आखिर ऐसा क्यों?

18 अक्तूबर 2019   |  व्यंजना आनंद   (472 बार पढ़ा जा चुका है)

🙏🏻आखिर ऐसा क्यों? 🙏🏻

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अचानक से मेरे मन मस्तिष्क पर वह दृश्य नाच गया।घर के चौतरे पर एक घूँटे से बंधी थी वह लाचार माँ। उनकी हृदय को झकझोर देने वाली आवाज ।अब भी रौंगटे खड़े हो जाते हैं उन दर्दनाक दृश्य को याद कर ।उन दिनों मैं छोटी बच्ची थी ,दर्द हुआ था पर समझ न पाई थी ।आखिर वह क्या था? क्या कोई इतना निर्दयी हो सकता हैं ?

हमेंशा से यह प्रश्न मेरे मन में मुझे आहत देता था। अचानक से एक दिन उनके सुपुत्र जी से मेरी मुलाकात हो गई ।दुर्भाग्य से मैं उन्हें ताऊजी कहती थी ।मैं उनसे पूछ बैठी ।क्या हाल है ताऊजी ।उन्होंने कहा कि एक तो लाड़ेसर हुआ बूढ़ापे में ।वो भी कोई काम का नहीं ।दिन भर अपनी पत्नी के साथ हा-हा-हि-हि करता रहता है पर पूछने तक नहीं आता बाबूजी खाना खाएं हैं कि नहीं ।तेरी ताई की तबियत भी बहुत खराब रहती है ................... और अपना बहुत दुःखडा सुनाने लगे।

मैं यह कह कर वहां से चली गईं -सब ईश्वर की मर्जी है कोई कुछ नहीं कर सकता।।।।

बस कहानी खत्म होती है, ऐसा बिलकुल नहीं है।

यही जीवन चक्र है प्यारों ।हर कर्म का प्रतिकर्म हमें भोगना ही है ।उन्होंने अपनी लकवा से ग्रसित माँ को खूँटे से बाँध कर एक छोटी सी कटोरी में दाल चावल सान कर दे दिया करते थे। दिन भर वो चिखती -चिल्लाती रहती थी ,जब उन पर कीड़े चलते थे..............।आह! कितना भयावह दृश्य ..........।

काल का यह खेल देख ।

प्रकृति की लीला अनेक ।

नहीं छोड़ती वो किसी को ,

प्रकृति दी तुम्हें फेक।।


मत कर कुछ ऐसा जिसका परिणाम बहुत दर्दनाक हो।जो हम करते हैं आपकी संतानें भी उसे देखती है।

इन्सानियत के नाते नहीं तो खुद की खातिर अब तो संभल जाओ।

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व्यंजना आनंद ✍

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