मृत्यु का भय :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

16 नवम्बर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (433 बार पढ़ा जा चुका है)

मृत्यु का भय :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*परमात्मा की बनाई यह सृष्टि निरन्तर क्षरणशील है | एक दिन सबका ही अन्त निश्चित है | सृष्टि का विकास हुआ तो एक दिन महाप्रलय के रूप में इसका विनाश भी हो जाना है , सूर्य प्रात:काल उदय होता है तो एक निश्चित समय पर अस्त भी हो जाता है | उसी प्रकार इस सृष्टि में जितने भी जड़ - चेतन हैं सबका ही एक दिन विनाश हो जाना है | मनुष्य इस धराधाम पर जन्म लेता है तो उसकी मृत्यु भी निश्चित है और यह तथ्य प्रत्येक व्यक्ति जानता भी है कि एक दिन ऐसा आयेगा जब अपना परिवार , समाज और इस धराधाम का त्याग करके चले जाना है | यद्यपि मृत्यु ही इस सृष्टि का सत्य है और यह निश्चित है परंतु फिर भी यह अनिश्चित है क्योंकि जहाँ महाप्रलय का समय है कि चतुर्युगी के व्यतीत हो जाने के बाद ही होगी , सूर्यास्त का भी समय निश्चित है कि दिन बीज जाने के बाद ही होगा परंतु मनुष्य की मृत्यु कब होगी यह कदापि नहीं निश्चित है | यह सभी लोग जानते भी हैं कि इस शरीर का कोई ठिकाना नहीं है कि कब साथ छोड़ दे | इतना जानने के बाद भी मनुष्य मरना नहीं चाहता और मृत्यु के नाम से ही काँप जाता है | मनुष्य मृत्यु से भयभीत क्यों रहता है ? इसके कारण पर विचार किया जाय तो यही परिणाम निकलता है कि भय किसी वस्तु से अलग हो जाने के विचार से ही प्रकट होता है | मनुष्य को कुछ भी छूट जाने या खो जाने का भय बना रहता है जैसे धन खो जाने का भय , परिवार छूट जाने का भय | यह भय मनुष्य में अज्ञान एवं अविद्या के कारण ही उत्पन्न होता है , अविद्या का प्रबल रूप है मोह | शरीर को अपना समझने का मोह ही मृत्यु से भय का मुख्य कारण है | जहाँ त्याग है वहाँ कभी भय नहीं हो सकता | वैसे तो मनुष्य को सबसे अधिक मृत्यु का ही भय होता है परमतु इसके अतिरिक्त अनेक प्रकार के भय मनुष्य को जीवन भर घेरे रहते हैं | परन्तु जहाँ त्याग की भावना होती है वहाँ कभी भी भय नहीं होता है जिस प्रकार मनुष्य कपड़ों के पुराने हो जाने पर उन्हें स्वेच्छा से त्याग देता है तो उसको भय नहीं होता उसी प्रकार जिसने भी इस शरीर से मोह त्याग दिया , जिसने शरीर की अपेक्षा आत्मा को महत्त्व दिया है उसे कभी भी मृत्यु से भय नहीं लगता है |*


*आज संसार में आधुनिकता के साथ मोह की प्रबलता भी बढ़ी है | मोह का शमन करने वाले साधनों आध्यात्म एवं सतसंग से आज का मनुष्य दूर होता चला जा रहा है | आध्यात्म एवं सतसंग मनुष्य को इस शरीर के प्रति मोह एवं अविद्या को नष्ट करने में सक्षम है परंतु मनुष्य ने आज अपनी व्यस्तताओं का हवाला देकर इनसे दूरी बना ली है | आज मनुष्य अपने जीवन में पल - प्रतिपल हो रहे परिवर्तनों में इतना व्यस्त है कि उसे अपनी मृत्यु रा ध्यान ही नहीं रहता , सांसारिक आकर्षणों में उलझा आज का मनुष्य यह भुलाये बैठा है कि हमें मरना भी है | यही कारण है कि जब मृत्यु उपस्थित होती है तो मनुष्य भूतकाल की बातें सोंचकर उद्वेलित होकर भयभीत होने लगता है | हमारे शास्त्रों में मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के साधन भी बताये हैं | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" अब तक सद्गुरुओं से प्राप्त ज्ञानामृत के आधार पर यह बताना चाहता हूँ कि मृत्यु पर विजय तभी प्राप्त की जा सकती है जब मृत्यु से घबराहट नहीं वरन् प्रसन्नता से उसका स्वागत किया जाय | दु:खी मन से इस आनंददायक संसार को न छोड़ा जाय बल्कि अन्तिम समय में जीवनमुक्त अवस्था का परिचय देते हुए मृत्यु को स्वीकार किया जाय और यह तभी सम्भव है जब मनुष्य यह समझ ले कि शरीर के रूप में भिन्न - भिन्न स्वरूप धारण करने वाली आत्मा अमर है और शरीर नाशवान है | जिस दिन मनुष्य इस सत्य को स्वीकार कर लेगा उसी दिन वह मृत्युंजय हो जायेगा | मनुष्य का मृत्यु से भयभीत होने का एकमात्र कारण उसकी अज्ञानता है | मनुष्य यह जानते हुए भी नहीं मानना चाहता कि इस संसार में जो भी दृश्यमान पदार्थ है उन सबका विनाश निश्चित है | इन्हीं पदार्थों में से एक हमारा शरीर भी है और इसकी भी मृत्यु निश्चित है | जिस दिन मनुष्य को यह ज्ञान हो जायेगा उसी दिन वह मृत्यु रूपी भस़यानकता से भयमुक्त हो जायेगा |*


*मृत्यु के भय से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य को गीता का स्वाध्याय अवश्य करना चाहिए | भगवान के मुखारविन्द से उच्चारित यह ग्रन्थ मनुष्य को मृत्यु भय से छुटकारा दिलाने में सक्षम है |*

अगला लेख: पंचकोसी परिक्रमा का महत्त्व :-- आचार्य अर्जुन तिवारी



शब्दनगरी पर हो रही अन्य चर्चायें
21 नवम्बर 2019
*सनातन धर्म में सोलह संस्कारों का वर्णन मिलता है इन संस्कारों में एक महत्वपूर्ण संस्कार है विवाह संस्कार | मनुष्य योनि में जन्म लेने के बाद वैवाहिक संस्कार महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि सनातन धर्म में बताए गए चार आश्रम में सबसे महत्वपूर्ण है गृहस्थाश्रम | गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिए विवाह संस
21 नवम्बर 2019
03 नवम्बर 2019
*इस संसार में मनुष्य ने अपनी कार्यकुशलता से अनहोनी को भी होनी करके दिखाया है | अपनी समझ से कोई भी ऐसा कार्य न बचा होगा जो मनुष्य ने कपने का प्रयास न किया हो | संसार में समय के साथ बड़े से बड़े घाव , गहरे से गहरे गड्ढे भी भर जाते हैं | समुद्र के विषय में बाबा गोस्वामी तुलसीदास जी ने मानस में लिखा है
03 नवम्बर 2019
20 नवम्बर 2019
अध्यात्म और मनश्चिकित्साअर्जुन ने जब दोनों सेनाओं में अपने ही प्रियजनों को आमनेसामने खड़े देखा तो उनकी मृत्यु से भयाक्रान्त हो श्री कृष्ण की शरण पहुँचे “शिष्यस्तेऽहंशाधि मां त्वां प्रपन्नम् |” तब भगवान ने सर्वप्रथम एक कुशल वैद्य औरमनोवैज्ञानिक की भाँति उनके मन से मृत्यु का भय दूर किया | मृत्यु को अवश
20 नवम्बर 2019
17 नवम्बर 2019
*चौरासी लाख योनियों में मानव जीवन को देव दुर्लभ कहा गया है | मनुष्य जन्म बड़े भाग्य से मिलता है क्योंकि मनुष्य को छोड़कर अन्य सभी योनियाँ भोग योनि होती हैं | इस संसार में दो प्रकार की योनियों का वर्णन मिलता है एक भोगयोनि दूसरी कर्मियोनि | मनुष्य के अतिरिक्त अन्य योनियों को भोग योनि कहा गया है क्योंक
17 नवम्बर 2019
02 नवम्बर 2019
*प्रत्येक शरीर में एक आत्मा निवास करती है जिस प्रकार भगवान शिव के हाथ में सुशोभित त्रिशूल में ती शूल होते हैं उसी प्रकार आत्मा की तुलना भी एक त्रिशूल से की जा सकती है, जिसमें तीन भाग होते हैं- मन, बुद्धि और संस्कार | इनको त्रिदेव भी कहा जा सकता है | मन सृजनकर्ता ब्रह्मा , बुद्धि संहारकारी शिव तथा सं
02 नवम्बर 2019
21 नवम्बर 2019
*परमात्मा के द्वारा मैथुनी सृष्टि का विस्तार करके इसे गतिशील किया गया | मानव जीवन में बताये गये सोलह संस्कारों में प्रमुख है विवाह संस्कार | विवाह संस्कार सम्पन्न होने के बाद पति - पत्नी एक नया जीवन प्रारम्भ करके सृष्टि में अपना योगदान करते हैं | सनातन धर्ण के सभी संस्कार स्वयं में अद्भुत व दिव्य रह
21 नवम्बर 2019
07 नवम्बर 2019
🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸🌞🌸 ‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼ 🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻☘🌻 *हमारे देश में हिंदू संस्कृति में बताए गए बारहों महीने में कार्तिक मास का विशेष महत्व है , इसे दामोदर मास अर्थात भगवान विष्णु के प्रति समर्पित बताया गया है | कार्तिक मास का क्या महत्व है इसका वर
07 नवम्बर 2019
16 नवम्बर 2019
*इस धराधाम पर जन्म लेने के बाद मनुष्य येन - केन प्रकारेण ईश्वर प्राप्ति का उपाय किया करता है | ईश्वर का प्रेम पिराप्त करने के लिए मनुष्य पूजा , अनुष्ठान , मन्दिरों में देवदर्शन तथा अनेक तीर्थों का भ्रमण किया करता है जबकि भगवान को कहीं भी ढूंढ़ने की आवश्यकता नहीं है मानव हृदय में तो ईश्वर का वास है ह
16 नवम्बर 2019
09 नवम्बर 2019
*सनातन धर्म में मानव जीवन को चार आश्रमों में बांटा गया है , जिनमें से सर्वश्रेष्ठ आश्रम गृहस्थाश्रम को बताया गया है , क्योंकि गृहस्थ आश्रम का पालन किए बिना मनुष्य अन्य तीन आश्रम के विषय में कल्पना भी नहीं कर सकता | मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है समाज का निर्माण परिवार से होता है | व्यक्ति के जीवन में
09 नवम्बर 2019
12 नवम्बर 2019
*आदिकाल से ही से ही इस धराधाम पर अनेकों योद्धा ऐसे हुए हैं जिन्होंने अपनी शक्तियों का संचय करके एक विशाल जनसमूह को अपने वशीभूत किया एवं उन्हीं के माध्यम से मानवता के विरुद्ध कृत्य करना प्रारंभ किया | पूर्वकाल में ऐसे लोगों को राक्षस या निशाचर कहा जाता था | इनके अनेक अनुयायी ऐसे भी होते थे जिनको यह न
12 नवम्बर 2019
03 नवम्बर 2019
*भारतीय परंपरा में आदिकाल से एक शब्द प्रचलन में रहा है साधना | हमारे महापुरूषों ने अपने जीवन काल में अनेकों प्रकार की साधनायें की हैं | अनेकों प्रकार की साधनाएं हमारे भारतीय सनातन के धर्म ग्रंथों में वर्णित है | यंत्र साधना , मंत्र साधना आदि इनका उदाहरण कही जा सकती हैं | यह साधना आखिर क्या है ? किस
03 नवम्बर 2019
सम्बंधित
लोकप्रिय
आज के प्रमुख लेख
आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x