नुक्कड़ की मुलाकात

30 अक्तूबर 2019   |  महातम मिश्रा   (422 बार पढ़ा जा चुका है)

"नुक्कड़ की मुलाकात"


ये झिनकू भैया भी अजीब किस्म के इंसान है, जब भी मिलते हैं गाँव के नुक्कड़ पर ही मिलते हैं। यहाँ तक तो ठीक है पर मिलते ही किसी न किसी समस्या के जनक बन जाते हैं। लगता है इनकी कुंडली के सारे ग्रह झगड़ालू विरादरी से ताल्लुक रखते हैं। पूजा के लिए दुकान पर अगरबत्ती लेने आये थे आना भी चाहिए, सामान भी खरीदना चाहिए पर अगरबत्ती जलाकर, दाल गलाकर देखने की क्या जरूरत। जो मिला उसी से पूजा-पाठ कर लेते और दाल में मनचाहा छौंका लगा लेते। अगरबत्ती में चमेली जैसा सुगंध है या नहीं, यह पूछना तो उचित नहीं ही है। चंपा ब्रांड की अगरबत्ती में चमेली कहाँ से मिलेगी। लग गई आग, भरी दुकान में और शुरू हो गयी बिना धुँएं की आग को बुझाने की कवायत। मिनटों में यह आग गाँव के कोने-कोने तक पहुंच गई और चंपा के पक्ष में कई वकील बिना फीस लिए पैरवी करने को खड़े हो गए। मानों चंपा उन सबकी अपनी है और चमेली झिनकू भैया की अकेली। वाद, प्रतिवाद काफी मनोरंजक रहा होगा क्योंकि तमाशा देखने वाले खूब तल्लीन होकर संस्कार चालीसा सुन रहे थे कि इतने में मेरा भी वहाँ जाना हुआ।


भीड़ देखकर अनहोनी का जागृत होना सुनिश्चित ही है। मैंने पूछा क्या हुआ भैया, इतना सुनते ही झिनकू भैया को शायद तिनके का सहारा मिल गया और मेरे तरफ लपकते हुए बोले, देखो न क्या जमाना आ गया है। वो अपनी दुकान पर किसी को कुछ भी कह देती है और लोग सच मान लेते हैं। मेरी कोई मान ही नहीं रहा है, ये रही मेरी अगरबत्ती इसमें चंपा की खुश्बू हो तो बताओ। चमेली का नाम लेते ही हंगामा हो गया।


मुझे भी लोगों की चकल्लस देख हँसी आ गई और मैंने भैया को भीड़ से बाहर करते हुए इतना ही कहा, अरे भैया अब सब बनावटी हो गया है, छोड़ दो अगरबत्ती जलाना। बिना मतलब प्रदूषण क्यों बढ़ा रहे हो, तनिक उम्र का ख्याल करो और नुक्कड़ पर कम आया करो।


महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

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