आधुनिक भारत की एकता के सरदार

31 अक्तूबर 2019   |  रमेश कुमार जोगचन्द   (434 बार पढ़ा जा चुका है)

आधुनिक भारत की एकता के सरदार

आज भारतवर्ष सरदार पटेल की 144 वीं जयंती मना रहा है।

भारत को राष्ट्रीय एकता सूत्र में बाधने वाले सरदार वल्लभभाई पटेल को लौह पुरुष भी कहा जाता है उन्होंने भारत की आजादी की लड़ाई में अग्रणी भूमिका निभाई और भारत के आजाद होने पर भारत देश के प्रथम गृहमंत्री के रूप में पदभार ग्रहण किया और अपने साहस भरे निर्णय से पूरे देश को एकता के सूत्र में बाधने का कार्य किया जिनके कारण आज इनके जन्मदिवस 31 अक्टूबर को “राष्ट्रीय एकता दिवस” के रूप में मनाया जाता है।

स्व.पटेल की विचारधारा और पदचिह्नों से आज हम भटक रहे हैं। लौह पुरुष सरदार पटेल के एकता-अखंडता और राष्ट्र को एकसूत्र में बांधने वाले विचारों की बात करने से पहले उनकेे जीवन परिचय को जानना बहुत जरूरी है।

वल्लभ भाई झावर भाई पटेल, भारत के महत्वपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक नेताओं में से एक थे। उन्होंने भारत की आजादी के संघर्ष में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह माना जाता है कि उनका जन्म 31 अक्टूबर सन् 1875 को गुजरात के नडियाद नामक गाँव में हुआ था। अक्सर लोग उन्हें सरदार के नाम से संबोधित किया करते थे।

उन्होंने 22 वर्ष की अवस्था में मैट्रिक की परिक्षा पास की थी। वह अपने आस-पास के लोगों के लिए एक बहुत ही साधारण व्यक्ति थे, परन्तु उनमें एक मजबूत इच्छा शक्ति भी थी। वह एक बैरिस्टर बनना चाहते थे। 36 वर्ष की अवस्था में, वह अपने इस सपने को पूरा करने के लिए इंग्लैंड गए और माध्यमिक धर्मशाला मंदिर में प्रवेश लिया। उन्होंने अपने 36 महीने के कोर्स को सिर्फ 30 महीनों में ही पूरा कर लिया। वह भारत में वापस आने के बाद अहमदाबाद के एक सबसे सफल बैरिस्टर बने।

महात्मा गाँधी के कार्यों व आर्दशों से प्रेरित होकर, वह भी भारत की स्वतंत्रता के लिए किए जा रहे संघर्ष में शामिल हो गए। उन्होंने ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाए गए कर के भुगतान के विरोध में खेड़ा, बारडोली व गुजरात के अन्य क्षेत्रों से किसानों को संगठित किया और गुजरात में एक गैर-हिंसक सविनय अवज्ञा आंदोलन की स्थापना की। वह अपने लक्ष्य में सफल हुए और ब्रिटिश सरकार को उस वर्ष के राजस्व कर के भुगतान को माफ करना पड़ा। इसी के साथ वह गुजरात के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक बन गए। सन् 1920 में वह गुजरात प्रदेश की कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किए गए और सन् 1945 तक इस पद पर कार्यरत रहे। वह गाँधी जी के असहयोग आंदोलन के पूर्णरूप से समर्थक थे और उन्होंने गुजरात में शराब, अस्पृश्यता और जातीय भेदभाव जैसी भावनाओं का जमकर विरोध किया। वह सन् 1922, 1924 और 1927 में अहमदाबाद की नगर पालिका के अध्यक्ष के रूप में चुने गये। जब महात्मा गाँधी जेल में थे, तब उन्होंने भारतीय ध्वज फहराने को प्रतिबंधित करने वाले अंग्रेजों के कानून के खिलाफ सन् 1923 नागपुर में सत्याग्रह आन्दोलन का नेतृत्व भी किया था। सन् 1931 में वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किये गये। वह 1934 और 1937 में कांग्रेस के अखिल भारतीय चुनाव प्रचार में सबसे आगे थे और सन् 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के आयोजन में एक प्रमुख नेता थे। उन्हें भारत छोड़ो आंदोलन में प्रमुख रूप से शामिल होने के कारण पुलिस द्वारा कैद कर लिया गया था और सन् 1945 में जेल से रिहा किया गया।

भारत की स्वतंत्रता के बाद, वह भारत के पहले गृह मंत्री व उप-प्रधान मंत्री रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने पंजाब और दिल्ली में शरणार्थियों के लिए राहत शिविर का आयोजन किया। 565 अर्द्ध-स्वायत्त रियासतों का एकत्रीकरण करके भारत को एकता सूत्र में बांधने का श्रेय भी इनको ही मिला है। पटेल जी, महात्मा गाँधी के साथ पूर्ण रूप से जुड़े हुए थे। महात्मा गाँधी की मृत्यु के बाद से उनकी भी स्थिति बिगड़नी शुरू हो गई थी। गाँधी जी की मृत्यु के दो महीने के भीतर ही 15 दिसंबर 1950 को दिल का दौरा पड़ने के कारण उनका निधन हो गया। वह एक साहसी और दृढ़ निश्चयी व्यक्ति थे। उन्हें’ भारत का लौह पुरुष’ कहना एक सत्य कथन है।

आज भारत में साम्प्रदायिक सौहार्द बिगाड़ रहा है। कुछ लोग सता और राजनीतिक लाभ के लिए लोगों को आपस में धर्म,जाति आदि मुद्दों पर बांटने की कोशिश कर रहें हैं ।

सरदार वल्लभ भाई पटेल के उन आदर्शों और सिद्धांतों की आज तुलना की जाए तो आज हम उनके विचारों से कोसों दूर जा रहें हैं। उनका मानना था कि हमें ऊंच-नीच, अमीर-गरीब, जाति-पंथ के भेदभावों को समाप्त कर देना चाहिए।" लेकिन आज लोग इन विचारों के विपरित जाकर कुछ तुच्छ हरकतें करते हैं जिससे समाज और राष्ट्र के लिए चिंता का विषय है।

उन्होंने सामाजिक ऊंच-नीच , स्वतंत्रता तथा कर्त्तव्यों की बात करते हुए कहा था कि " भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य हैं कि वह अनुभव करे कि उसका देश स्वतन्त्र हैं और देश की स्वतंत्रता की रक्षा करना उसका कर्त्तव्य हैं। अब हर भारतीय को भूल जाना चाहिए कि वह सिख हैं, जाट है या राजपूत। उसे केवल इतना याद रखना चाहिए कि अब वह केवल भारतीय हैं जिसके पास सभी अधिकार हैं, लेकिन उसके कुछ कर्तव्य भी हैं।"

लेकिन हम आज तक उनके इस विचार को सार्थक बनाने में पूर्ण कामयाब नहीं हुए।

देश की एकता और राष्ट्र की अखंडता के लिए उन्होंने मेहनत की थी।

देश की स्वतंत्रता के पश्चात सरदार पटेल उप प्रधानमंत्री के साथ प्रथम गृह, सूचना तथा रियासत विभाग के मंत्री भी थे। सरदार पटेल की महानतम देन थी 562 छोटी-बड़ी रियासतों का भारतीय संघ में विलीनीकरण करके भारतीय एकता का निर्माण करना। विश्व के इतिहास में एक भी व्यक्ति ऐसा न हुआ जिसने इतनी बड़ी संख्या में राज्यों का एकीकरण करने का साहस किया हो। 5 जुलाई 1947 को एक रियासत विभाग की स्थापना की गई थी। एक बार उन्होंने सुना कि बस्तर की रियासत में कच्चे सोने का बड़ा भारी क्षेत्र है और इस भूमि को दीर्घकालिक पट्टे पर हैदराबाद की निजाम सरकार खरीदना चाहती है। उसी दिन वे परेशान हो उठे। उन्होंने अपना एक थैला उठाया, वी.पी. मेनन को साथ लिया और चल पड़े। वे उड़ीसा पहुंचे, वहां के 23 राजाओं से कहा, "कुएं के मेढक मत बनो, महासागर में आ जाओ।" उड़ीसा के लोगों की सदियों पुरानी इच्छा कुछ ही घंटों में पूरी हो गई। फिर नागपुर पहुंचे, यहां के 38 राजाओं से मिले। इन्हें सैल्यूट स्टेट कहा जाता था, यानी जब कोई इनसे मिलने जाता तो तोप छोड़कर सलामी दी जाती थी। पटेल ने इन राज्यों की बादशाहत को आखिरी सलामी दी। इसी तरह वे काठियावाड़ पहुंचे। वहां 250 रियासतें थी। कुछ तो केवल 20-20 गांव की रियासतें थीं। सबका एकीकरण किया। एक शाम मुम्बई पहुंचे। आसपास के राजाओं से बातचीत की और उनकी राजसत्ता अपने थैले में डालकर चल दिए। पटेल पंजाब गये। पटियाला का खजाना देखा तो खाली था। फरीदकोट के राजा ने कुछ आनाकानी की। सरदार पटेल ने फरीदकोट के नक्शे पर अपनी लाल पैंसिल घुमाते हुए केवल इतना पूछा कि "क्या मर्जी है?" राजा कांप उठा। आखिर 15 अगस्त 1947 तक केवल तीन रियासतें-कश्मीर, जूनागढ़ और हैदराबाद छोड़कर उस लौह पुरुष ने सभी रियासतों को भारत में मिला दिया। इन तीन रियासतों में भी जूनागढ़ को 9 नवम्बर 1947 को मिला लिया गया तथा जूनागढ़ का नवाब पाकिस्तान भाग गया। 13 नवम्बर को सरदार पटेल ने सोमनाथ के भग्न मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया, जो पंडित नेहरू के तीव्र विरोध के पश्चात भी बना। 1948 में हैदराबाद भी केवल 4 दिन की पुलिस कार्रवाई द्वारा मिला लिया गया। न कोई बम चला, न कोई क्रांति हुई, जैसा कि डराया जा रहा था।

जहां तक कश्मीर रियासत का प्रश्न है इसे पंडित नेहरू ने स्वयं अपने अधिकार में लिया हुआ था, परंतु यह सत्य है कि सरदार पटेल कश्मीर में जनमत संग्रह तथा कश्मीर के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले जाने पर बेहद क्षुब्ध थे। नि:संदेह सरदार पटेल द्वारा यह 562 रियासतों का एकीकरण विश्व इतिहास का एक आश्चर्य था। भारत की यह रक्तहीन क्रांति थी। गांधी ने सरदार पटेल को इन रियासतों के बारे में लिखा था, "रियासतों की समस्या इतनी जटिल थी जिसे केवल तुम ही हल कर सकते थे।"

यद्यपि विदेश विभाग पं॰ नेहरू का कार्यक्षेत्र था, परंतु कई बार उप प्रधानमंत्री होने के नाते कैबिनेट की विदेश विभाग समिति में उनका जाना होता था। उनकी दूरदर्शिता का लाभ यदि उस समय लिया जाता तो अनेक वर्तमान समस्याओं का जन्म न होता। 1950 में पंडित नेहरू को लिखे एक पत्र में पटेल ने चीन तथा उसकी तिब्बत के प्रति नीति से सावधान किया था और चीन का रवैया कपटपूर्ण तथा विश्वासघाती बतलाया था। अपने पत्र में चीन को अपना दुश्मन, उसके व्यवहार को अभद्रतापूर्ण और चीन के पत्रों की भाषा को किसी दोस्त की नहीं, भावी शत्रु की भाषा कहा था। उन्होंने यह भी लिखा था कि तिब्बत पर चीन का कब्जा नई समस्याओं को जन्म देगा। 1950 में नेपाल के संदर्भ में लिखे पत्रों से भी पं॰ नेहरू सहमत न थे। 1950 में ही गोवा की स्वतंत्रता के संबंध में चली दो घंटे की कैबिनेट बैठक में लम्बी वार्ता सुनने के पश्चात सरदार पटेल ने केवल इतना कहा "क्या हम गोवा जाएंगे, केवल दो घंटे की बात है।" नेहरू इससे बड़े नाराज हुए थे। यदि पटेल की बात मानी गई होती तो 1961 तक गोवा की स्वतंत्रता की प्रतीक्षा न करनी पड़ती।

गृहमंत्री के रूप में वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भारतीय नागरिक सेवाओं (आई.सी.एस.) का भारतीयकरण कर इन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवाएं (आई.ए.एस.) बनाया। अंग्रेजों की सेवा करने वालों में विश्वास भरकर उन्हें राजभक्ति से देशभक्ति की ओर मोड़ा। यदि सरदार पटेल कुछ वर्ष जीवित रहते तो संभवत: नौकरशाही का पूर्ण कायाकल्प हो जाता।

सरदार पटेल जहां पाकिस्तान की छद्म व चालाकी पूर्ण चालों से सतर्क थे वहीं देश के विघटनकारी तत्वों से भी सावधान करते थे। विशेषकर वे भारत में मुस्लिम लीग तथा कम्युनिस्टों की विभेदकारी तथा रूस के प्रति उनकी भक्ति से सजग थे। अनेक विद्वानों का कथन है कि सरदार पटेल बिस्मार्क की तरह थे। लेकिन लंदन के टाइम्स ने लिखा था "बिस्मार्क की सफलताएं पटेल के सामने महत्वहीन रह जाती हैं। यदि पटेल के कहने पर चलते तो कश्मीर, चीन, तिब्बत व नेपाल के हालात आज जैसे न होते। पटेल सही मायनों में मनु के शासन की कल्पना थे। उनमें कौटिल्य की कूटनीतिज्ञता तथा महाराज शिवाजी की दूरदर्शिता थी। वे केवल सरदार ही नहीं बल्कि भारतीयों के हृदय के सरदार थे। आज भारत में साम्प्रदायिक सौहार्द्र के बिगड़ते हालातों में सता पर काबिज सभी बुद्धिजीवियों को पटेल के पदचिह्नों पर चलना चाहिए, क्योंकि पटेल धर्म,जाति और संप्रदाय से तटस्थ और निष्पक्ष होकर मानवता तथा राष्ट्र हित की भावना रखते थे।



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अलोक सिन्हा
01 नवम्बर 2019

अच्छा लेख है |

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