ज़िंदगी के लिए आपका नज़रिया बदल देंगी ये फ़िल्में

24 अक्तूबर 2019   |  शिल्पा रोंघे   (533 बार पढ़ा जा चुका है)

ज़िंदगी के लिए आपका नज़रिया बदल देंगी ये फ़िल्में


आज हम अपने लेख के ज़रिए उन बॉलीवुड की फ़िल्मों के बारे में बात करेंगे जो कि ज़िंदगी को बिल्कुल अलग तरह से समझने की कोशिश करती है और सोचने पर मजबूर करती है। ये फिल्में यह बात भी समझाने का प्रयास करती है कि जीना किसे कहते है।


आनंद- इस फ़िल्म का नाम ही खुशी देने वाला है। ऋषिकेश मुखर्जी जो कि हल्की फुल्की मनोरंजक और सार्थक फिल्म बनाने के लिए मशहूर है उनकी फिल्म भी आनंद भी इसी श्रेणी में आती है। इस फिल्म का नायक जो कि इस दुनिया में कुछ ही दिन का मेहमान है, ये जानते हुए भी शोक मनाने के बजाए हर पल को खुशी खुशी बिताना चाहता है और अपनी खुशियां औरों के साथ बांटने में यकीन करता है इस फिल्म में कई गीत है जो ज़िंदगी के संतरंगी रंगो को उभारते है, जैसे ज़िंदगी कैसी है पहेली, मैंने तेरे लिए ही सात रंग के सपने चुने” “कहीं दूर जब दिन ढल जाए शायद ही कोई इंसान होगा जिसने ये गीत सुने और पसंद ना किये हो।

आनंद को राजेश खन्ना की सबसे बेहतरीन फिल्म कहा जाए तो गलत नहीं होगा इस फिल्म के डॉयलाग्स भी काफी मशहूर हुए जो ज़िंदगी को सही तरह से परिभाषित करते है।


बाबुमोशाय ज़िंदगी और मौत ऊपरवाले के हाथ में है जहांपनाह। उसे ना तो आप बदल सकते है ना मैं। हम सब रंगमंच की कठपुतलियां है जिनकी डोर ऊपरवाले के हाथ की उंगलियों में बंधी है। कब कौन कैसे उठेगा ये कोई नहीं बता सकता है


इस फिल्म का एक और मशहूर डॉयलॉग है-

बाबुमोशाय ज़िंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं


बावर्ची- ऋषिकेश मुखर्जी की ये फिल्म एक पारिवारिक कॉमेडी है जिसमें संयुक्त परिवार संस्था में होने वाले मतभेदों और घटते पारिवारिक मूल्यों पर चिंता प्रकट की है। इस फिल्म में राजेश खन्ना ने रघु नाम के एक बावर्ची का किरदार अदा किया है जो असल में ये बात छिपाए रखते है कि वो एक प्रोफेसर है वो शांति निवास में रहने वाले लोगों के बीच सचमुच शांति स्थापित कर देते है अपनी पाककला के साथ ही वार्तालाप कला से वो पूरे घर की दिल जीत लेते है अपना मिशन पूरा होने पर निकल पड़ते है वो किसी और घर में शांति लाने के लिए।

इस फिल्म के संवाद ना सिर्फ हंसाने का काम करते है बल्कि प्रेरणादायी भी है-

जिसमें इंसान की भलाई हो वो काम कभी बुरा नहीं होता है

कभी कभी बड़ी खुशियों के इंतज़ार में हम ये छोटे छोटे खुशियों के मौके गंवा देते है


डियर जिंदगी- फिल्म सदमा के गीत रीमेक ऐ ज़िंदगी, लव यू ज़िंदगी जैसे गीत काफी ज़िंदादिल है जो ज़िंदगी को ताजा हवा के झौंके की तरह पेश करते है। युवाओं में होने वाले डिप्रेशन पर प्रकाश डालती ये बॉलीवुड की पहली फ़िल्म है। रिलेशनशिप, करियर, जनरेशन गेप के कारण होने वाले तनाव जो युवा किसी से शेयर नहीं कर पाते है इन मुद्दों को हल्के फुल्के ढंग से उठाया है ताकि दर्शक बोर भी ना हो और उन्हें एक संदेश भी मिले। इस फिल्म में शाहरुख़ ने एक साईकलोजिस्ट का किरदार अदा किया है और आलिया ने कियारा नाम की एक लड़की का किरदार अदा किया है जो अपनी मन की उलझनों को सुलझाने के लिए शाहरुख़ की मदद लेती है।

गौरी शिंदे की इस फिल्म के संवाद भी सोचने पर मजबूर करते है और जिंदगी को एक अलग ही दृष्टिकोण से दिखाने का प्रयास करते है-

कभी कभी हम मुश्किल रास्ता सिर्फ इसलिए चुनते है कि हमें लगता है कि ज़रूरी चीज़े पाने के लिए हमें मुश्किल रास्ता अपनाना चाहिए, अपने आप को पनिश करना बहुत ज़रूरी समझते है, लेकिन क्यों, आसान रास्ता क्यों नहीं चुन सकते है क्या बुराई है उसमें, ख़ासकर के जब हम मुश्किल का सामना करने के लिए तैयार नहीं है


जब हम अपने आप आपको अच्छी तरह समझ लेते है तो दूसरे क्या समझते है तो ये चीज़ मायने नहीं रखती, बिल्कुल भी नहीं


हम इतनी कुर्सिया देखते है, एक लेने से पहले। फिर अपना लाइफ़ पार्टनर चुनने से पहले विकल्प देखने में क्या प्रॉब्लम है


लाइफ़ एक जिगसॉ पज़ल की तरह है, कुछ मेरी तरह के लोग तुम्हें गुम हुए टुकड़े ढूंढने और फिक्स करने में मदद करेंगे लेकिन तुम वो हो जो इसे पूरा कर सकते हो


ज़िंदगी में कोई आदत या पैटर्न बनती दिखे तो उसके बारे में अच्छी तरह से सोच लेना चाहिए जीनियस वह होता है जिसे पता हो कि इस पर कब रोक लगानी है


ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा-

ये बचपन के तीन दोस्तों की कहानी है जिसे ऋतिक रोशन फरहान अख़्तर और अभय देओल ने निभाया है। इन तीनों के अलग अलग स्वभाव और उद्देश्य है ये अपनी ज़िंदगी का मकसद ढूंढने और कमियों को दूर करने के लिए निकल पड़ते है रोड ट्रिप पर। इस फ़िल्म को टमाटर फेस्टिवल, एडवेंचर स्पोर्ट्स के ज़रिए जिंदादिल अंदाज़ में पेश करने का प्रयास किया गया है, साथ युवा मन में रिश्तों, करियर आदि को लेकर उठने वाली असुरक्षा की भावना और उससे निकलने की बात पर प्रकाश डाला गया है।


इस फिल्म के संवाद भी काफी जिंदादिल है-


इंसान का कर्तव्य होता है कोशिश करना। कामयाबी और नाकामयाबी सब उसके हाथ में है


जावेद अख्तर की ये कविता प्रेरणादायी है-


दिलो में तुम अपनी बेताबियां लेके चल रहे हो।

तो तुम ज़िंदा हो तुम।

नजर में ख़्वाबों की बिजलियां लेकर चल रहे हो तो ज़िंदा हो तुम।

तुम एक दरिया के जैसे लहरों में बहना सीखो

हवा के झोंके के जैसे अंदाज़ से रहना सीखो

हर एक लम्हे से तुम मिलो खोले अपनी बाहें

हर एक पल नया समां दिखाएं

जो अपनी आंखों में हैरानियां लेके चल रहे हो तो ज़िंदा हो तुम

दिलो में तुम अपनी बेताबियां लेकर चल रहे हो तो ज़िंदा हो तुम


इमेज सोर्स - बिजएशिया लाईव कॉम


ज़िंदगी के लिए आपका नज़रिया बदल देंगी ये फ़िल्मे

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