर्वांगीण विकास में योगदान देना और उनकी क्षमता को पूरा करना है । इसके बाद उन्होंने समाज सेवा का कार्य शुरू किया और महिलाओं के अधिकारों के लिए अपना जीवन समर्पित करने का फैसला किया ।

लेखन और नारीवाद : उनका लेखन सरल और सुरुचिपूर्ण था । उन्होंने 1889 में छन्दों का पहला संग्रह आलो छैया और उसके बाद दो और किताबें प्रकाशित कीं, लेकिन फिर उनकी शादी और मातृत्व के बाद कई सालों तक लेखन से विराम लिया । वह उस जमानें में एक नारीवादी थी जब एक महिला के लिए शिक्षित होना वर्जित था ।

महिलाओं को वोट का अधिकार : 1909 में उनके पति केदारनाथ रॉय का निधन हो गया । पति के देहांत के बाद वह पूरी तरह से महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई में जुट गई । कामिनी ने अपनी कविताओं के जरिए महिलाओं को उनके अधिकारियों के लिए जागरुक किया । इसी का साथ महिलाओ को मतदान का अधिकार दिलाने के लिए उन्होंने एक लंबा आंदोलन चलाया ।

1921 में, वह कुमुदिनी मित्र (बसु) और बंगीय नारी समाज की मृणालिनी सेन के साथ, महिलाओं के मताधिकार के लिए लड़ने वाली नेताओं में से एक थीं । 1925 में महिलाओं को सीमित मताधिकार दिया गया और 1926 में उनके द्वारा किए गए संघर्ष से पहली बार बंगाली महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया । वह महिला श्रम जांच आयोग (1922–23) की सदस्य रही थीं । समाज सेवा करने के साथ ही उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलनों में भी भाग लिया । 1883 में वायसराय लॉर्ड रिपन के कार्यकाल के वक्त इल्बर्ट बिल गया, जिसके अनुसार, भारतीय न्यायाधीशों को ऐसे मामलों की सुनवाई करने का अधिकार दिया गया, जिनमें यूरोपीय नागरिक शामिल होते थे । यूरोपीय समुदाय ने इसका विरोध किया था लेकिन भारतीयों ने इसका समर्थन किया उन्ही में से कामिनी रॉय भी एक थीं ।

मान और ख्याति : कामिनी राय अन्य लेखकों और कवियों को रास्ते से हटकर प्रोत्साहित किया । 1923 में, उन्होंने बारीसाल का दौरा किया और सूफिया कमाल, एक युवा लड़की को लेखन जारी रखने के लिए को प्रोत्साहित किया । वह 1930 में बांग्ला साहित्य सम्मेलन की अध्यक्ष थीं और 1932-33 में बंगीय साहित्य परिषद की उपाध्यक्ष थीं। वह कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर और संस्कृत साहित्य से प्रभावित थीं । कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें जगतारिणी स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया। अपने बाद के जीवन में, वह कुछ वर्षों तक हजारीबाग में रहीं । उस छोटे से शहर में, वह अक्सर महेश चन्द्र घोष और धीरेंद्रनाथ चौधरी जैसे विद्वानों के साथ साहित्यिक और अन्य विषयों पर चर्चा करती थे । अंततः 27 सितंबर 1933 को कामिनी रॉय, हमेशा-हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह गईं ।




Google Doodle: Celebrating Bengali poet and activist Kamini Roy - YouTube

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