मैं किसी से कम थोड़े ही हूँ.

18 अक्तूबर 2019   |  शालिनी कौशिक एडवोकेट   (2905 बार पढ़ा जा चुका है)


दिखावा और औरतें आज के समय में एक दूसरे के पर्याय बने हुए हैं. थे तो पहले से ही, पर आज कुछ ज्यादा ही हो गए हैं और ऐसा नहीं है कि ऐसा मैं किसी व्यक्तिगत चिढ़ की वजह से कह रही हूँ बल्कि मैंने आज की औरतों को देखा है और महसूस किया है कि महज दिखावे के लिए ये अपनी सारी जिंदगी तबाह कर लेती हैं.

अभी कल ही करवा चौथ का त्यौहार मनाया गया, त्यौहार कल था पर तैयारियां पिछले 10 दिनों से शुरू थी, ठीक मुसलमान औरतों की तरह, जैसे मुसलमान औरतें ईद के मौके पर घर के काम के समान, पहनने ओढ़ने के कपड़े, चप्पल, श्रंगार के समान आदि सभी कुछ खरीदने में पैसा जाया करती फिरती हैं जैसे घर में सब कुछ खत्म ही हो गया हो ठीक वैसे ही अब हिन्दू औरतें भी करवा चौथ पर चूड़ी श्रंगार की दुकानों पर ऐसे खड़ी रहती हैं जैसे अब तक तो इन चीजों के बगैर रह रही थी और इस सब का कारण केवल इतना है कि पडोस वाली ले रही है तो हम ही पीछे क्यूँ रहें भले ही पति की मेहनत की कमाई को ही लुटाना पड़ जाए.

ऐसा ही करवा चौथ के व्रत के अनुष्ठान में हो रहा है, मम्मी जब करवा चौथ का व्रत करती थी तब वे बाजार से एक करवा मंगाती थी और करवा पानी से भरकर मंदिर में रखती थीं साथ ही एक लाल चूड़ी का डिब्बा मंगाती थी, दिन भर भूखी रहकर शाम को करवा चौथ व्रत की कथा हमें सुनाती थी और वह कहानी यह होती थी. करवा चौथ की कहानी के अनुसार -

"सबसे प्रचलित कथा

एक ब्राह्मण के सात पुत्र थे और वीरावती नाम की इकलौती पुत्री थी। सात भाइयों की अकेली बहन होने के कारण वीरावती सभी भाइयों की लाडली थी और उसे सभी भाई जान से बढ़कर प्रेम करते थे. कुछ समय बाद वीरावती का विवाह किसी ब्राह्मण युवक से हो गया। विवाह के बाद वीरावती मायके आई और फिर उसने अपनी भाभियों के साथ करवाचौथ का व्रत रखा लेकिन शाम होते-होते वह भूख से व्याकुल हो उठी। सभी भाई खाना खाने बैठे और अपनी बहन से भी खाने का आग्रह करने लगे, लेकिन बहन ने बताया कि उसका आज करवा चौथ का निर्जल व्रत है और वह खाना सिर्फ चंद्रमा को देखकर उसे अर्घ्‍य देकर ही खा सकती है। लेकिन चंद्रमा अभी तक नहीं निकला है, इसलिए वह भूख-प्यास से व्याकुल हो उठी है।

वीरावती की ये हालत उसके भाइयों से देखी नहीं गई और फिर एक भाई ने पीपल के पेड़ पर एक दीपक जलाकर चलनी की ओट में रख देता है। दूर से देखने पर वह ऐसा लगा की चांद निकल आया है। फिर एक भाई ने आकर वीरावती को कहा कि चांद निकल आया है, तुम उसे अर्घ्य देने के बाद भोजन कर सकती हो। बहन खुशी के मारे सीढ़ियों पर चढ़कर चांद को देखा और उसे अर्घ्‍य देकर खाना खाने बैठ गई।उसने जैसे ही पहला टुकड़ा मुंह में डाला है तो उसे छींक आ गई। दूसरा टुकड़ा डाला तो उसमें बाल निकल आया। इसके बाद उसने जैसे ही तीसरा टुकड़ा मुंह में डालने की कोशिश की तो उसके पति की मृत्यु का समाचार उसे मिल गया।

उसकी भाभी उसे सच्चाई से अवगत कराती है कि उसके साथ ऐसा क्यों हुआ। करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता उससे नाराज हो गए हैं। एक बार इंद्र देव की पत्नी इंद्राणी करवाचौथ के दिन धरती पर आईं और वीरावती उनके पास गई और अपने पति की रक्षा के लिए प्रार्थना की। देवी इंद्राणी ने वीरावती को पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से करवाचौथ का व्रत करने के लिए कहा। इस बार वीरावती पूरी श्रद्धा से करवाचौथ का व्रत रखा। उसकी श्रद्धा और भक्ति देख कर भगवान प्रसन्न हो गए और उन्होंनें वीरावती सदासुहागन का आशीर्वाद देते हुए उसके पति को जीवित कर दिया। इसके बाद से महिलाओं का करवाचौथ व्रत पर अटूट विश्वास होने लगा।"

कहानी सुनाने के बाद चांद निकलने का इंतजार करती थी और चांद निकलने पर करवे का जल चांद को चढाती थी और उसके बाद आकर अन्न जल ग्रहण करती थी. इस सारे अनुष्ठान में हमने तो कभी यह नहीं देखा कि मम्मी ने पहले चांद को फिर पापा को छलनी से देखा हो या पापा ने आकर मम्मी को जल पिलाकर मम्मी का व्रत खुलवाया हो और ये रिश्ता दोनों के बीच 41 साल तक रहा और उनके रिश्ते में सारी जिंदगी हमने कोई दरार भी नहीं देखी बस इतना है कि आदर्श मिसाल कायम करने वाले उनके इस रिश्ते में कोई दिखावा नहीं था जो कि आज के प्यार के दिखावे की नींव पर टिके आधुनिक औरतों के रिश्तों में मेकअप की परतों के रूप में बसा हुआ है. व्यस्तता की इस दुनिया में पति अपनी गाड़ी, मोटर साइकिल और साइकिल, जो भी रखते हैं पर अपना समय निकाल कर पत्नी को उसकी फालतू की ज़रूरत के लिए शहर के बाजार में इसलिए लिए फिरते हैं कि अगर घर का सुकून देखना है तो थोड़ा समय थोड़ा पैसा खर्च कर ही दो नहीं तो घरवाली तेरे लिए व्रत ही क्या रखेगी बल्कि तुझे ही भूखे पेट रहने को मज़बूर कर देगी.

शालिनी कौशिक एडवोकेट

(कौशल)


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एडवोकेट महोदया ,
आपके लेख का शीर्षक व आपका एडवोकेट होना पढ़ा तो लगा कि लेख में कुछ नया मिलेगा -महिलाओं के बारे में. परन्तु केवल थोड़ा सा दिखावे पर लिख कर अपने भी वही पुरातन और "क्षमा करें" दकियानूसी कहानी का और प्रचार कर दिया.
सीढ़ी बात है की करवा चौथ महिलाओं का शौक और उल्लास का पर्व बन गया है. ठीक है इस बहाने शायद पति पत्नी एक दिन के लिए अधिक प्रेम महसूस करते हैं तो कोई बुराई नहीं है. उल्लास के पर्व भी आवश्यक हैं. लेकिन इसे पारम्परिक जामा फ़ालतू में न पहनाया जाए.
वीरेंद्र

उल्लास के पर्व अलग से भी मनाए जा सकते हैं ज़रूरी नहीं है कि इन त्योहारों का परंपरागत रूप पलट दिया जाए, वैसे भी आज की पीढ़ी नाटक बहुत करती है और इसी नाटक का परिणाम है कि माँ बाप वृद्धाश्रम मे रह रहे हैं.

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