क्यों खून के रिश्ते से भी गहरी होती है दोस्ती

19 अक्तूबर 2019   |  शिल्पा रोंघे   (497 बार पढ़ा जा चुका है)

क्यों खून के रिश्ते से भी गहरी होती है दोस्ती

बात जब दोस्ती की होती है तो अक्सर हम ये सुनने की मिलता कि हमारा जितना लगाव किसी खून के रिश्ते से भी नहीं होता है उतना एक अनजान शख्स से भी हो जाता है। जी हां हम बात कर रहे है फ्रेंडशिप की। ऐसा ऐसा इसलिए होता है कि हम रिश्ते खुद नहीं चुनते है वो अपने आप ही होते है जाहिर सी बात जब हम दोस्त बनाते है तो कई एक सी चीजे होती है, जैसे रुचि या स्वभाव जो हमें जोड़ती है और लंबे वक्त तक बांधे रखती है।

दोस्त कहीं बन सकते है चाहे स्कूल हो, कॉलेज हो, ऑफिस, आस पड़ोस या किसी प्रोफेशनल इंवेट पर मिले लोग।

आजकल सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर भी हमारे कई दोस्त बन जाते है जिनसे हम शायद मिले होते है और कभी नहीं भी। हालांकि असलियत ये है कि सोशल नेटवर्क पर मिले केवल 10 प्रतिशत लोगो से ही हमारी गहरी दोस्ती की संभावना बनती है।

दोस्ती केवल पार्टी या सेलिब्रेशन करने तक सीमित नहीं होती है, हम ऐसा नहीं कह रहे है कि सेलिब्रेशन नहीं करना चाहिए लेकिन याद रखिए अगर दोस्ती का मकसद सिर्फ यही है तो वो सिर्फ तब तक ही रहती है जब तक अपने दोस्त की ज़रूरतें पूरी कर रहे है। लोग अक्सर कहते है कि उनके दोस्त बदल गए है दोस्त नहीं बदलते है अक्सर हम ही पहचान नहीं पाते कि कौन सचमुच हमारा दोस्त है और कौन नहीं।

ये एक कड़वा सच है कि आप भले ही कितने अच्छे हो अगर सामने वाला आपको दोस्त नहीं समझता है तो ऐसी दोस्ती से दूरी ही भली, सबको खुश रखना आपका काम नहीं है।



सच्चे दोस्त वो होते है जो भले ही आप पर ढेर सारे पैसे ना खर्च करे लेकिन अगर आप भूखे हो तो आधा आपके साथ बांटकर खाए, आपको अपने दिल की बात उनसे कहनी भी ना पड़े और अपने आप समझ जाए, चाहे पूरी दुनिया आपके खिलाफ़ बोले लेकिन वो मजबूती से आपके साथ खड़े रहे। जब आप बीमार हो तब सबसे पहले आपका हाल चाल पूछे। आप अपने जीवन में आगे कैसे बढ़े, कौन सी किताबे पढ़े, कौन सा रंग आप पर सूट करता है ऐसे सलाह भी वो आपको दे डालेंगे जो आपके बहुत काम आएंगी। हां बस हर सलाह को आंख मूंदकर ना माने क्योंकि दोस्त भी इंसान होते है तो उनसे भी सलाह देने में गलती हो सकती है बस ये सोचकर माफ कर दे कि शायद उन्होंने कोई सलाह आपके अच्छे के लिए ही दी होगी।चाहे ऑफिस हो या स्कूल हर जगह आपको कोई ना कोई ऐसा दोस्त ज़रूर मिलता होगा ही।


तो कुलमिलाकर दोस्ती बहारी दिखावे या आडंबर की मोहताज नहीं होती है ये तो बस एक अहसास है जो निस्वार्थ होता है। कृष्ण और सुदामा की दोस्ती की मिसाल लोग यूं ही नहीं देते है। अगर आपको भी ऐसा कोई दोस्त मिल गया है तो उसे संभालकर रखिए जीवनभर के लिए।


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