बोझ

18 अक्तूबर 2019   |  कृष्ण मनु   (402 बार पढ़ा जा चुका है)


लघुकथा


बोझ


क्या पुरूष, क्या स्त्री, क्या बच्चे , सब के सब आधुनिकता के घोड़े पर सवार फैशन की दौड़ में भाग रहे थे और वह किसी उजबक की तरह ताक रहा था । गाँव से आया वह पढा लिखा आदमी, भूल से , एक भव्य माल में घुस आया था और अब ठगा-सा खड़ा था।


उसकी नजर एक आदमी पर पड़ी जो एक स्टील के बेंच पर बैठा था। उसके पास किताबों का एक बण्डल पड़ा था।


-ओह, एक तो दिखा अपना-सा। उसकी वेशभूषा देखकर वह आश्वस्त हुआ। वह उधर बढ़ गया। पास आने पर उसने अभिवादन किया- "आप शायद मेरी तरह पुस्तक प्रेमी हैं। हिन्दी से भी आपका लगाव है। "


बेंच पर बैठा आदमी ऊबा हुआ-सा उसकी तरफ नफरत भरी निगाहों से देखा-" भाई, पुस्तक प्रेमी-स्रेमी मैं कुछ नहीं। एक शख़्स मुझे फंसा कर चला गया यह कहते हुए कि इस बण्डल को जरा सँभालना वह अभी आया। पिछले दो घंटे से उसके आने का इंतजार कर रहा हूँ।


वह कुछ समझता कि बेंच वाले आदमी ने कहा-" भैया, मैं उसे ढूंढ कर लाता हूँ , तुम जरा इस बण्डल को देखना।" और वह देखते-देखते ग़ायब हो गया।


पिछले तीन घंटे से वह बैठा इंतजार कर रहा है किसी दूसरे पुस्तक प्रेमी का।#


@कृष्ण मनु

9939315925




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