पांचाली, स्वयंवर से चीर हरण तक

17 नवम्बर 2019   |  शोभा भारद्वाज   (3401 बार पढ़ा जा चुका है)

पांचाली, स्वयंवर से चीर हरण तक

‘पांचाली’ स्वयंवर से चीर हरण तक

डॉ शोभा भारद्वाज

प्रोफेसर डॉ लल्लन प्रसाद जी एक अर्थशास्त्री हैं , साथ ही मन के भावों को सरल भाषा में कविता का रूप देने की कला माहिर हैं उन्होंने महाभारत के पात्रों में पांचाली की कथा ‘स्वयंबर से चीर –हरण तक’ का वर्णन बड़े सुंदर ,मार्मिक ढंग से किया है उन्होंने नारी के लिए ‘शब्द,स्पर्श,रूप,रस,और गंध इन सब का सम्मिलन ही स्त्री है’ माँ,पत्नी पुत्री,एवं पुत्रवधू सभी रूपों में स्त्री समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है शब्दों से नारी को गौरवान्वित किया है |द्रौपदी असाधारण व्यक्तित्व की स्वामिनी थी उनका जन्म यज्ञ की अग्नि से हुआ था अर्थात अग्नि शिखा |उनके स्वयंबर के लिए कठिन परीक्षा रखी गयी थी खौलते तेल की कढ़ाई में देखते हुए एक ख़ास दूरी पर घूमती मछली की दाहिनी आँख का भेदन करना उस समय के धनुर्धारियों में केवल कर्ण एवं अर्जुन सर्वश्रेष्ठ एवं थे तेजस्वनी दौपदी को कर्ण स्वीकार नहीं थे मन में गांठ ,अपमान का घूंट पीकर वह बैठ गये ब्राह्मण वेशधारी अर्जुन ने शर्त पूरी की द्रोपदी ने उनके गले में जयमाला डाल दी द्रौपदी सहित उत्साहित पांडव अपनी माता कुंती के पास पहुंचे युधिष्ठर ने माता से कहा देखों माँ आज हम क्या लाये हैं बिना ध्यान दिए उन्होंने कहा आपस में बाँट लो दौपदी पांचो भाईयों की पत्नी बनी पाँचों पतियों को एकता के सूत्र में बांध दिया महाभारत की कथा सभी जानते हैं लेकिन बड़े ही रोचक ढंग से जैसे –जैसे प्रसंग आगे बढ़ता है लेखक की लेखनी पाठको को कथा से बांधती जाती हैं द्यूत का खेल अंत में अपने भाईयों सहित द्रोपदी को युधिष्ठिर ने दावं पर लगा दिया दुशासन द्वारा तेजस्विनी नारी को भरी सभा में बाल पकड़ कर खींच कर लाना द्रौपदी का आक्रोश सभा में बैठे सभी गुरुजनों से किये गये प्रश्न अंत में दुशासन का बल प्रयोग कर चीर हरण का प्रयत्न महाभारत की भूमिका बनाता है ऐसा धर्म युद्ध आने वाले समाज के लिए एक उदाहरण बन गया | जब द्रौपदी अपने बल से संघर्ष करती थक गयी अब वह श्री कृष्ण को आर्त स्वर से पुकारने लगी श्री कृष्ण की कृपा से चीर बढ़ता जा रहा था बल प्रयोग करते करते आततायी दुशासन थक हार कर गिर पड़ा प्रोफेसर डॉ लल्लन प्रसाद जी के हाथों से ‘सूर्या संस्थान के मंच पर मुझे ‘पांचाली’ “स्वयंवर से चीर हरण तक” लेने का सौभाग्य मिला धन्यवाद सर |

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