अर्थों को सार्थकता दे दें

14 अक्तूबर 2019   |  कात्यायनी डॉ पूर्णिमा शर्मा   (4344 बार पढ़ा जा चुका है)

अर्थों को सार्थकता दे दें

अर्थों को सार्थकता दे दें

शब्दों के उदास होने पर अर्थ स्वयं पगला जाते हैं |

आओ शब्दों को बहला दें, अर्थों को सार्थकता दे दें ||

दिल का दीपक यदि जल जाए, जीवन भर प्रकाश फैलाए

और दिये की जलती लौ में दर्द कहीं फिर नज़र न आए |

स्नेह तनिक सा बढ़ जाए तो दर्द कहीं पर छिप जाते हैं

आओ बाती को उकसा दें, प्रेममयी आभा फैला दें ||

शूलमध्य कुछ पुष्प खिलें तो उपवन का यौवन बढ़ जाए

और अनगिनत मस्त तितलियाँ उसके आस पास मंडराएँ |

होकर उनसे आकर्षित, कुछ भ्रमर वहाँ फिर आ जाते हैं

आओ उनका मिलन करा दें, स्नेह का कुछ सौरभ महका दें ||

बहते आँसू से लिख डाली जिसने अपनेपन की गीता

कैसे कह सकते हो उसको, वह है अपनेपन से रीता ?

होता है पीड़ित जब मन, कुछ गीत अधर पर आ जाते हैं

आओ, जिनको ढूँढा है, उन गीतों को भी कुछ चहका दें ||

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