आज भी प्रासंगिक है महिला सशक्तिकरण पर बनीं ये फ़िल्में

25 अक्तूबर 2019   |  शिल्पा रोंघे   (489 बार पढ़ा जा चुका है)

आज भी प्रासंगिक है महिला सशक्तिकरण पर बनीं  ये फ़िल्में

जब भी हम महिला सशक्तिकरण की बात करते है तो दामिनी, क्वीन, फैशन, पेज थ्री, पिंक, पिकू, कहानी, नो वन किल्ड जेसिका, इंग्लिश विंग्लिश, मर्दानी, जैसी फ़िल्में का नाम ज़हन में आता है। सचमुच इन फिल्मों में महिलाओं से जुड़े विभिन्न मुद्दों को बड़े ही सशक्त ढंग से उठाया गया है साथ ही ये फिल्में बॉक्स ऑफिस पर भी सफल रही है इन फ़िल्मों के अलावा कुछ ऐसी फ़िल्में भी है जिन्हें महिला प्रधान विषयों पर बनीं सदाबहार फिल्मों का दर्जा दिया जा सकता है जो अपने प्रर्दशन के सालों बाद भी प्रासंगिक है।


अनपढ़- 60 के दशक में रिलीज़ इस फ़िल्म में माला सिन्हा ने लीड रोल निभाया था। इस फ़िल्म में इस मुद्दे को उठाया गया था कि एक लड़की की बिना पढ़ाए लिखाए अगर शादी कर दी जाती है तो उसे ज़िंदगी में कितनी मुसीबतों का सामाना करना पड़ता है। कभी कभी ना उसे अपने पति का प्रेम मिल पाता है ना वो सम्मान जो उसे अपने ससुराल मिलना चाहिए। अगर उसका पति उसे प्रेम करे भी तो उसके जीवित ना रहने के बाद एक स्त्री की क्या दशा हो जाती है इन्हीं मुद्दों के

इर्द गिर्द ये फ़िल्म घुमती है। कुल मिलाकार महिलाओं को शिक्षित करने का संदेश ये फ़िल्म देती है। ये फ़िल्म एक ऐसी महिला के संघर्ष की कहानी है जो विधवा हो जाने के बाद अपनी बेटी का लालन पालन खुद ही करती है और उसे काबिल बनाती है। इस फिल्म का गीत आपकी नज़रों ने समझा प्यार के काबिल मुझे काफी हिट हुआ था


मदर इंडिया- नर्गिस के बेहतरीन अभिनय से सजी ये फिल्म मातृत्व और कर्तव्य के सही मायने समझाती है। इस फिल्म का गीत दुनिया में हम आए है तो जीना ही पड़ेगा कठिनाईयों के बावजूद जीवन जीते रहने का संदेश देता है। इस फिल्म की नायिका अपने पति के जाने के बाद अपने बाल बच्चों को खुद मेहनत करके पालती और पोसती है यहां तक की खेतों में भी काम करती है। सूदखोरी के काल में शोषणपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ उसका एक पुत्र बागी हो जाता है और अपहरण जैसी घटना को अंजाम देने वाला होता है तब एक मां अपने पुत्र प्रेम से बढ़कर नैतिक मूल्यों को चुनती है और अपने ही पुत्र को मार डालती है अंत में खुद को रोने से रोक नहीं पाती है।


आखिर क्यों –स्मिता पाटिल जैसी मंझी हुई अदाकारा के बेहतरीन अभिनय से सजी हुई इस फ़िल्म को महिला सशक्तिकरण की बेहतरीन फिल्मों में गिना जाए तो गलत नहीं होगा इस फिल्म में राकेश रोशन ने स्मिता पाटिल के पति का किरदार अदा किया है जो उसकी ममेरी बहन (टीना मुनीम) के आकर्षण में उन्हें छोड़ देते है और इस फिल्म की नायिका उनके इस फैसले को स्वीकार कर लेती है साथ अपने पति के कहने पर अपनी बच्ची भी वहीं छोड़ जाती है, क्योंकि उनके माता पिता नहीं होते है ऐसे में फिल्म की नायिका को ज़िंदगी में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है और महसूस होता कि समाज में लोग औरत के सम्मान को लेकर बातें तो बहुत करते है लेकिन इज्जत देना नहीं चाहते है, वो कठिन संघर्ष के बाद आत्मनिर्भर भी हो जाती है, लेकिन अपनी बेटी से दूर रहने का गम बर्दाश्त नहीं कर पाती और जीना नहीं चाहती है ऐसे में राजेश खन्ना जो गरीबी की वजह से अपनी मां को खो चुके है उन्हें अपनी जिंदगी की नई शुरूआत करने को कहते है और उन्हें एक कामयाब शख्सियत बनने में मदद करते है और शादी करने की इच्छा जताते है लेकिन वो इंकार कर देती क्योंकि वो एक मां भी है, राजेश खन्ना उनकी इच्छा को स्वीकार कर लेते है और इंतज़ार करना ठीक समझते है, कुछ सालों बाद उनके पहले पति की आर्थिक स्थिती खराब हो जाती है और वो अंजाने में ही स्मिता के पास चले जाते है और अपने उस रवैये के लिए माफी मांगते है जो सिर्फ औरत को स्टेटस सिंबल और आदमी की हर मांग पूरी करने वाली वस्तु मात्र समझता है। तब वो अपनी बेटी की शादी के लिए पैसा जुटाने के लिए उनका कंपनी के लिए काम करने को तैयार हो जाती है ताकि उनकी बेटी की शादी हो सके।

फिल्म के अंत के में टीना मुनीम के उन्हें माफी मिल जाने के सवाल पर राकेश रोशन कहते है कि कुछ पापों का कोई प्रायश्चित नहीं होता है, किसी का दुख किसी का सुख बन जाए तो इससे बड़ी गलत बात कुछ नहीं है। फिल्म के अंत में स्मिता पाटिल और राजेश खन्ना के सफेद हो चुके बालों में दिखाया गया है जिसमें राजेश खन्ना उनसे ये कहते है हुए शादी कर लेते है कि जिस समाज ने उनकी तकलीफों के बारे में कभी नहीं सोचा उनकी परवाह क्यों करना ? इस तरह से ये फिल्म एक सवाल खड़ा करती है कि सारे नियम आखिर एक औरत के लिए ही क्यों ? अचला नागर की बेहतरीन पटकथा और डायलॉग से सजी ये फिल्म सोचने पर मजबूर करती है। इस फिल्म का गीत दुश्मन ना करे दोस्त ने वो काम किया है काफी हिट हुआ था।


निकाह-

ट्रिपल तलाक पर बनीं इस फ़िल्म में बी आर चोपड़ा ने तलाक के महिला मन पर पड़ने वाले प्रभाव को बखूबी दिखाया था। इस फ़िल्म की कहानी भी अचला नागर ने लिखी थी। इस फिल्म में सलमा आगा ने मुख्य भूमिका निभाई थी जिसमें उनकी ज़िंदगी तब भूचाल आ जाता है जब गुस्से में आकार उनके पति (दीपक पाराशर) रोकने के बावजूद उनको तलाक देते है। उनकी शादी कहीं और हो जाती है फिर उनके पहले पति को अपनी गलती का पश्चाताप होता है और वो फिर से उसे अपनाना चाहते है उसके दूसरे पति राज बब्बर भी उसे कहते है कि अगर वो अपने पहले शौहर को अब भी प्यार करती है तो वो उन्हें तलाक देकर मुक्त कर सकते है तब वो कहती है कि वो एक औरत है कोई जायजाद नहीं, वो अपनी दूसरी शादी को तोड़ने से इंकार कर देती है और अपने दूसरे पति के साथ रहने का फैसला करती है। इस तरह एक महिला को भी अपनी ज़िंदगी के फ़ैसले लेने का अधिकार होना चाहिए इस फिल्म के ज़रिए ये संदेश दिया गया। इस फिल्म के गीत काफी सुपरहिट हुए थे।


पुराने ज़माने की ये फिल्में महिला सशक्तिकरण के मामले में मील का पत्थर है जो कि आज भी प्रासंगिक और नई पीढ़ी के लोगों को भी देखना चाहिए।


इमेज सोर्स- टम्बलर.कॉम



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